आज भी देश में पैतीस करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर ?

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19 करोड़ से 35 करोड़ पहुंची भूखे पेट सोने वालों की संख्या।

पिछले चार सालों में लगभग दुगुनी हुई आंकड़े।

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वर्ष दो हजार अठारह के आंकड़ो के अनुसार भारत में उन्नीस करोड़ लोग ऐसे थे जो भूखे पेट सोने को मजबूर थे। लेकिन आज की तारीख में यह संख्या लागभग दोगुनी हो गयी हैं। 2022 की ताजा आंकड़ो के मुताबिक भूखे पेट सोने वालों की संख्या पैतीस करोड़ तक पहुंच चुकी हैं।

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भारत को विश्व गुरु बनाने की बात कही जा रही हैं। लेकिन इस देश मे कुछ ऐसे आंकड़े निकल कर सामने आ जाते हैं। जो विश्व गुरु बनाने वाली सोच पर प्रश्नचिन्ह लगा देती हैं।

भारतीय संविधान के मुताबिक देश के नागरिकों के मौलिक जरूरतों का ख्याल रखना सरकार की जिम्मेदारी हैं। लेकिन आंकड़े चीख-चीख कर ये बयां करती हैं कि सरकारें इन जिम्मेदारियों को निभाने में पूरी तरह विफल रही हैं। चाहे वो वर्तमान में बीजेपी की सरकार हो या पिछले साठ सालों में सत्ता पर बैठी कांग्रेस ।

समान विचारधारा वाली इन दोनों राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी ने पिछले सात दशकों से संविधान को दरकिनार कर हर तरह से मूलनिवासियो का शोषण करने का काम किया हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि आज भी इस देश मे पैतीस करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं।

लेकिन सवाल खड़ा होता हैं कि कौन हैं ये पैतीस करोड़ लोग ? क्या मंदिर में पूजा करने वाले पंडितों के रिश्तेदार हैं ? या फिर देश के सत्ता पर बैठे नेताओं के रिश्तेदार ? ये पैतीस करोड़ लोग हमारे और आपके ही समुदाय से हैं। जिसे संविधान की भाषा में एससी-एसटी-ओबीसी और बामसेफ इन्हें देश का मूलनिवासी कहता हैं।

एक तरफ जहा दूसरे देश हर दिन नए नए खोज कर रही हैं। अपनी देश की समाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सैन्य आदि को मजबूत बनाने के लिए हर संभव प्रयास करती नज़र आ रही हैं। वही दूसरे तरफ भारत में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही हैं।

बीते दिनों कोविड महामारी तथा लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रमिकों की हालत से संबंधित एक जनहित मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि, यह सुनिश्चित करना केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए) के तहत खाद्य अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।

बताते चले कि शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद-इक्कीस के तहत ‘भोजन के अधिकार’ को मौलिक अधिकार करार दिया था। इसके बावजूद खाली पेट सोने वाले लोगो के इन आंकड़ो से पता चलता है कि सरकार लोगो के अधिकारों का हनन कर रही हैं।

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