यदि तथागत बुद्ध नहीं होते

यदि तथागत बुद्ध नहीं होते

मानवीय समाज के विकास के लिए मानव खुद ही जिम्मेदार है। लेकिन कोई विशेष व्यक्ति मानवीय समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होता है, ठीक वैसे ही तथागत बुद्ध का इस धरती पर जन्म सुखकारक है। क्योंकि तथागत बुद्ध ने अपने धम्म तत्वों के माध्यम से ऐसी विचारधारा को जन्म दिया है। जो मानवीय समाज के लिए उपकारक साबित हुई है। मानवी जीवन को श्रेष्ठ जीवन मूल्य प्रदान किए गए हैं। समाज के सम्मुख समृद्ध जीवन के नई शैली को प्रस्तुत किया है। मनुष्य जन्म प्रवृत्तियों तथा अप्रवृत्तियों के साथ होता है लेकिन अज्ञानता तथा स्वार्थ के कारण अप्रवृत्तियां उस पर हावी हो जाती है।  तथा समाज विकृतियों से भर जाता है। 

तथागत बुद्ध के समय सामाजिक जीवन अनेक विकृतियों से भरा था। समाज में नैतिक मूल्यों की कमी थी। सामाजिक नीति नियमों का अभाव था। हिंसा, उन्माद ,अशांति, घृणा और द्वेष का बोलबाला था। समाज में व्याप्त अस्थिरता के कारण समाज विकास भी थम गया था। जातीय विषमता ने मनुष्य को मनुष्य का दुश्मन बना दिया।  सत्ता ,संपत्ति तथा प्रतिष्ठा से सीमित लोगों के अधिकार ने शोषण तथा उत्पीड़न को जन्म दिया।  सद्गुणों तथा  नीतिमत्ता के अभाव में समाज में विकृतियों की बढ़ोतरी होती रही। अपने ही कर्मों के कारण वह दुख की खाई की ओर बढ़ता गया। मनुष्य में वैयक्तिक दुख के साथ सामाजिक विषमता  में जिन  बुराइयों को जन्म दिया था, उससे समाज भी दुखी-कष्टी था।  मानवीय परिवेश को सुरक्षित करना कठिन हो गया था।

ऐसे विकट परिस्थिति में तथागत बुद्ध का जन्म मानवीय समाज के लिए वरदान साबित हुआ। तथागत बुद्ध ने मानव तथा मानवीय समाज की इन समस्याओं का हल ढूंढ निकाला। उन्होंने ऐसे धम्म का आविष्कार किया जो धम्म  समस्त मानवीय समस्याओं का हल था। तथागत बुद्ध ने लोक कल्याणकारी धर्म का आविष्कार कर लोगों के सामने धर्म के रूप में एक आदर्श जीवन मार्ग प्रस्तुत किया। तथागत बुद्ध का धम्म  सम्यक आचरण तथा विचारों का संगम है। तथागत बुद्ध का धम्म बाह्य  तथा आंतरिक शुद्धता  पर बल देता है।  शुद्धता ही आंतरिक शुद्धता का  निर्माण कर सकती है।  मनुष्य में सद्गुणों के विकास के लिए कुछ मापदंडों की आवश्यकता होती है, जिसे तथागत बुद्ध ने पावन पथ कहा है। उसे बुद्ध पंचशील के सिद्धांत के माध्यम से अविष्कृत किया है ।
वह पंचशील इस प्रकार है- 
‘हिंसा से विरत रहना,
चोरी से विरत रहना,
कामवासना से अलग रहना,
असत्य वचन न कहना तथा
मादक पदार्थों के सेवन से विरत रहना।’ 

तथागत बुद्ध द्वारा आविष्कृत सिद्धांत अत्यंत सरल तथा सीधे नजर आते हैं, लेकिन यह सिद्धांत अत्यंत गंभीर तथा कठिन है। दैनंदिन जीवन में हम इनका पालन अचूकता से नहीं कर सकते। सामान्य से दिखने वाले यह पंचशील मानवी सद्गुणों का भंडार है, तथा गहन अर्थ लिए हुए हैं। इन्हीं पंचशीलों के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा तथा स्थिरता प्रस्तावित की जा सकती है। शीलों  का आविष्कार तथागत बुद्ध  द्वारा शांति की प्रस्तावना के लिए की गई अभूतपूर्व क्रांति है।  क्योंकि इन्हें पंचशीलों का स्वीकार विश्व के समस्त लोगों ने कायदों के स्वरूप में किया है। विश्व की दंड – संहिता का प्रमुख आधार तथागत बुद्ध के पंचशील ही है। 

तथागत बुद्ध ने मानवों  में सद्गुणों के विकास के लिए पंचशीलों के साथ अन्य तत्वों की भी निर्मिती की है। जो शीलों के पूरक तत्व है। जिसमें ‘प्रज्ञा-करुणा-मैत्री-दया-शांति-दान-मुदीता-ममता-प्रेम’ जैसी भावनाओं का निर्माण कर मानवों  में स्वसुरक्षा के साथ सह अस्तित्व की भावनाओं को भी लोगों के मन में जागृत किया है। यह भावनाएं मनुष्य में आपसी सहकार्य तथा सद्भावना को जन्म देती है।  यह सभी भावनाएं सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। जिसे ‘सद्गुण पथ’ भी कहा जाता है। इन सभी तत्वों के माध्यम से मनुष्य के आचार तथा विचारों की शुद्धता को प्राप्त किया जा सकता है। 

‘विज्ञानवाद -मानवतावाद- बुद्धिवाद और विवेकनिष्ठता’ यह  बुद्ध धम्म के मूल आधार है।  ‘विज्ञानवाद’ सामाजिक मूल्यों के विकास के लिए प्रेरक है। ‘विज्ञानवाद -मानवतावाद- बुद्धिवाद तथा विवेकवाद’ यह ‘समानता-स्वतंत्रता-बंधुता तथा न्याय की प्रतिष्ठापना’ के लिए अत्यंत उपयुक्त है। अंधश्रद्धा से मुक्त होकर तर्कनिष्ठता तथा विवेक पर आधारित जीवन शैली को अपनाना यही समाज हित है। 

तथागत बुद्ध के मानवतावादी दृष्टिकोण ने जातिवादी विषमता को तार-तार कर दिया। मानवतावाद यह मानवों के सुख और विकास के लिए विश्व शांति का संदेश देता है। नैतिक गुणों तथा मानवीय मूल्यों की निर्मिति करता है। ‘मानव जाति के एकता का विचार मानवतावाद है।’ 

तथागत बुद्ध का मानवतावादी धर्म अलौकिक तथा धार्मिक पाखंडो को अस्वीकार कर नैतिकता तथा न्याय की स्थापना करना चाहता है। तथागत बुद्ध का धम्म संयमित जीवन की प्रेरणा देता है। इच्छाओं को  नियंत्रित कर जीवन के लिए परम आवश्यक हो उतना ही लेकर शांति और संतोष का  जीवन व्यतीत करना ही तथागत बुद्ध की शिक्षा है। ‘सामूहिक कल्याण ,कुसंस्कारों से मुक्ति,स्वार्थ से मुक्ति, सत्य, न्याय पूर्ण जीवन तथा स्व-निर्भरता और औदार्य से परिपूर्ण जीवन’ ही आदर्श जीवन की कसौटियां है। 

तथागत बुद्ध द्वारा प्रतिपादित इन पंच तत्व तथा पंचशील के सिद्धांत का गहराई से विचार करते हैं, तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि “जब तक मानवीय जीवन है तब तक तथागत बुद्ध के इन धम्म तत्वों की तथा शील तत्वों की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता।’

भारत में अनेक धर्म तथा पंथो की निर्मिती हुई है लेकिन तथागत बुद्ध ने जिस मानवतावादी धर्म का आविष्कार किया है,उसके बिना मानवीय जीवन की कल्पना भी हम नहीं कर सकते। यदि तथागत बुद्ध न होते तो शायद आज भी मनुष्य उस आदिम जीवन को व्यतीत कर रहा होता। मनुष्य विकास के सभी मार्ग अशुद्ध हो जाते। तथागत बुद्ध द्वारा प्रतिपादित मानवीय मूल्यों के अभाव में समाज, नीति – हीन जीवन व्यतीत करता। जीवन के लिए कोई ध्येय न होता। मानव, पशुओं की भांति जीवन बिता रहा होता।  आदर्श मूल्यों के अभाव में मनुष्य जीवन चुनौतियों से भरा होता। नरक में जीवन बिता रहा होता।
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डॉ सरोज डांगे (शामकुवर), नागपुर
लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता।
आप राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्व विद्यालय के
डॉ आंबेडकर विचाधारा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है।
(9423974240)

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