निजीकरण के दुष्प्रभावों से निपटने की रणनीतियों का निर्माण

विनिवेश, निजीकरण

निजीकरण से उपजे सामाजिक दुष्प्रभाव पूरी दुनिया में बढ़ती गैरबराबरी, सामाजिक असंतुष्टि, पर्यावरण असंतुलन और फासीवादी भावनाओं के तूफान के रूप में सामने आ रहे हैं। भारत में भी निजीकरण के दुष्प्रभावों को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है। निजीकरण के दुष्प्रभावों का असर सबसे ज़्यादा सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्गों पर होता है, इसलिए निजीकरण के खिलाफ सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा भी मूलनिवासी बहुजन समाज में ही दिखता है। लेकिन निजीकरण के दुष्प्रभावों से निपटने की कारगर सामाजिक रणनीति बनाने के लिए इसकी नवउदारवादी अंतर्राष्ट्रीय जड़ों को टटोलना बहुत ज़रूरी है।

वैश्विक स्तर पर 1930 के दशक में उदारवाद से उपजे Great Depression ने जहाँ एक ओर Welfare State की स्थापना की वहीं दूसरी ओर इसका पटाक्षेप दूसरे विश्व युद्ध के रूप में हुआ। उदारवाद को सरल शब्दों में Minimum Government, Maximum Governance के नारे से समझा जा सकता जिसका अर्थ Market नियंत्रित व्यवस्था है जिसमें राज्य का मुख्या काम कानून का राज कायम रखना भर होता है। उदारवादी राज्य का सामाजिक न्याय से सरोकार नहीं के बराबर ही रहता है। जहाँ एक ओर Welfare State की अवधारणा ने पूंजीवाद के अंदर ही सामजिक न्याय को मान्यता दी, इसने उदारवादी तबके में काफी बेचैनी भी पैदा कर दी। इसी बेचैनी के नतीजे में उदारवादी वर्ग ने Welfare State को नष्ट करके फिर से Free Market व्यवस्था को लागु करने के लिए Think Tank और Research Centers की स्थापना शुरू कर दी और अपनी इस कोशिश को नवउदारवाद का नाम दिया।     

इस प्रयास के मुख्य चिंतक और विचारक Friedrich Hayek, Milton Friedman, Karl Popper इत्यादि थे जिन्होंने सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक न्याय समर्थक welfare state के खिलाफ बहुत सी किताबें, पर्चे और लेख लिखे। Liberalisation, Privatisation, और Globalisation (LPG) इस नवउदारवाद के नये पहिये बनाये गये। Minimum Government and Maximum Governance भी इसी नवउदारवादी सोच का नारा है। इन विचारकों को पहली बड़ी सफलता 1970 के दशक में मिली जब Britain की Prime Minister Margaret Thatcher और उसके बाद America के President Ronald Reagan ने नवउदारवादी नीतियों को राष्ट्रीय नीति के रूप में अपना लिया। इन दोनों ने बहुत जल्दी भांप लिया की नवउदारवाद एक तरह के नवउपनिवेशवाद को स्थापित करने का अच्छा साधन हो सकता है। फिर क्या था इन्होने मिलकर IMF, World Bank, WTO के ज़रिये नवउदारवाद को पूरी दुनिया में लागू करने का काम शुरू कर दिया। उसके बाद तो जैसे नवउदारवाद की आंधी ने पूरे विश्व को अपने चपेट में ले। एक के बाद दूसरे देश में नवउदारवाद हावी होता गया, जिसने भी इस आँधी को थामने की कोशिश की उसे साम, दाम और दंड नीति से ठिकाने लगा दिया गया। तकरीबन हर देश के प्रभावशाली वर्ग ने नवउदारवाद में अपने वर्चस्व के और मज़बूत होने की सम्भावना देख ली और इस तरह से नवउपनिवेशवाद की एक नई लहर चल निकली।

भारत में भी 1991 में आर्थिक संकट से निपटने के नाम पर नवउदारवाद के LPG (Liberalisation, Privatisation, और Globalisation) को यहाँ के वर्चस्ववादी ब्राह्मण-बनियों की CongRSS party ने लागू कर दिया। यही ब्राह्मणवादी वर्ग 1980 के दशक तक स्वदेशी अपनाओ, देश बचाओ जैसा नारा देते हुए स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठन चला रहा था। इस जातिवादी वर्ग को LPG में बहुजन समाज के प्रतिनिधित्व के एक एकलौते साधन आरक्षण को ख़त्म करने का आसान उपाय नज़र आने लगा। 1992 में मंडल कमीशन के कुछ सुझावों के लागू हो जाने से OBC वर्ग में भी आरक्षण की व्यवस्था लागू हो गयी थी जो कि सार्वजानिक छेत्र में ब्राह्मणवाद के लिए बड़ा सर दर्द बन गया था। इसलिए भारत में नवउदारवाद के LPG को सम्प्रदायिक हिंसा के तड़के के साथ परोसा गया जिससे की LPG के दूरगामी दुष्प्रभावों पर आम जनमानस में कोई सार्थक बहस न हो पाए। जातिवाद और नवउदारवाद से उभरे सम्प्रदायिक उन्माद पर सवार होकर जब BJP NDA के रूप में सत्ता में आयी तो उसने CongRSS संचालित UPA के LPG को पूरी ईमानदारी के साथ जारी रखा। 2014 में BJP के पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ जाने के बाद से Liberalisation, Privatisation, और Globalisation कि रफ़्तार कई गुना बढ़ गयी है। LPG को लागू करने वाली हर राजनितिक पार्टी को नवउदारवाद के अंतराष्ट्रीय आकाओं का खुला समर्थन मिलता है।

नवउदारवाद के अब तक के सफर से इतना तो तय है कि यह नीति दुनिया के हर मज़बूत वर्ग को और मज़बूत करती है। नवउदारवादी नीतियों से कमज़ोर, वंचित वर्ग और कमज़ोर होता है। इसका सबूत एक ओर जहाँ 1980 के दशक से पूरी दुनिया में भयानक रूप से बढ़ती हुई ग़ैर बराबरी से मिलता है वहीँ दूसरी ओर दक्षिण पंथ कि बजबजाती हुई फासीवादी राजनीति से टपकता है। पर्वावरण का खतरनाक दोहन, मज़दूर वर्ग का ज़बरदस्त शोषण, अमानवीय रूप से बढ़ती बेरोज़गारी, खाने और तेल कि बढ़ती हुई कीमतें, शिक्षा और स्वास्थ सुविधाओं का आम जान कि पहुँच से दूर हो जाना, मानवता का मशीनीकरण, Cyclical Economic Recession , आदि नवउदारवाद के अनुभव जनित नुकसान हैं।

यहाँ ये समझना ज़रूरी है कि नवउदारवाद आर्थिक सामाजिक समस्याओं से निपटने के लिए Free Market को एक वरदान के रूप में पेश करता है। नवउदारवादियों के हिसाब से Free Market आर्थिक फैसले लेने का एक निष्पक्ष और तटस्थ तरीका है। वो ये जान-बूझ कर भूल जाते हैं कि Free Market हमेशा प्रभुत्वशाली वर्गों के हाथ की कठपुतली होती है। Market पर जब तक आम जनमानस का लोकतान्त्रिक नियंत्रण रहता है तभी तक उसका इंसानी सरोकार ज़िंदा रहता है। इस लोकतान्त्रिक नियंत्रण के हट जाने से Market इस धरती के साथ-साथ पूरी मानवता को ही अपनी लाभ जनित भूख का निशाना बना लेने में एक पल को न हिचकिचाएगी। तेल के अनियंत्रित दोहन के लिए कितने ही देश नवउदारवादी देशों द्वारा युद्ध के दलदल में धकेल दिए गए जिसने लाखों मासूम जानों को देखते ही देखते निगल लिया।

भारत का अब तक का नवउदारवादी अनुभव भी केवल ब्राह्मणों-सवर्णों को ही लाभ पहुंचाता नज़र आ रहा है। निजीकरण के ज़रिये आरक्षण के खात्मे के साथ-साथ शिक्षा से बहुजन समाज का वंचित किया जाना भारत की एकता और अखंडता के लिए बहुत बड़ा खतरा है। इसलिए नवउदारवाद की LPG के खिलाफ सार्थक रणनीति बनाना बहुजन समाज की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। Liberalisation, Privatisation, और Globalisation के ऊपर लोकतान्त्रिक नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक नई चेतना के विकास की ज़रुरत है जो Global और Local Elite के गठजोड़ के खिलाफ International Front खड़ा कर सके। ये चुनौती इतनी बड़ी है की इस संघर्ष को जीवंत बनाने के लिए विरोधियों की कुछ रणनीतियों को अपनाने में संकोच नहीं करना चाहिए। जिस तरह से आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में ब्राह्मणवाद को फैलाने के लिए चार मठों की स्थापना की थी, उसी तरह आज भारत की चारो दिशाओं में चार शिक्षण संस्थान स्थापित करने की ज़रुरत है जहाँ पर मूलनिवासी बहुजन समाज का 100 % नियंत्रण हो। इन संस्थानों में बहुजन समाज के चिंतक-विचारक-शिक्षक, छात्र-छात्राएं, समाजसेवी-कार्यकर्ता Phule-Ambedkarite विचारधारा पर चलते हुए नवउदारवादी ब्राह्मणवाद से निपटने की रणनीतियों का निर्माण कर सकते हैं। नवउदारवादी ब्राह्मणवाद न सिर्फ आरक्षण को ख़त्म कर रहा है बल्कि ये भारत में हर तरह की लोकतान्त्रिक संभावनाओं को कुचलने के लिए भी प्रतिबद्ध है। ऐसे में अगर समय रहते कुछ निर्णायक रणनीतियों की खोज न हो पाई तो भारतीय गणराज्य का अकाल हिन्द महासागर में गर्त होना तय है।

===


Dr. Ayaz Ahmad,
CEC Member MKKM

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here