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बीते दिनों मध्य प्रदेश के खंडवा में एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर सफलतापूर्वक संपन्न किया गया। जिसमे प्रशिक्षक के रूप में डी० के० खापर्डे मेमोरियल ट्रस्ट के चेयरपर्सन मूलनिवासी बी० डी० बोरकर साहब उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मूलनिवासी बहुजन समाज के कई बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया ।
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बीएस फोर यानी भारतीय संविधान, सम्मान, सुरक्षा, संवर्धन राष्ट्रव्यापी महा जनजागरण अभियान के तहत बीते दिनों मध्य प्रदेश के खंडवा में एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर सफलतापूर्वक संपन्न किया गया।
जिसमे मूलनिवासी बहुजन समाज के कई मूलनिवासी साथी उपस्थित रहे। साथ ही कार्यक्रम में फूले – आंबेडकारी विचारधारा से जुड़े संगठनों के कई पदाधिकारी व कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
मध्य प्रदेश के खंडवा में आयोजित इस एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में प्रशिक्षक के रूप में डी० के० खापर्डे मेमोरियल ट्रस्ट के चेयरपर्सन मूलनिवासी बी० डी० बोरकर सर उपस्थित रहे। जिन्होंने उपस्थित साथियों को प्रशिक्षित किया।
उन्होंने भारतीय संविधान, फुले आंबेडकरीय विचारधारा का उद्देश्य और मूलनिवासी पहचान के महत्व को विस्तारपूर्वक समझाया।
उन्होंने कहा की आर्य ब्राह्मण चरवाहा बनके भारत आए और मूलनिवासियों पर लंबे समय तक शासन करने के लिए समाज में जाति व्यवस्था बनाई और इनको आपस में लड़ा दिया। ताकि यह बहुसंख्यक मूलनिवासी समाज इन आर्य ब्राह्मणों पर पलटवार न कर सके।
उन्होंने लोगो से जाति से ऊपर उठकर खुद को मूलनिवासी पहचान से जुड़ने को कहा, क्योंकि जाति से हम खुद को अपमानित महसूस करते हैं जबकि मूलनिवासी पहचान हमे गौरवान्वित महसूस कराता हैं।
उन्होंने कहा की हमारी लड़ाई ब्राह्मणवादी व्यवस्था से हैं और इस व्यवस्था से लड़ाई के लिए एक सम्मानजनक पहचान जरूरी हैं। जो मूलनिवासी पहचान ही दिला सकता हैं।
उन्होंने कार्यक्रम में बताया की, भारत में शुद्र अति शूद्रों की आबादी ज्यादा है।हम मूलनिवासी संगठित होकर युद्ध ना छेड़ दे इसलिए विदेशी आर्य ब्राह्मणों ने हमें छह हजार से अधिक जातियों में बांट दिया।
हमारी जनसंख्या आर्य ब्राह्मणों से ज्यादा है, हम ज्यादा संख्या में है इसलिए मूलनिवासी हैं क्योंकि किसी भी राष्ट्र में मूलनिवासियों की संख्या ज्यादा होती है। हमें ब्राह्मणों ने उनकी सुविधा के लिए शुद्र बनाया और जिस तरह से उनके फायदे के लिए उन्होंने हमें शुद्र पहचान दी उसी तरह से जातियों की पहचान भी उन्होंने हमें अपने ही फायदे के लिए दी ।
उन्होंने कहा की, यदि हम जाति के नाम से संगठन बनाते हैं तो इसमें ब्राह्मणों को लाभ होगा, जो पहचान ब्राह्मणों ने दी है, उस पहचान से यदि हम संगठित होते हैं तो इसका फायदा भी ब्राह्मणों को ही होगा । इसलिए हमें वह पहचान स्वीकार करनी होगी जो हमारी मूल पहचान है ।
उन्होंने लोगो को बताया की, हम इस देश के भूमिपुत्र हैं अर्थात इस देश के मूलनिवासी हैं, इसलिए मूलनिवासी शब्द को ही हमें अपनी पहचान बनाकर मान्यता प्राप्त करना होगा।
हम इस समय पहचान के संकट की दौर से गुजर रहे हैं क्योंकि शुद्र ,अछूत, अतिशुद्र, वनवासी, हरिजन, दलित एससी, एसटी, ओबीसी तथा छह हजार से अधिक जाति नाम, यह सारी पहचाने हमारी अपनी पहचानी नहीं है ।
यह सारी पहचाने हमारे लोगों का मनोबल गिराती है और हमारे लोगों के मन में हीन भावना पैदा करती हैं,जो गुलामी को स्वीकार करने की भावना निर्माण करती हैं ।
उन्होंने मूलनिवासी बुद्धिजीवियों से कहा की, हमें अपनी पहचान की समस्या का इस प्रकार समाधान करना है कि उस पर हमारा हक हो और हम गर्व कर सकें । गुलामी की भावना का विरोध हो और हमारे समाज का मनोबल ऊंचा हो ऐसी ऐसी पहचान हमें हमारे लोगों को देनी होगी।
उन्होंने कहा की, यह पहचान हमें नए सिरे से निर्माण करने की जरूरत नहीं है क्योंकि मूलतः हमारी अपनी पहचान हमारे ही पास हैं, जो हम लोग भूल गए थे। हमारी मूल पहचान है कि हम इस देश के मूल निवासी हैं।









