मै बामसेफ में बतौर कर्मचारी वर्ष 2000 से सक्रीय रहा हूं । वर्ष 2003 में मुझे कैथल के जवाहर पार्क में बामसेफ जिला कैथल का महासचिव बनाया गया था,इससे पूर्व भी वर्ष 1996 से बसपा से विमुख होने के बाद मेरी बामसेफ के कार्यक्रमों में भागेदारी रही है। मै छात्र जीवन में ही 1989 से बसपा से जुड़ गया था। हरियाणा के जींद जिले में 1989 में पटियाला चौंक जींद नरवाना रोड़ स्थित विशवकर्मा धर्मशाला में मैने बसपा का पहला कैडर कैंप अटैंड किया था। इस कार्यक्रम में ले जाने वाले डॉक्टर सतपाल अहिरका जी थे ,जो पशुओं से संबंधित अस्पताल में VLDA थे ,तब से लेकर आज तक मैं फुले अम्बेडकरी आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हूं और आगे भी रहुंगा तथा जीवन की आखिरी सांस तक रहुंगा। इसके बिना अब मेरा जीवन कुछ भी नहीं है।
महत्वपूर्ण बात मैं यह बताना चाहता हूं कि मैनें देखा है कि बामसेफ संगठन 1996 से ही संविधान का प्रचार-प्रसार कर रही है, इस संबंध में बामसेफ द्वारा आयोजित किए गए कार्यक्रमों के बहुत से पत्र-पत्रिकाएं और लेख,पम्पलेट मेरे पास अभी भी मौजूद है। वरिष्ठ और पुराने साथियों के पास इससे पूर्व के भी महत्वपूर्ण दस्तावेज और जानकारियां होंगी।
बामसेफ संविधान दिवस 26 जनवरी को मनाती रही है और 26 जनवरी को पूरे देश में सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। गणतंत्र में गणों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तथा आम जनता की सुनी जाती है । देश की जनता के हित में फैसले लिए जाते हैं ,आम जनता को और अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है,लेकिन मुझे लगता है भारत में सच्चे अर्थों में अभी भी गणतंत्र स्थापित नहीं हुआ है। सच्चे अर्थों में और वास्तविक रूप में गणतंत्र स्थापित करने के लिए अभी हमें एक लम्बे संघर्ष की आवश्यकता है।
मुझे लगता है बामसेफ ने इसी परिपेक्ष्य में 26 जनवरी को संविधान दिवस मनाने का निर्णय लिया होगा, मुझे दूसरा बड़ा जो कारण दिखाई देता है वह यह है कि 26 जनवरी को संविधान पर विशेष चर्चा नही होती थी जबकि 26 जनवरी को संविधान पर विशेष चर्चा होनी चाहिए थी। मुझे तीसरी जो बड़ी बात नजर आती है कि यदि गणतंत्र वास्तविक रूप में लागू हो ही गया है तो आगे संघर्ष का कोई मतलब नहीं रह जाता और यदि सच्चे अर्थों में गणतंत्र लागू नहीं हुआ है तो उसके लिए संघर्ष करना अभी हमारे लिए बाकी है।
26 जनवरी को भले ही हम ने गणतंत्र दिवस की घोषणा कर दी है और इस संबंध में जो कार्यक्रम लगाए जाते हैं,वह अच्छी बात है कि जिस दिन भारत का संविधान लागू हुआ । उस खुशी में देश में अनेको कार्यक्रम लगने ही चाहिए, लेकिन कार्यक्रमों की भीड़ में हम कहीं संविधान के असली उद्देश्य को भूल ना जाएं ? सरकारों द्वारा लगाए गए कार्यक्रमों में अक्सर यह कमी मुझे देखने को नजर आती है। इसकी भरपाई करना बहुत जरूरी था।
बामसेफ के कार्यक्रमों की अधिकता बढ़ने के कारण तथा देखा-देखी बहुजन समाज के अनेक संगठन भी 26 जनवरी को संविधान दिवस मनाने लगे। हमारे कुछ संगठन 26 नवंबर को भी संविधान दिवस मनाते थे लेकिन बामसेफ संगठन 26 जनवरी को ही संविधान दिवस अधिकतर मनाता रहा, मुझे लगता है यह अधिक सार्थक और उचित था।
सविधान दिवस के कार्यक्रमों की अधिकता बढ़ने के कारण गत वर्षो में केंद्र की सरकार ने फैसला लिया कि 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाएगा, केंद्र सरकार ने अच्छा किया कि इस बहाने संविधान पर चर्चा होगी, लेकिन इसको हम आज व्यावहारिक रूप में देखते हैं तो इससे कार्यक्रमों में और अधिकता बढ़ गई है लेकिन असली उद्देश्य के लिए संघर्ष करते हुए बहुत ही कम साथी नजर आते हैं जो कि एक चिंताजनक स्थिति भी है।
संविधान का असली उद्देश्य कैसे प्राप्त करेंगे ? उसको शायद साथी भूलते ही जा रहे हैं । आज देश भर में संविधान दिवस को लेकर कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई है फेसबुक ,व्हाट्सएप ,इंस्टाग्राम, यूट्यूब पर ढेर सारे कार्यक्रम आपको देखने को मिलेंगे। अनेक साथी आज अपनी फोटो उतार उतार कर फेसबुक और व्हाट्सएप को भर देंगे। इन साथियों को यह समझने की जरूरत है कि संविधान के असली उद्देश्य को हम संगठन ,सिस्टम, त्याग, समर्पण ,विचारधारा और आंदोलन से हासिल कर पाएंगे। इन कार्यक्रमों की बाढ़ से तथा व्हाट्सएप, फेसबुक पर फोटों की बाढ़ से हम सविधान का असली उद्देश्य प्राप्त करते हुए नजर नहीं आते ,कहीं ना कहीं में वह हमसे छूटता जा रहा है। बामसेफ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मान्यवर अशोक परमार जी ने इस पर मुझे एक लेख लिखने को कहा था ,जब केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर सविधान दिवस मनाने की घोषणा की थी । मैं इस संबंध में मेरी और संगठन की व्यस्तताओं के कारण लिख नहीं पाया,लेकिन इस संबंध में जल्द ही एक लेख लिखुंगा।
केंद्र सरकार के लिए गए निर्णय के उपरांत समाज में बड़े पैमाने पर कार्यक्रमों की और अधिकता हुई और इसके बाद बामसेफ ने निर्णय लिया कि 26 नवंबर को हम मूलनिवासी अधिकार दिवस मनाएंगे तथा 26 जनवरी को हम संविधान दिवस ही मनाएंगे। मुझे लगता है यह रणनीतिक तौर पर, तकनीकी तौर पर तथा व्यवहारिक तौर पर भी अधिक उचित है क्योंकि 26 जनवरी को पूरे देश को अधिकार मिले सबको बराबरी का हक मिला । इसलिए 26 जनवरी को संविधान दिवस मनाना ही उचित है, लेकिन 26 नवंबर को बाबा साहब ने संघर्ष करके मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों को अधिकार दिलाए, इसलिए 26 नवंबर को मूलनिवासी अधिकार दिवस के तौर पर मनाना और अधिक उचित है तथा इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि सच्चे अर्थों में गणतंत्र स्थापित करना।
अब एक सवाल मैं संविधान दिवस मनाने वाले साथियों से करना चाहूंगा कि उन्हें आज के दिन यह बात अवश्य सोचनी चाहिए कि संविधान के असली उद्देश्य को क्या इन कार्यक्रमों से हम प्राप्त कर पाएंगे या नहीं ? यदि नहीं तो फिर वह क्या कार्य पद्धति हो या क्या क्रियाकलाप हो ,जिसके माध्यम से हम संविधान के असली उद्देश्य को प्राप्त कर पाए ? संविधान के असली लक्ष्य और उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना होगा ? क्या वह हम करने के लिए तैयार हैं ? क्या यह केवल आज के दिन बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा को माल्यार्पण करने से ही हो जाएगा ? क्या फोटो खींचकर फेसबुक, व्हाट्सएप पर लोड करने से हो जाएगा ? या फिर त्याग और समर्पण से होगा ,संगठन सिस्टम से होगा ,विचारधारा और आंदोलन से होगा, लोकतांत्रिक पद्धति और संस्थागत नेतृत्व से होगा ,लक्ष्यभेदी और लक्ष्य प्रेरित जागृति से होगा ? पे बैक टू सोसाइटी से होगा ? क्या हम समझ पाए हैं कि पे बैक टू सोसाइटी क्या है ? क्या पे बैक टू सोसाइटी के लिए हम सहयोग करेंगे ? आज तक पर पे बैक टू सोसाइटी के लिए हमने क्या किया है ? आदि अनेक सवाल आपके सामने है। मैं उम्मीद करता हूं कि संविधान दिवस को मनाने वाले सभी साथी उपरोक्त सवालों के आईने में अपने आप को रखकर, आज इस संबंध में जरूर चिंतन मनन करेंगे और सच्चे अर्थों में गणतंत्र लागू करने के लिए ,संविधान को लागू करने के लिए ,वास्तविक रूप में ईमानदारी और लगन से प्रयास करेंगे। इसी आशा और उम्मीद के साथ सहयोग की अपेक्षा में एक सविधान शिक्षक ,संविधान प्रचारक।
सुरेश द्रविड़
राष्ट्रीय संगठन सचिव, बामसेफ
981225957








