डीजल पेट्रोल और गैस के दाम हर रोज बढ़ रहे हैं।
मुद्रास्फीति से रुपये की कीमत घट रही।
आम नागरिकों की आमदनी नहीं बढ़ रही।
पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम, महंगाई की भरमार को लेकर बीजेपी ने नारे देकर चुनाव लड़ा और जीता। पेट्रोल और डीजल के दाम अब तेजी से बढ़ रहे हैं। देश की बहुसंख्य नागरिक महंगाई से परेशान है। बस इतना ही है कि लोग उसे खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सितारमण की माने तो भारत में महंगाई दर कम है। दूसरे शब्दों में जिसे आप महंगाई कहते हैं उसे वित्त मंत्री निर्मला सीता रमण की आंकड़ों की भाषा में महंगाई नहीं कहती।
साथियों पहले आप पेट्रोल डीजल के दामों पर नजर डालिए।
दिल्ली में पेट्रोल 105 रु 41 पैसे लीटर हैं तो डीजल का भाव 96.67 रुपये लीटर है।
वहीं कोलकाता में एक लीटर पेट्रोल को 115 रुपये 12 पैसे और तो डीजल को 99.83 देने पड़ रहे हैं।
अगर चेन्नई को देखें तो, चेन्नई में एक लीटर पेट्रोल 110 रुपये 85 पैसे हैं तो डीजल 100.94 हैं।
वहीं मुंबई में एक लीटर पेट्रोल को 120 रुपये 51 पैसे देने पड़ रहे हैं तो एक लीटर डीजल 104.77 हो गया है।
अलग अलग राज्यों के अलग अलग रेट हैं। पेट्रोल और डीजल के दाम रोज कुछ न कुछ घटते बढ़ते हैं। इसलिए हो सकता है की यह दाम सभी जगह सही नहीं है। लेकिन इस बात पर आप सभी का यकीन हो गया होगा कि पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस के दाम बढ़ गए हैं। घटते भी हैं तो वह बढ़ती हुई रकम से ही थोड़ा घटता है।
इन दिनों भारत सरकार की वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण विदेश दौरे पर हैं। जहां उन्होंने एक कार्यक्रम में इस बात को कबूला की देश में तेल और वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही है लेकिन उन्होंने कहा कि देश में अभी इन्फ्लेशन अर्थात महंगाई दर अधिक नहीं है।
इन्फ्लेशन जिसे हिंदी में हम मुद्रास्फीति कहते हैं। मुद्रास्फीति का अर्थ होता है रुपये की कीमत में गिरावट होना। आसान भाषा में कहा जाए तो तो कुछ वर्षों पहले अगर आप 100 रुपयों में ढेर सारा जरूरी सामान खरदिते थे तो आज वही जरूरी सामान 500 या 1000 (पाँच सौ या हजार) रुपयों में आ रहा है। इसके पीछे रुपये की कीमत कम होना कहा जाता है। आमदनी अगर कम है तो वह महंगाई में बदल जाता है। अगर रुपये की कीमत बाजार में कम हो गई तो आयात और निर्यात दोनों पर इसका असर होता है। इससे हर वस्तु की कीमत पर परिणाम होता है।
अगर आप कोई भी जरूरी वस्तु की कीमत की तरफ देखें तो आप पाएंगे की वह पिछले पांच वर्षों में कई ज्यादा बढ़ गई है। दूसरी तरफ आप अगर आमदनी को देखेंगे तो एक सामान्य नागरिक की पिछले पांच वर्ष जितनी आमदनी थी लगभग उतनी ही आमदनी है, उसमें इजाफा नहीं हुआ है। एक चौकीदार की सैलरी लगभग पांच वर्ष पहले जितनी ही है, लेकिन उसकी जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ गई है। परिणाम स्वरूप उसे समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जिसे गरीबी कहते हैं। अगर व्यक्ति रोजमर्रा के जीवन की वस्तुओं को ही नहीं खरीद पाएगा तो बाकी का क्या? सरकार ने वैसे भी शिक्षा और स्वास्थ्य में निजीकरण को बढ़ावा दिया है। एक आम परिवार का विकास कैसे होगा?
साथियों, सवाल यह नहीं है की वस्तूओं के दर बढ़ रहे हैं, सवाल यह है कि लोगों की आमदनी क्यों नहीं बढ़ रही है? रोजगार और नौकरियां क्यों घट रही है? सवाल यह भी है कि सरकार ढेर सारे टैक्स के रुपयों का क्या कर रही है? क्या सरकार इन्हे नए रोजगार सृजन के लिए इस्तेमाल कर रही है? सरकार को यह सवाल पूछा जाना आवश्यक है।
साथियों, इस जानकारी पर आपके विचार आवश्यक है। कमेन्ट बॉक्स में आपके विचार जरूर लिखिए। अगर आपको हमारा काम पसंद आता हो तो कृपया इसे लाइक और शेयर करना न भूलें।








