धर्म परिवर्तन का औचित्य।…दयाराम

सन 1970 के दशक में बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर द्वारा लिखित दो पुस्तकें “जातिभेद का उच्छेद” और “सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें” उत्तर प्रदेश की चौधरी चरण सिंह की संविद सरकार में कांग्रेस कोटे के एक ब्राम्हण मंत्री ने 10 मार्च 1970 को जप्त कर लिया। तत्पश्चात इन दोनों पुस्तकों की बहाली के लिए महामना रामस्वरूप वर्मा के प्रयास से ललई सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर किया और उन्होंने उन दोनों पुस्तकों को 14 मई 1971 को बहाल करवा लिया। डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी पुस्तक जातिभेद के उच्छेद में लिखा है, “वे लोग दोषी नहीं हैं जो जातिप्रथा को मानते हैं और एक दूसरे के साथ जातीय भेदभाव करते हैं। बल्कि वह धर्म दोषी है जिसकी धार्मिक धारणाओं पर जाति प्रथा की नींव रखी गई है”। वे अपनी दूसरी पुस्तक सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें में सुझाव देते हैं कि जो धर्म इंसान इंसान के बीच में नफरत पैदा करता है। वर्ण और जाति भेद का महिमामंडन करता है ऐसे धर्म को त्यागकर सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करो। सवाल पैदा होता है कि वह कौन सा धर्म है जिसमें जातीय भेदभाव है? क्या इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध,सिक्ख, जैन आदि किसी धर्म में वर्ण और जाति व्यवस्था है? उत्तर नहीं में मिलता है। किंतु ब्राह्मण धर्म अर्थात तथाकथित हिंदू धर्म से धर्मान्तरित अन्य धर्मों में भी जाति प्रथा के जर्म्स परिलक्षित होते हैं।

मैं बामसेफ संगठन के कार्य से पंजाब के फगवाड़ा शहर में अपने संगठन के वरिष्ठ साथी चरणजीत पटवारी के घर गया और देखा कि उनके घर के आस-पास मुझे तीन गुरुद्वारे दिखाई दिए। मैंने पटवारी जी से पूछा सर! क्या एक गुरुद्वारे से काम नहीं चल सकता यहां तीन गुरुद्वारे क्यों? उन्होंने मुझे बताया एक गुरुद्वारा रमदसिया सिखों का है। एक गुरुद्वारा जट सिखों का है और एक गुरुद्वारा मजहबी सिक्खों का है। उनका धर्म परिवर्तन तो हुआ किंतु विचार परिवर्तन नहीं हुआ जिसके कारण फिर वही ढाक के तीन पात, तीन जातियों के तीन गुरुद्वारे। ब्राह्मण धर्म एक ऐसा धर्म है जो तथाकथित हिंदू धर्म के रूप में प्रचारित किया जाता है, वर्ण और जाति व्यवस्था पर आधारित है जो मानव मानव के बीच में अपमान और घृणा भरता है ऐसे धर्म का परित्याग कर सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करने का सुझाव डॉक्टर अंबेडकर अपनी साहित्य संपदा में देते हैं। वे आचरण बिहीन जागरण नहीं करते बल्कि वे समता, ममता, करूंणा और मैत्री से परिपूर्ण बौद्ध धर्म को अंगीकृत भी करते हैं और बौद्ध धर्म के मानवीय मूल्यों को समाज में प्रस्थापित करने के लिए वे “गौतम बुद्ध और उनका धर्म”जैसा महान ग्रंथ लिख कर बौद्ध धर्म की नसीहत को देशवासियों को वसीयत के रूप में सौंपते हैं। जिस बौद्ध धर्म को वे अंगीकृत करते हैं उसको समझने में उन्हें इक्कीस वर्ष से भी अधिक समय लगा। तत्पश्चात उन्होंने नागपुर में 14 अक्टूबर1956 को बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और 22 प्रतिज्ञाएं ली। इसके बाद धर्म परिवर्तन का सिलसिला जारी हुआ विचार परिवर्तन की दृष्टि से नहीं बल्कि जब-जब अछूतों पर हिंदुत्व का कहर बरसा उन्होंने सामूहिक रूप से धर्मांतरण किया और वह सिलसिला आज भी जारी है। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जो तथागत बुद्ध के बहुजन हिताय बहुजन सुखाय से अपना राजनैतिक आंदोलन प्रारंभ किया। तत्पश्चात सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के मार्ग पर चलने का उद्घोष कर दिया।वे परशुराम की मूर्ति लगाने की घोषणा करती हैं और साथ ही साथ “हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश है”का उद्घोष सत्ता के स्वाद के लिए करती हैं। चार बार मुख्यमंत्री के पद को सुशोभित करने वाली सुश्री मायावती 2022 के विधानसभा चुनाव में मात्र एक सीट पर सिमट गयीं और वह सीट भी सर्वजन के हित में गई और जब अछूतों पर सर्वजन का जुर्म बड़ता है तो वह पुनः घोषणा करती हैं कि यदि दलितों पर जातीय जुर्म नहीं रुका तो वे बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेंगी। वे वैचारिक परिवर्तन के साथ नहीं बल्कि अपनी शर्त के साथ धर्म परिवर्तन करना चाहती हैं। वे सत्ता के स्वाद के लिए ब्राम्हण ऋषि परशुराम की मूर्ति लगवाने की घोषणा करती हैं जिस परशुराम ने पिता के कहने पर अपनी मां को मार डाला और इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार किया जैसा कि धर्म शास्त्रों में वर्णित है।

आर्य ब्राह्मणी सांस्कृतिक परंपराओं, मान्यताओं, विश्वासों पर टिकी है। सांस्कृतिक परिवेश में एक ब्राम्हण जिसे वेदों का कोई ज्ञान नहीं फिर भी वह अपने नाम के साथ द्विवेदी दो वेदों को जानने वाला, त्रिवेदी तीन वेदों को जानने वाला और चतुर्वेदी चार वेदों का जानने वाला जाति का बैज उसी तरह लगाता है जैसे कोई व्यक्ति पुलिस विभाग में दरोगा नहीं है और दरोगा का बैज लगाकर जनता के बीच में जाता है और वहां पुलिसिया धौंस जमाता है किंतु वह पकड़े जाने पर 420 के अंदर जेल भेज दिया जाता है। किंतु आर्य ब्राह्मणी संस्कृति में कोई सजा नहीं कोई कुछ भी सरनेम लिखता रहे। ठीक उसी तर्ज पर मूलनिवासी समाज के बच्चे अपने नाम के साथ गौतम लगाने की परंपरा डाल रखी है जो वास्तव में तथागत गौतम बुद्ध के विचारों से मामला जुड़ा हुआ है किंतु जो लोग अपने नाम के साथ गौतम लिखते हैं उन्हें भी तथागत गौतम बुद्ध के दर्शन का ज्ञान नहीं उनकी वही स्थिति है जैसे एक ब्राम्हण वेदों से अनभिज्ञ होने पर भी अपना जाति का बैज लगाता है। दिल्ली सरकार में एक अछूत कैबिनेट मंत्री जिसका मुख्यमंत्री “जय भीम” के नारे से अछूतों को लुभाता है उसका अछूत प्रेम जय भीम के नारे से है विचारों से नहीं। किंतु अछूत मंत्री को लगता है कि उसके मुख्यमंत्री अंबेडकरवादी हैं। इसलिए वे 5 अगस्त 2022 को देश की राजधानी दिल्ली में बौद्ध धर्म की दीक्षा लेते हैं और 22 प्रतिज्ञा की दो तीन लाइन के उच्चारण के बाद ही उनके ऊपर संकट के बादल मंडराने लगते हैं। मुख्यमंत्री महोदय को लगता है कि जिन सांस्कृतिक मूल्यों जीने ऋषि-मुनियों तथा भगवान की बदौलत वेद धर्म की राजनीति करते हैं उनके मंत्री ने उसकी अवहेलना की है इसलिए मुख्यमंत्री जी उनसे मंत्री पद से इस्तीफा मांग लेते हैं। वी इस बात की भी घोषणा करते हैं कि वह अंबेडकरवादी हैं झुकने वाले नहीं किंतुमंत्री महोदय अगले टिकट के लालसा में उस राज को छुपाकर रखते हैं कि उन्हें किसने इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया मात्र इस डर से कि अगला टिकट उनका न कट जाए। ऐसे जमीर बेचने वाले अछूत कैबिनेट मंत्री के धर्म परिवर्तन पर वाहवाही की बौछार होती है इसलिए कि उस कैबिनेट मंत्री ने बाबा साहब के मिशन के लिए कैप्टन मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और उस मुख्यमंत्री ने अपने सत्ता के स्वाद के लिए दिल्ली में जय भीम और गुजरात में हरे रामा हरे कृष्णा का उद्घोष करते हैं। उसका चरित्र मुंह में राम बगल में छुरी किंतु अछूत कैबिनेट मंत्री जैसे मुख्यमंत्री की छद्म नीति को समझ नहीं पाते।

ब्राह्मणी सांस्कृतिक मान्यताओं के तहत साठ के दशक में उत्तरी भारत के गांव में लोग जब अपने घर से बारात लेकर निकलते थे तो गाजे-बाजे के साथ स्थानीय देवताओं के स्थलों पर जाकर नतमस्तक होते थे। आज उनके वंशज गांव में रैदास मंदिर, बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर की लगी मूर्तियां पर जब इनके घरों से बारातें निकलती है तो वे किसी स्थानीय देवता के स्थान पर न जाकर रैदास मंदिरों और डॉक्टर अंबेडकर की मूर्तियों के सामने नतमस्तक होने के बाद ही बारात का प्रस्थान करते हैं। सन 2014 की बात है उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की एक गांव में मै 14 अप्रैल को शिरकत किया जहां बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर की मूर्ति पर प्रातः हलवा पूरी जैसे पकवान महिलाएं चढ़ा रही थीं वे आर्य ब्राह्मणी पूर्व निर्धारित सांस्कृतिक मूल्यों से प्रेरित थी। अभी हाल मैं ही 10 नवंबर 2022 को मेरे साले की लड़की की शादी हुई। लड़की की मां तथा उसके पक्ष के सगे संबंधी पुरानी विवाह पद्धति से शादी करना चाहते थे जिसमें सिंदूर और सात फेरों का महत्व अधिक है। उन्होंने पुरानी परंपराओं के तहत अपने घर के दरवाजे पर माड़ो गाड़ा। किंतु बारातियों ने प्रस्ताव रखा कि वे बौद्ध पद्धति से शादी करेंगे उन्हें पुरानी पद्धति मंजूर नहीं। लड़की पक्ष को बारातियों के सामने झुकने पड़े। शादी बौद्ध पद्धति हुई किंतु कन्या पक्ष के विचारों में सिंदूर के बगैर शादी का कोई औचित्य नहीं। सनातन पद्धति से शादी में वर कन्या के मांग को सिंदूर से भरता है। सिंदूर कन्या की शादी की निशानी माना जाता है किंतु बर की शादी की निशानी के लिए बर के माथे पर सिंदूर न डालकर विषमता मूलक संस्कृति का बीजारोपण किया जाता है। वर की तरफ से कन्या के गले में मंगलसूत्र डाला जाता है कन्या के मंगल के लिए किंतु कन्या के पक्ष की तरफ से बर के गले में कोई मंगलसूत्र नहीं यही विषमता मूलक ब्राह्मणवादी सनातनी संस्कृति है। कन्या पक्ष के अड़ने के कारण अंतत: वर को वधू की मांग में सिंदूर डालना ही पड़ा। इस विवाह समारोह में एक म्यान में दो तलवारें घूसेड़ने का कार्य किया गया। बिना विचार परिवर्तन के आचरण में परिवर्तन नहीं हो सकता। इसमें कन्या पक्ष का कोई दोष नहीं दोष उन पढ़े लिखे लोगों का है जो आर्य सांस्कृतिक परंपराओं के वसीभूत होकर बौद्ध पद्धति से शादी करवाते हैं। सनातनियों के सामने झुक जाते हैं। तथागत बुद्ध का दर्शन विज्ञान सम्मत है संस्कृति सम्मत नहीं क्योंकि संस्कृति संस्कारों से चलती है। यदि एक व्यक्ति को टीवी, दूसरे व्यक्ति को कैंसर और तीसरे व्यक्ति को डेंगू है। तीनों मरीजों की अलग-अलग दवाइयां होंगी एक ही प्रकार की दवाई से तीनों मरीज ठीक नहीं हो सकते। आर्य ब्राह्मणी संस्कृति में गायत्री मंत्र शादी में भी, सत्यनारायण कथा में भी, गृह प्रवेश में भी अर्थात सभी जगह कामयाब है। ठीक उसी प्रकार तथागत बुद्ध को मानने वाले घर में बच्चा पैदा होने पर त्रिशरण पंचशील और अष्टांगिक मार्ग का पाठ करवाते हैं। विवाह समारोह में भी त्रिशरण, पंचशील ,और अष्टांगिक मार्ग का पाठ किया जाता है और किसी के परिनिर्वाण पर भी त्रिशरण, पंचशील और अष्टांगिक मार्ग का पाठ किया जाता है। रुड़की शहर के पास के एक गांव नन्हेड़ा अनंतपुर में संगठन के एक कार्यकर्ता के पिता का निधन हो गया। मैं भी उनके अंतिम संस्कार में वहां पहुंचा। बौद्ध भिक्षु बुलाए गए। परिवारजन और उनके सगे संबंधी इस दुख की घड़ी में छाती पीट-पीटकर रो रहे थे। घर में कोहराम मचा हुआ था और दूसरी तरफ बौद्ध भिक्षु त्रिशरण, पंचशील और अष्टांगिक मार्ग का पाठ कर रहे थे जिनको सुनने वाला कोई नहीं था फिर भी उन्होंने अपना पाठ जारी रखा। आर्य ब्राह्मणी संस्कृति में भाग्यवाद, पुनर्जन्म, अंधविश्वास, पाखंड, चमत्कार जैसी परंपराओं, मान्यताओं और विश्वासों को एक पीढ़ी जब अपनी दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करती है उसे संस्कृति कहा जाता है जो बौद्ध सम्मत नहीं है।त्रिशरण, पंचशील और अष्टांगिक मार्ग कोई मंत्र नहीं बल्कि तथागत गौतम बुद्ध का क्रांतिकारी नैतिक दर्शन है जिसके आचरण से एक असभ्य मानव सभ्यता की उच्चतम शिखर पर पहुंच सकता है। तथागत गौतम बुद्ध के नैतिक दर्शन से ही अंगुलिमाल जैसा हिंसक डाकू हैवान से इंसान बन गया। तथागत गौतम बुद्ध ने कलाम सूत के माध्यम से संदेश दिया, किसी बात को इसलिए मत मानो कि बहुत से लोग उसे मानते चले आ रहे हैं।किसी बात को इसलिए मत मानो कि वह बात पवित्र ग्रंथों में लिखी हुई है। किसी बात को तर्क और तथ्यों के आधार पर यदि वह खरी उतरती है और मानव हित में है तो उसी बात को मानो। महा मना रामस्वरूप वर्मा ने एक सूत्र दिया, “जानो, छानो तब मानो”।

ब्राम्हण धर्म से पीड़ित लोगों ने धर्म परिवर्तन अवश्य किये किंतु उन्होंने अपने आचरण में परिवर्तन नहीं किया। वे बौद्ध धर्म की माला अवश्य पहन लेते हैं किंतु उनके विचारों पर सनातन धर्म का ताला लगा रहता है।सन1970 के दशक की बात है। मेरे गांव में एक कबीरपंथी साधु नागू दास बनारस से पधारे और उन्होंने गांव में लोगों के बीच में प्रवचन दिया और लोग उनके प्रवचन से इतना प्रभावित हुए कि बड़े बूढ़े बच्चे और महिलाओं तक कबीर पंथ अपनाने के लिए तैयार हो गए और गुरु जी ने रात में ही सभी के गले में कबीर पंथ की कंठी डालकर उन्हें कबीरपंथी बना दिया जैसे हिंदू रीति में वर वधु के गले में मंगलसूत्र डालता है। मेरे गांव की बूढ़ी मुंगिया बुआ कबीर पंथ अपनाने से वंचित रह गयी और वह इंतजार करती रही कि गुरुजी पुन:जब भी आवेंगे तो वह भी कबीर पंथ को स्वीकार करेंगी। संयोग से मैं रुड़की से अपने घर गया हुआ था और गुरु जी मेरे सामने ही आए और वह मुझे अच्छी तरह से जानते थे।मुंगिया बुआ कबीर पंथ स्वीकार करने के लिए रात में 8:00 बजे तैयार हो गयी और गुरु जी के आसन के सामने बैठ गई। गुरुजी सबसे पहले प्रवचन दिया तत्पश्चात उन्होंने मुगिया बुआ के कान में मंत्र डालना शुरू किया।पहला मंत्र था जिसे बुआ को दोहराना था, मैं मांस मदिरा का सेवन नहीं करूंगी। बुआ ने उसे दोहराया। दूसरा मंत्र था मैं झूठ नहीं बोलूंगी। इस मंत्र को भी बुआ ने दोहराया। मैं सदा सत्य बोलूंगी। बुआ ने इस मंत्र को भी दोहराया और अंतिम मंत्र था जिसको बुआ को पढ़ना था। मैं किसी से लड़ाई झगड़ा नहीं करूंगी। इस अंतिम मन्त्र पर मुगिया बुआ गुरुजी पर बिफर पड़ी और कहा कि अपनी कंठी माला अपने पास रखो। मुझे आपसे कोई भक्ति नहीं लेनी है। आप कह रहे हो किसी से लड़ाई झगड़ा मत करो मेरी छोटी बहू रोज मुझे गाली देती है। मुझे खाना देना तो बहुत दूर की बात मुझे वह पानी तक नहीं पूछती। मुझसे झगड़ा करती है।मैं तो इसका झोटा पकड़कर इसके सिर का एक-एक बाल नोच डालूंगी। किसी के अच्छे विचारों को जो मानव के कल्याण में हो उससे यदि किसी को जोड़ना है तो सबसे पहले उसके उन विचारों से तोड़ना पड़ेगा जिसमें वह संलिप्त है और जो उसके हित में नहीं है। बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के अनुसार “धर्म मनुष्य के लिए है मनुष्य धर्म के लिए नहीं है”।…

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