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मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का एक मामला सुर्खियों में हैं। जहा के पंडितो को गुंडे के रूप में देखा जा सकता हैं। ये हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यहां के पंडितो द्वारा दर्शन के लिए पहुंचे श्रद्धालुओं के साथ मारपीट की कई खबरे आती रहती हैं। हाल ही में एक पंडित ने एसडीएम पर हमला कर दिया जब वे वहा स्थिति का जायजा लेने पहुंचे थे।
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इस देश में एक समय हुआ करता था। जब समाज वर्णव्यवस्था में बंटा हुआ था। वर्णव्यवस्था में ब्राह्मणों ने खुद को सबसे ऊपर रखा और खुद को समाज में सर्वश्रेष्ठ बताया।
आजादी के बाद देश के महान विद्वानों ने संविधान बनाया और देश को एक लोकतांत्रिक देश के रूप में स्थापित किया। जहा सबको समान अधिकार दिया गया और समाज के कुछ वर्गो के जन्म आधारित वर्चस्व को समाप्त किया गया।
आज इस देश में कई संवैधानिक पदें हैं, जिनमे सबसे सर्वश्रेष्ठ पद देश के राष्ट्रपति का होता हैं। लेकिन आज भी देश के द्विज इन सब से खुद को ऊपर समझते हैं। और इनकी पदो की गरिमा की चिंता किए बगैर इनसे अमानवीय व्यवहार करते हैं।
बीते दिनों मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का एक मामला सामने आया है। जहा पंडित के बेटे को एसडीएम ने मंदिर में गलत द्वार से प्रवेश करने नहीं दिया तो पंडित ने गुस्से में आकर एसडीएम को थप्पड़ मार दिया।
मिली जानकारी के मुताबिक, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में बीते रविवार को एसडीएम चन्दर सिंह सोलंकी सावन सोमवार के अवसर पर मंदिर में हो रही तैयारियों का जायजा लेने आए थे।
इस दौरान मंदिर परिसर में सचिन नाम का एक युवक बाहर निकलने वाले द्वार से प्रवेश कर रहा था। इस पर एसडीएम ने उसे टोका तो युवक ने एसडीएम से बहस करने लगा। जिसके बाद एसडीएम ने उसे बाहर निकलवाया।
इस बात की जानकारी मिलते ही उसके पिता (जो मंदिर के पंडित भी है) पंडित ब्रम्हानंद शर्मा कुछ लोगों के साथ वहां आए। उन्होंने एसडीएम पर बेटे के साथ मारपीट का आरोप लगाया और बहस करने लगे। देखते ही देखते मामला इतना बढ़ गया कि पंड़ित ने एसडीएम सोलंकी को थप्पड़ मार दिया।
बता दें कि इससे पहले भी ओंकारेश्वर मंदिर में कई बार पंडों द्वारा मारपीट की खबरें सामने आई हैं। इससे पहले पंडों ने मंदिर में भक्तों के साथ मारपीट की थी।
यह कोई पहला मामला नहीं हैं, जब किसी द्विज ने खुद को संवैधानिक पदों पर आसीन अधिकारियों से सर्वश्रेष्ठ समझ कर उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया हो। खास कर तब जब संवैधानिक व्यवक्ति मूलनिवासी बहुजन समाज से संबंधित रखता हो।
मालूम हो की मंदिर प्रांगण में कई बार द्विजो ने देश के राष्ट्रपति को भी उनकी जाति का अहसास दिलाते हुए उन्हें अंदर जाने से रोका हैं। चाहे वो पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हो या राष्ट्रीयपति द्रोपति मुर्मू।








