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इस देश में राम विलास पासवान का नाम अनेक कारणों से चर्चित रहा है और रहेगा। देश के युवा सांसद के रूप में उनका नाम हुआ था। अनुसूचित जाति से होने के कारण उनकी खूब चर्चा हुई थी।
बिहार की राजनीति में अपना अस्तित्व बनाने के लिए कभी-कभार डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का नाम लेकर राजनीति करनेवाले राम विलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी बनायी थी।
इस पार्टी का वास्तविक आधार विचारधारा न रहते हुए जाति और परिवार ही रहा था। परिवारवाद के चलते यह पार्टी अब समाप्त हो गयी है।
केंद्र में बैठी भारतीय जनता पार्टी ने पशुपति पारस को केंद्रीय मंत्री मंत्री बनाकर लोकजन शक्ति पार्टी को दो गुटों में बांट दिया था। रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान और भाई पाशपति पारस दोनों ने पार्टी पर अपना दांवा किया था।
अब चुनाव आयोग ने लोक जनशक्ति पार्टी को समाप्त करके इसके चुनाव चिन्ह बंगला को समाप्त किया है। साथ ही इस पार्टी के दो गुटों को मान्यता दी है।
अब एक ओर चिराग पासवान अपने पिता के नाम से पार्टी चलाएंगे। पार्टी का नाम होगा “लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास)”।
दूसरी ओर पशुपति पारस ने अपनी गट को “राष्ट्रीय लोकजनशक्ति पार्टी” नाम दिया है।
जाहिर है कि “लोक जनशक्ति पार्टी” अलोकतांत्रिक और परिवारवादी होने के कारण भाजपा को उसे तोड़ना आसान हुआ। मंत्रिपद का लालच का आधार लिया गया।
मूलनिवासी बहुजनों को इस प्रकार से एक जाति बात करने वाले, परिवारवादी और अलोकतांत्रिक नेताओं और संगठनों से बचना चाहिए।
इन अलोकतांत्रिक, परिवारवादी और जातिवादी पार्टियों से मूलनिवासी बहुजन समाज का हित कभी नहीं हो सकता। अगर किसी का हो सकता है तो परिवार के किसी पांच दस लोगों का और मूलनिवासी बहुजन समाज के शत्रु का जरूर होता है।






