बिहार में हुई जातिगत जनगणना से किसके पेट में मची दर्द?

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बिहार में हुई जातिगत जनगणना की रिपोर्ट आते ही कुछ लोगो के पेट में दर्द मच गई हैं और ये कही न कही वही लोग हैं जिन्होंने इतने बड़े मूलनिवासी बहुजन समाज को उनके अधिकारों से वंचित रखा हैं। बामसेफ हमेशा से यह दावा करते आया हैं की इस देश में एससी, एसटी, ओबीसी और कन्वर्टेड माइनोरिटीज की आबादी इस देश में लगभग नब्बे फीसदी हैं और यह दावा आज सच साबित होते दिख रहा हैं।

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बामसेफ हमेशा से कहता आया है की एससी, एसटी और ओबीसी की आबादी इस देश में पचासी फीसदी हैं। और आबादी के अनुपात में इस समाज को उतनी भागीदारी मिलनी चाहिए।

“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” यह बात बामसेफ के साथ साथ कई मूलनिवासी बुद्धिजीवी भी दोहराते आए हैं। लेकिन सत्ता पर बैठे साढ़े तीन परसेंट द्विजो ने कभी भी देश के मूलनिवासियों को उनके अधिकार नहीं दिए।

यहां तक कि आजादी के बाद से हुए जनगणना में कभी भी ओबीसी वर्ग की आबादी का खुलासा भी नहीं किया गया की वे इस देश की कुल आबादी में कितनी हिस्सेदारी रखते हैं।

साल उन्नीस सौ इक्यावन से लेकर दो हजार ग्यारह तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) का डेटा दिया गया, लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का डेटा सार्वजनिक नहीं किया गया।

देश में जातिगत जनगणना की मांग कई सालो से उठते आई है। इस समय एससी, एसटी, ओबीसी और कन्वर्टेड माइनोरिटीज की सबसे बड़ी संगठन माने जाने वाली बामसेफ ने भी कई बार पूरे देश में जातिगत जनगणना की मांग की हैं।

बामसेफ यह दावा करती है की इस देश में एससी, एसटी और ओबीसी की आबादी देश की कुल आबादी का पचासी फीसदी हैं।

लेकिन चिंता की बात है की उन्नीस सौ इकतीस के बाद इस देश में कभी भी जातिगत जनगणना नही हुईं। आखिरी बार साल उन्नीस सौ इकतालीस में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया ज़रूर गया था, लेकिन उसे प्रकाशित नहीं किया गया।

लेकिन बीते दो अक्टूबर, दो हजार तेईस को बिहार में जातिगत जनगणना के आंकड़े प्रकाशित कर दिए गए। जिसमे बामसेफ के दावे सत प्रतिशत सच निकले हैं।

जाति आधारित जनगणना के आंकड़ों पर गौर करे तो बिहार में एससी, एसटी और ओबीसी वर्गो की आबादी राज्य की कुल आबादी का लगभग चौरासी (83.81%) फीसदी हैं। जबकि सवर्णों की आबादी साढ़े पंद्रह (15.52%) फीसदी हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में सबसे अधिक अति पिछड़ा वर्ग की आबादी हैं, जो कुल आबादी में छत्तीस दशमलव शून्य एक (36.01%) फीसदी की हिस्सेदारी रखते हैं। इसके बाद पिछड़े वर्ग सताइस दशमलव एक दो (27.12%) फीसदी के साथ दूसरे पायदान पर हैं।

इसके बाद राज्य में तीसरी सबसे बड़ी समुदाय एससी यानी अनुसूचित जाति की हैं। जिसकी आबादी राज्य की कुल आबादी का उन्नीस (19%) फीसदी हिस्सा हैं। जबकि राज्य में अनुसूचित जनजाति एक दशमलव छह आठ (1.68%) फ़ीसदी हैं।

मूलनिवासियों की आबादी सिर्फ बिहार में ही पचासी फीसदी नहीं हैं। बल्कि पूरे देश में एससी, एसटी, ओबीसी और कन्वर्टेड माइनोरिटीज की आबादी लगभग नब्बे फीसदी है। लेकिन हिस्सेदारी की बात करे तो यह बहुजन समाज पंद्रह फीसदी द्विजों से कई गुना पिछड़ी हुई हैं।

आश्चर्य की बात है की ओबीसी, देश की कुल आबादी में लगभग आधी है, लेकिन केंद्र सरकार के नब्बे (90) सचिवों में सिर्फ तीन (3) ओबीसी हैं, जबकि कायदे से पैंतालीस (45) होने चाहिए थे।

यही नहीं बिहार की ही बात करे तो, जिस भूमिहार जातियों की आबादी राज्य में मात्र दो दशमलव सतासी (2.87%) फीसदी हैं, उसके पास कुल उंचालिस (39%) फीसदी जमीन पर कब्जा हैं। जबकि साढ़े तीन (3.66%) फीसदी ब्राह्मणों के पास सौलह (16%) फीसदी और साढ़े तीन (3.45%) फीसदी राजपूतों के पास उन्नीस (19%) फीसदी जमीन है।

वही राज्य की कुल आबादी में लगभग साढ़े चौदह (14.27%) फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले यादवों के पास मात्र साढ़े सात (7.5%) फीसदी जमीन हैं। जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय से आने वाले लोगो की जमीनों में हिस्सेदारी न के बराबर हैं।

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