कोया पुनेमी धरोहर की रक्षक वीरांगना रानी दुर्गावती

Rani Durgavati Balidan Divas

गोंडवाना साम्राज्य की रानी दुर्गावती मूलनिवासी बहुजनों की प्रेरणा। भारत की अद्वितीय वीरांगना। जिसने मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में शासन किया। रानी दुर्गावती मूलनिवासियों के अंतर्भूत शौर्य, साहस, दृढ निश्चय के गुणों का रूप थी। पति के निधन के बाद रानी ने 15 वर्ष गोंडवाना राज्य की जिम्मेदारी संभाली। किसी महिला द्वारा 15 वर्षों से ज्यादा समय तक एक विशाल साम्राज्य का नियंत्रण और कुशल संचालन का बेजोड़ उदहारण भारतीय इतिहास में अद्वितीय है।

रानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। रानी दुर्गावती का जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के कलिंजर के किले में 5 अक्तूबर 1524 (संवत 1446, अश्विन सुदी अष्टमी) हुआ था. उनके पिता का नाम राजा कीरत राय (कीर्ति वर्मन) तथा माता का नाम कमलावती था. डॉ. सूर्या बाली “सूरज धुर्वे” इतिहास के साक्ष्य देकर कहते हैं कि कोइतूरों की एक शाखा चंदेल कोइतूर जिनका टोटम खरगोश होता है, कीरत राय इस वंश के थे।

रानी दुर्गावती का बचपन कलिंजर के किले में बीता। यही वो किला है जहां पर उन्होने घुड़सवारी, तीर तलवार के साथ-साथ बहुत से अन्य अस्त्र, शस्त्र चलाने सीखे तथा युद्ध कौशल सीखे। उनकी पढ़ाई लिखाई किले के अंदर राज शिक्षकों द्वारा सम्पन्न हुई।

चंदेल राजा कीरत राय और गोंड राजा संग्राम शाह के राज्यों की सीमाएं एक दूसरे से मिलती थी और दोनों राजाओं में काफी मित्रता भी थी। इसी कारण 1542 में चंदेल राजा कीरत राय की वीरपुत्री दुर्गावती का विवाह गोंडवाना साम्राज्य के राजा संग्राम शाह मडावी के पुत्र दलपत शाह मडावी गोंडी विधि विधान से हुआ था।

राजा दलपत शाह और रानी दुर्गावती को एक पुत्र हुआ जिसका नाम वीर नारायण सिंह रखा गया। दलपत शाह और दुर्गावती के विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपत शाह का निधन हो गया। उनके बेटे नारायण सिंह अभी छोटे बालक ही थे। सन 1550 में दलपत शाह की अकाल मृत्यु के बाद रानी दुर्गावती ने संग्राम शाह की रियासतों की बागडोर अपने हाथों में ली और अपने पुत्र बीर नारायण की संरक्षक बनकर शासन चलाने लगी।

गोंडवाना का विशाल साम्राज्य रानी दुर्गावती को अपने ससुर महाराजा संग्राम शाह और पति राजा दलपत शाह से विरासत में मिला था। पूरा गोंडवाना साम्राज्य छोटे छोटे 52 गढ़ों और 57 परगनों में बंटा हुआ था. उनका राज्य गढ़ा मंडला अपनी वैभव, संपन्नता और खुशहाली के लिए चारों ओर विख्यात था।

इतिहास इस बात का गवाह है कि रानी दुर्गावती अपने प्रजाजनों के दुःख-सुख का ध्यान रखनेवाली कुशल प्रशासक थी। उन्होंने एक मंत्रिपरिषद भी स्थापित किया था। अपने कुशल राजशासन के तहत उन्होने अपनी सेना को सुसज्जित और स्थायी बनाया। अपनी सेना और प्रजाजनों के लिए वह वीरता, उदारता, दूरंदेशी, बुद्धिमान राजनीतिज्ञ, कुशल प्रशासक की मिसाल थी। गोंडवाना राज्य शक्तिशाली और संपन्न राज्यों में गिना जाने लगा। इससे राणी दुर्गावती की ख्याति और फ़ैल गई।

रानी दुर्गावती ने अपने शासनकाल में अनेक लोकोपयोगी कल्याणकारी कार्य किये। खेती और पीने के पानी की व्यवस्था के लिए अनेक ताल और कुएं खुदवाएं। व्यवसाय और राहगीरों के लिए धर्मशालाएं निर्माण की। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था।

अकबर के जाने माने इतिहासकार अबुल फजल के मुताबिक सोलहवीं सदी में रानी दुर्गावती के शासन के अंतर्गत 70,000 गाँव थे जिसमें से 23,000 गाँव में भरपूर खेती होती थी। इन खेती वाले गांवों में उत्पादन का कुशल नियंत्रण और प्रबंधन की ज़िम्मेदारी भी स्वयं ले रखी थी जिससे गोंडवाना में रसद और खाद्य सामाग्री की कभी कमी नहीं पड़ी।

रानी दुर्गावती की प्रशासनिक क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने साम्राज्य को अक्षुन्य बनाए रखने के लिए और प्रत्येक गढ़ पर मजबूत नियंत्रित रखने के लिए गोंड कोइतूरों के स्थानीय राजाओं को पूर्ण स्वतन्त्रता और अधिकार दे रखा था। इन गोंड कोइतूर में मरकाम, टेकाम, सैयाम, मरावी, नेताम, ध्रुव इत्यादि प्रमुख थे। अपने सभी गढ़ प्रमुखों से रानी का बराबर संवाद बना रहता था. प्रसिद्ध इतिहासकार मुनि लाल अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “अकबर” में लिखते हैं कि रानी दुर्गावती को अपने सभी गाँव के पटेलों, सरपंचों और मुखियाओं के नाम और चेहरे याद रहते थे. वह अपनी प्रजा और मातहतों का भरपूर खयाल रखती थीं।
डॉ. सूर्या बाली “सूरज धुर्वे” लिखते हैं कि गोंडवाना का इतिहास अगर थोड़ा बहुत बचा है तो वो इन्हीं के कारण बचा हुआ है वरना ब्राह्मणवादी और सामंती सोच वाले लेखक और इतिहासकार तो कब का गोंडवाना का नामोनिशान मिटा चुके थे. दुखद पहलू ये है कि ऐसी महान व्यक्तित्व के बारे में भी बहुत कम लिखा गया है और जो कुछ लिखा गया वह द्वेष और ईर्ष्या के कारण पक्षपातपूर्ण ढंग से अधूरा लिखा गया है।

डॉ. सूर्या बाली “सूरज धुर्वे” के अनुसार उनके दरबार के ब्राह्मण मंत्रियों ने उन्हे दलपत शाह की मौत के बाद चिता के साथ सती होने के लिए प्रेरित किया था लेकिन रानी ने अपने कुल के गौरव और कोया-पुनेमी रीति रिवाज का निर्वहन किया और सती होने से साफ साफ मना कर दिया और कहा कि “मेरे खानदान में कुलवधू की परंपरा होती है न कि पुत्र वधू की। मैं राजा संग्राम साह की पुत्र वधू नहीं हूँ बल्कि मैं मड़ावी राजवंश की कुल वधू हूँ इसलिए इस विषम परिस्थिति में पति की चिता के साथ सती होने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि मैं अपने कुल परिवार और साम्राज्य को संभालू”. उन्होंने अपने पति की लाश को भी जलाने से मना कर दिया और सिंगोरागढ़ के किले के प्रांगण में ही राजा दलपत शाह को दफ़न करके उनकी समाधि बनवाई और पूरे कोया-पुनेमी रीति-रिवाज से पति की अंतिम क्रिया कारवाई. इससे ब्राह्मण और राजपूत मंत्री नाराज़ हो गए और रानी को नीचा दिखने और सबक सिखाने का बहाना ढूढ़ने लगे। वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपने जीते जी कभी भी गोंडवाना में कोया-पुनेमी सभ्यता के सिवाय कोई अन्य धर्म का पालन नहीं किया।

रानी दुर्गावती ने गोंडवाना राज्य की बागडोर संभालने के बाद उनकी मृत्यु के वर्ष वर्ष 1564 तक करीब 15 वर्षों में अनेकों युद्धों का नेतृत्व करते हुए वह लड़ीं लेकिन जीते जी उनमें से एक भी युद्ध नहीं हारीं. यह भारतीय इतिहास की अतुलनीय घटना है।

रानी की अपार शक्ति और लोकप्रियता का रहस्य उनकी विशाल सेना में था उनकी सेना में कुशल धनुर्धर और तलवार बाज मूलनिवासी गोंड लड़ाके थे। बताया जाता है कि उनकी सेना में 70,000 पैदल सैनिक और 2,500 हाथियों की सेना थी। उनके साम्राज्य का हर एक गांव साम्राज्य की रक्षा का गढ़ हुआ करते थे। उनकी गाँव पर पकड़ इतनी मजबूत थी कि कोई भी बाहरी व्यक्ति या सैनिक गोंडवाना के गाँव में घुसने की हिम्मत नहीं कर सकता था क्यूंकि गाँव वाले पहले ही उसे खदेड़ देते थे या रानी तक तुरंत खबर पहुंचा देते थे।

रानी के 15 वर्षों के कार्यकाल में गोंडवाना राज्य पर हमेशा शत्रु के हमले होते रहें। शत्रुओं को लगा कि यह महिला शासक है इसे आसानी से हरा सकेंगे।
वर्ष 1556 में मालवा के सुल्तान सुजात खान के बेटे बाज बहादुर ने रानी दुर्गावती पर पश्चिम की तरफ से हमला किया, लेकिन रानी दुर्गावती की सूझबूझ और कुशल युद्ध रणनीति के कारण बाज बहादुर को जान बचाकर भागना पड़ा। इस तरह एक स्त्री से हारने के कारण बाज बहादुर की बड़ी बदनामी हुई और उसको हराने के कारण रानी दुर्गावती की चर्चा चारों ओर तेजी से फैल गयी।

रानी दुर्गावती राज्य को अपने अधीन करने के लिए मुगल शासक अकबर ने कई बार प्रयास किये। रानी ने अकबर के सभी दावों को परास्त कर दिया।

इससे खफा अकबर ने अपने सरदारों के माध्यम से गोण्डवाना साम्राज्य पर हमला कर दिया। उसका सरदार आसिफ खा पराजित हो गया लेकिन पुनः उसने जोरदारतैयारी के साथ हमला बोला। इस युद्ध में रानी दुर्गावती स्वतः युद्धवेष परिधान करते हुए नेतृत्व किया। इस युद्ध में रानी ने अकबर को बड़ी शिकस्त दी लेकिन रानी के सेना को अपार क्षति हुयी थी।

यह घटना 23 जून 1564 की है। सुबह रानी के सैनिकों और आसफ़ खान के सैनिकों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। इसमें रानी के हाथी सेना के फौजदार अर्जुनदास बैस की मृत्यु हो गयी।

इस दिन रानी के पुत्र बीर नारायण ने आसफ खाँ की सेना को तीन बार पीछे धकेला और अंत में घायल हो गया। तब रानी ने अपने सिपाहियों को उसे सुरक्षित जगह चौरागढ़ (चौगान का किला) ले जाने का आदेश दिया और खुद अपने हाथी सरमन पर सवार होकर आसफ खान की सेना से लोहा लेने निकल पड़ी। आसफ खाँ की सेना में रानी दुर्गावती की सेना से कई गुना सैनिक, घुड़सवार और तोपखाने थे फिर भी रानी ने पूरी सेना को शाम तक मुक़ाबला करती रही और मुगल सेना को कई बार पीछे जाने पर मजबूर किया।

दिन के अस्त होने पर रानी ने अपने मंत्रियों और प्रमुख सेना अधिकारियों को बुलाया और उनसे कहा कि हम लोग अभी रात में ही मुगल सेना पर आक्रमण कर दें नहीं तो सुबह तक खुद आसफ़ खान अपने तोपखाने और गोला बारूद के साथ गढ़ा से नरई नाला आ जाएगा और युद्ध जीतना मुश्किल होगा। लेकिन रानी के प्रस्ताव से कोई भी सहमत न हुआ। रानी के प्रधान सचिव आधार सिंह और ब्राह्मण सलाहकारों ने ऐसा नहीं करने का सुझाव दिया। उनके सभी ब्राह्मण सलहकार महेश ठाकुर, केशव लौगाक्षि और लक्ष्मी प्रसाद दीक्षित आदि ने उन्हे रात्रि में युद्ध न करने का धर्म पाठ पढ़ाया और सेना के सेनापतियों को ऐसा न करने का सुझाव दिया और बताया कि इससे अनर्थ हो जाएगा और अपयश मिलेगा। इन मंत्रियों की सलाह मानना ही रानी दुर्गावती के लिए भारी पड़ा।

दूसरे दिन दिनांक 24 जून, 1556 को मुग़ल सेना ने फिर हमला बोला। इस युद्ध में, रणांगण में रानी को चारों तरफ से घेरा गया था। 24 जून 1564 की सुबह आसफ़ खान अपने तोपखाने के साथ नरई आ गया और दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। रानी अपने सबसे ऊंचे हाथी ‘सरमन’ पर होने के कारण आसानी से दुश्मन की नज़र में आ गयी थीं और बड़ी आसानी से दुश्मन के तीरबाजों के निशाने पे थीं। दोनों सेनाओं का युद्ध चल रहा था और रानी की सेना मुगलों को दोपहर तक पीछे धकेल रही थी। तभी एक तीर रानी की दायी कनपटी पर लगा जिसे रानी ने तुरंत निकाल कर फेंका लेकिन तीर का नोक रानी के शरीर के अंदर ही रह गया। फिर दूसरा तीर भी रानी के गर्दन में आ लगा। काफी खून बहने से रानी मूर्छित हो गयी और हाथी से नीचे गिर गयी। महावत आधार सिंह उन्हे बाहर लेकर जाने की तैयारी कर ही रहा था कि तभी रानी को थोड़ा होश आया, उन्होंने महावत आधार सिंह से कहा की वो उन्हे मार दे लेकिन वह तैयार नहीं हुआ फिर रानी ने अपनी ही कटार निकाली और अपने दोनों हाथों से पकड़कर एक ही झटके में अपने सीने में उतार ली और अपने जीवन का अंत कर लिया। वो किसी भी हालत में मुगलों के हाथ नहीं लगना चाहती थी और जिल्लत की ज़िंदगी नहीं जीना चाहती थी। यह दिन था 24 जून, 1556।

आज भी नरई नाले के पास रानी दुर्गावती और उनके हाथी सरमन की समाधियाँ बनी हैं जहां पर प्रतिवर्ष जनवरी में मेला लगता है। 24 जून को वीरांगना रानी दुर्गावती बलिदान दिन के रूप में याद किया जाता है।

आज रानी दुर्गावती के सम्मान में 1983 में जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय कर दिया गया। भारत सरकार ने 24 जून 1988 रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर एक डाक टिकट जारी कर रानी दुर्गावती को याद किया। जबलपुर में स्थित संग्रहालय का नाम भी रानी दुर्गावती के नाम पर रखा गया। लेकिन हमें केवल इससे संतुष्ट नहीं होना है। आज जगह जगह रानी दुर्गावती की प्रतिमाएं लगाई गयी है और लगाई भी जा रही है लेकिन इसके साथ ही हमें मूलनिवासियों के गोंडवाना साम्राज्य की रानी दुर्गावती के इतिहास को आज मूलनिवासियों के तमाम युवा और युवतियों को बताने की आवश्यकता है। जैसे जैसे हम अपने इतिहास के बारे में जानते हैं हमारी अस्मिता जागृत होती है।

डॉक्टर सूर्या बाली के शब्दों में कहें तो किसी भी कौम का इतिहास उसके महापुरुषों और महान मातृ शक्तियों के बलिदान और वीरता से बनता है. आज भले ही गोंडवाना अपने अस्तित्व की पहचान को बचाने के लिए जूझ रहा हो लेकिन गोंडवाना का अतीत बहुत ही गौरवशाली और महान रहा है. गोंडवाना की नारी शक्तियों में राजकुमारी हसला लांजी गढ़,रानी पद्मावती गढ़ा मंडला,रानी कमलापती गिन्नौरगढ़ भूपाल,रानी सुंदरी मरावी गढ़ मण्डला नामनगर, रानी मैनावती मरावी गढ़ा कटंगा, रानी देवकुंवर उईके देवगढ़, रानी हिरई आत्राम चांदा गढ़ और रानी दुर्गावती गढ़ा मण्डला प्रमुख हैं. कोइतूरों की मातृ सत्तात्मक शासन व्यवस्था की झलक इन रानी, महारानी और राजकुवरियों के बलिदान में देखी जा सकती है. ब्राह्मणवादी इतिहासकारों ने कभी भी गोंडवाना की इन वीर वीरांगनाओं को इतिहास में उचित स्थान और सम्मान नहीं दिया जिसकी वो हकदार थीं.

उन सभी ज्ञात अज्ञात मूलनिवासियों की महान नारी शक्तियों एवं गोंडवाना राज्य के गौरवशाली इतिहास की इस महान कोया पुनेमी धरोहर की रक्षक, देशप्रेमी, देशभक्त, वीरांगना रानी दुर्गावती को सादर सेवा जोहार! कोटि कोटि विनम्र अभिवादन!!

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