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भारत में जातिवाद का इतिहास काफी पुराना रहा हैं और इसका शिकार आज तक देश के नब्बे फीसदी मूलनिवासी बहुजन समाज हो रहे हैं। लेकिन क्या जातिवाद का शिकार सिर्फ गरीब और लाचार लोग ही होते हैं ? या फिर मूलनिवासी बहुजन समाज से आने वाले उन लोगो को भी जातिवाद का शिकार होना पड़ता हैं, जो ये समझते है की हम बड़े अधिकारी बन चुके हैं।
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आर्यों ने विभिन्न तरह के ग्रंथो के जरिए देश के मूलनिवासियों पर ढाई हजार साल तक शोषण किया।
अंग्रेजो के हुकूमत से पहले तक द्विजाें ने सभी प्रकार की शक्तियों को अपने पास रखा था, जबकि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक अधिकारों से देश के मूलनिवासियों को कोशो दूर रखा गया।
द्विजों ने लंबे समय तक शासन और शोषण करने के लिए मूलनिवासियों को जाति में बाटा और समाज में जातिवाद की जहर ऐसी घोली की उस जहर का असर आज तक समाज में दिखता हैं।
आधुनिक भारत के संविधान ने देश के मूलनिवासियों को छह हजार से भी अधिक जातियों से जोड़ कर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग बनाया और वे सारे अधिकार दिए जो उनसे हजारों सालो से छीने गए थे।
छब्बीस जनवरी, उन्नीस सौ पचास यानी संविधान लागू होने के बाद शोषितों और वंचितों के लिए भी शिक्षा के द्वार खोले गए । मूलनिवासी बहुजन समाज के कई लोग पढ़ लिख कर संवैधानिक पदों पर भी पहुंचे, लेकिन वे लोग कभी भी पेय “बैक टू सोसायटी” के बारे में नहीं सोचा।
वे लोग संविधान के बदौलत नौकरी पा तो लिए, लेकिन इस बात से अंजान थे की उन्हें कभी भी जातिवाद का शिकार होना पड़ सकता हैं और सच तो यही है की आज जातिवाद का शिकार सिर्फ गरीब और लाचार लोग नहीं, बल्कि मूलनिवासी बहुजन समाज से आने वाले वे लोग भी जातिवाद का शिकार होते है जो आज एक बड़े अधिकारी बने बैठे हैं।
ऐसे कई मामले अब तक सामने आए है जिससे पता चलता है की अच्छी नौकरी, अच्छा लाइफ स्टाइल, पावर और देश के सर्वोच्च पदों पर बैठने के बाद भी आप इस देश में जातिवाद का शिकार होने से नही बच सकते हैं क्योंकि जो संविधान अस्पृश्यता के खिलाफ है, उन्हे चलाने वाले लोग ही जातिवाद के संरक्षक है।
और शायद यही वह कारण है की, संविधान बनने के तिहत्तर साल बाद भी इस देश में संविधान बस नाम मात्र का लागू हैं। जबकि भारत का संविधान विश्व का सबसे बेहतरीन लिखित संविधान माना जा जाता हैं और भारतीय संविधान की तारीफ दुनिया के बड़े बड़े दिग्गज करते है।








