सामाजिक लोकतंत्र के आधारस्तंभ – लोकराजा राजर्षि छ. शाहू महाराज

राष्ट्रनायक लोकराजा राजर्षि छ. शाहू महाराज स्मृति शताब्दी वर्ष 2022 | विनम्र अभिवादन!

राजर्षि शाहू स्मृतिशताब्दी

आज पूरा देश अपने महान लोकराजा की स्मृति में गंभीरतापूर्वक विनम्रतापूर्वक अभिवादन कर रहा है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने उन्हें सामाजिक लोकतंत्र का आधार स्तंभ कहा, कानपुर के कुर्मी सभा द्वारा उन्हे राजर्षि की उपाधि अर्पण की, छत्रपति शिवाजी महाराज के रैयत के राज की विरासत को आगे बढ़ाया, राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले जी की संकल्पनाओं को अपने राज्य में प्रत्यक्ष रूप से लागू किया, शोषित पीड़ित समुदाय काय अपने राज्य के शासन-प्रशसन में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, व्यापार, कलाचार इन सभी क्षेत्रों में उन्होंने विशेष कार्य किया। अपने मात्र 25 वर्ष के कार्यकाल में जिन्होंने विज्ञानवादी सोच के आधारपर सामाजिक क्रांति को अग्रसर किया, जिन्होंने अपने राज्य में नारी आजादी को महत्व दिया, ब्रह्मणवाद से कडा संघर्ष किया, ऐसे महान लोकराजा का आज स्मृति शताब्दी दिवस है। जी हां, आज हमारे लोकराजा राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज का परिनिर्वाण दिवस है। 6 मई 1922 को उनका परिनिर्वाण हुआ था। 2022 यह उनका स्मृति शताब्दी वर्ष है।

भारत के सच्चे इतिहास में ऐसे राजा बहुत ही कम है, जिनका सभी लोग स्मरण करते हैं। अशोक महान, छत्रपति शिवाजी, राजर्षि शाहू इनके जैसे जनहीत में अपना जिवन, परिवार एवं सत्ता तक समर्पण करनेवाले राजा दुर्लभ या अपवाद कहे जाने प्रथम पंक्ति में बहुतही कम नजर आते है। 

लोकराजा राजर्षि शाहू महाराज का मूल नाम यशवंत था, वे कागल के जहगिरदार सरदार जयसिंगराव घाडगे और राधाबाई के सुपुत्र थे। 26 जून 1874 को उनका जन्म हुआ। उन्हे कोल्हापुर की राजगद्दी के लिए वारीस के तौर पर गोद लेकर उनका नामकरण शाहू कर दिया गया। अन्य राज्यो की तरह कोल्हापुर राज्य भी ब्रिटिशों के अधीन था और इसी कारण ब्रिटिशों ने उन्हे राजकारोबार चलाने की शिक्षा एवं प्रशिक्षण देने की व्यवस्था उनकी थी। सही समयपर अर्थात 1897 में कोल्हापुर राज्य की बागडौर उनके यानी शाहूजी के हात सौंप दी। 

कोल्हापूर राज्य की बागडौर हात आते ही शाहूजी महाराज ने 1899 में राज्य के प्रधान दिवाण के पद पर ब्राह्मण व्यक्ति के स्थान पर भास्करराव जाधव इस मराठा गैरब्राह्मण व्यक्ति की नियुक्ति कर डाली और यही से क्रांतिकारी संघर्ष शुरु हुआ। जब शाहू जी महाराजा ने कोल्हापुर का राजराठ संभाला था, उस दौरान सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पदों पर ब्राहाण अधिकारी आसीन थे, जबकि शेष 11 पदों पर पिछड़ी जाति के लोग थे।

सन 1901 में घटी वेदोक्त की घटना ने लोकराजा शाहूजी महाराज को जडमुल सें झंझोड़ दिया। वेदोक्त की घटना में उनके समग्र अधिकार और अस्तित्व को ही ब्राह्मणों ने चुनौती दे डाली। इस वेदोक्त प्रकरण में उनके खिलाफ बाल गंगाधर तिलक ब्राह्मणों का नेतृत्व कर रहे थे। इस संघर्ष में शाहूजी महाराज का साथ दिया सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ताओं ने। शाहू महाराज की वेदोक्त पूजा को नकारने वाले राजोपध्याय व शंकराचार्य के वतनों को उन्होंने खारिज किया तो यह प्रकरण ब्राह्मणवर्ग ने वायसरॉय तक ले गए। लेकिन विजय शाहू महाराज की हुई।

इस पृष्ठभूमि पर जब उन्होंने चिंतन अध्ययन किया तब राष्ट्रपिता जोतिबा फूलेजी द्वारा दिये गये सुझावों के अनुसार शासन प्रशासन में सभि के लिए उचित प्रतिनिधित्व के मामले पर उन्होंने अपना ध्यान केंद्रित किया।

सन 1902 की 26 जुलाई को समस्त पिछडे वर्ग को 50% आरक्षण घोषित करने वाला आदेश ही निकाल दिया। यह आदेश उन्होंने अपने जन्म दिवस 26 जून को जनता के प्रति कृतज्ञता के रूप में जारी किया था। इस आदेश में उन्होने पहली बार पिछडे वर्ग को स्पष्ट रुपसे परिभाषित करते हुये लिखा की, “ब्राह्मण, प्रभू, शेणवी और पारसी इनको छोडकर अन्य सभी जाति के लोगों को पिछडा समझा जाये।” केवल उन्होंने यह आदेश निकाला ऐसा नहीं बल्कि इसपर कड़ाई से अंमल भी किया।  पिछड़े वर्ग को आरक्षण की घोषणा के साथ उसपर ईमानदारी से अमल करनेवाली योजनाओं का भी उन्होने नये सिरे से सूत्रपात किया। धार्मिक क्षेत्र से लेकर उद्योग क्षेत्र तक सभी जगह अधिक से अधिक पिछडे वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हुये कठोरता से इस पर अमल किया। इस तरह शाहूजी महाराज ने शोषक एवं शोषित की पहचान को अधिकारीक रुप से घोषित कर एक क्रांतिकारी सामाजिक संघर्ष की पहल कर दी। 

उन्होंने यह पाया कि उनके राज्य में शासन, प्रशासन, शिक्षा, धर्म, कृषि, स्वास्थ्य, उद्योग, व्यापार, क्रिडा आदि क्षेत्रों में ब्राह्मण एवं तत्सम जातियो का ही वर्चस्व है। इस बात को समझकर उन्होंने पिछड़े वर्ग को, जिसे आज हम एससी, एसटी, ओबीसी के तौर पर जानते है को सन 1902 से लेकर 1922 तक बीस वर्ष के कालावधी में जनसंख्या के अनुपात में भागीदारी दी और ब्राह्मण एवं तत्सम जातियो के वर्चस्व को खारिज किया।

धार्मिक क्षेत्र में उन्होंने कई सारे बदलाव लाए। सदाशिव लक्ष्मण पाटील (बेनाडीकर पाटील) इस मराठा व्यक्ति को करवीर पीठ का निर्माण करते हुये शंकराचार्य पद पर नियुक्त किया। ब्राह्मणशाही के जाल से समाज को मुक्त किए बगैर, उच्च जातियों की धार्मिक व सामाजिक वर्चस्व समाप्त नहीं होगा यह उनका मानना था। ब्राह्मणशाही के पौरोहित्य को खारिज करते हुए उन्होंने ब्राह्मणेतर पुरोहितों की निर्मिती करने हेतु अलग से प्रशिक्षण की व्यवस्था की। 

अपने राज्य में उन्होंने नारी अधिकारों को अधिक महत्व दिया। उन्होंने तलाक व विधवा विवाह, विवाह पंजीकरण, अंतरजातीय विवाह, महिला विरोधी अत्याचार को रोक आदि संदर्भ में उन्होंने कानून बनाएं और उसे कड़ाई से लागू किया।

उन्होंने आर्यसमाज व थिऑसॉफिकल सोसायटी के साथ सत्यशोधक समाज को भी अपने राज्य में प्रोत्साहन दिया। लेकिन हम देख सकते हैं कि अपने राज्य में उन्होंने लिए अनेक निर्णयों पर सत्यशोधक विचारों का ही प्रभाव रहा।

उन्होंने डॉ बाबासाहेब अंबेडकर को सामाजिक परिवर्तन के कार्य में पूरा-पूरा साथ सहयोग दिया। उन्होंने माणगांव की परिषद में कहा की डॉ अंबेडकर किसी एक जाति के नेता नहीं है बल्कि पूरे भारत का नेतृत्व है।

जातिव्यवस्था को तोड़ते हुए, गंगाराम कांबले को चाय की होटल खुलवाकर उद्योग के लिए आमजनों को प्रेरणा दी। अपने राज्य में अनेक उद्योगों को शुरू कराया। अपने संस्थान की सभी सार्वजनिक जगहों पर छुआछूत को उन्होंने कानूनन पाबंदी लगाई।

घुमन्तु फांसपारधीयों को अपना अंगरक्षक चूनकर उनकी प्राकृतिक वीरता को सुअवसर दिया। इसी के चलते उनपर तथाकथित उँचे वर्ग के आतंकवादियों ने तिन बार खुनी हमले कराये। लेकीन शाहू महाराज की सतर्कता और जनता का उनके प्रति गहरा प्रेम तथा विश्वास रहते वे जिवीत रहे।

शिक्षा को लेकर उन्होंने कई योजनाओं को शुरू किया। अपने राज्य में प्राथमिक शिक्षा को निशुल्क और अनिवार्य किया। छात्रों के लिए राज्य में अनेकों छात्रावास, विद्यालय, महाविद्यालय शुरू किए। सभी जातियों और स्त्री पुरुषों को समान शिक्षा को लेकर उन्होंने बढ़ावा दिया। अपने राज्य के बाहर भी उन्होंने शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु कार्य किया। 

अपने कार्यकाल में शाहूजी महाराज ने सहकार क्षेत्र, राधानगरी डैम जैसे बडे बडे कार्यो को भी नया आयाम देते हुये समृध्द भविष्य की नींव भी डाली। चित्र, कला, संगीत, भारतीय खेल इन सभी बातों में भी उनकी विशेष रुची रहने के कारण कलाकार और खिलाड़ियों को उन्होंने उदारता से राजाश्रय दे कर उनका मनोबल बढाया।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उन्होने प्रतिबंधात्मक उपायों का अनुठा नियोजन कर दिया जिसके चलते उनके कार्यकाल मे उनके अपने क्षेत्र में प्लेग जैसी वैश्विक महामारी को काबू में रखा।  

ऐसे थे हमारे राजर्षि शाहूजी महाराज जनता बीच मे रहनेवाले, जनता का दुःख दर्द जाननेवाले, अपने आप को जनता के प्रतिनिधि माननेवाले। तभी तो लोग उन्हे लोकराजा कहते है।

सामाजिक लोकतंत्र का आदर्श उन्होने अपने कार्यो से स्थापित किया। आज उनका स्मृतिदिवस है। सौ साल पहले इसी तारीख को मुंबई में उन्होंने उम्र के अड़तालीस वर्ष में ही अंतिम श्वास लिया।

उनके इस स्मृतिशताब्दी वर्ष को हमने “सामाजिक लोकतंत्र निर्माण संकल्प वर्ष” के तौर पर घोषित करते हुये संकल्पित हो कर स्वयं को इस कार्य में समर्पित करना चाहीये। यही उनके लिए हमारा सच्चा अभिवादन होगा।

जय शाहू…जय संविधान…जय भारत…

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