26 जुलाई भारत के इतिहास का एक सुवर्ण पन्ना। इसी दिन, एक सदी पहले इस देश में एक ऐतिहासिक निर्णय हुआ था। पहली बार किसी शासनकर्ता ने ब्राह्मण हेजिमनी अर्थात ब्राह्मण वर्चस्व को खारिज किया था। उन्होंने देखा था कि उसके राज्य में प्रत्येक विभाग में एक ही वर्ग का कब्ज़ा है और वह है ब्राह्मण वर्ग। उसने यह भी सोचा कि क्या गैरब्राह्मण लोग नाकाबिल है? नहीं। तो फिर वह प्रशासन में क्यों नहीं है? उन्हें मालूम हुआ कि गैरब्राह्मण लोगों का शासनसत्ता में न पहुंचने के पिछे नाकाबिलियत यह कारण नहीं है। दूसरा ही कारण है। इसको गहराई से समझते हुए 26 जुलाई 1902 में इस महान शासनकर्ता ने अपनी रियासत में कानून बनाकर निर्णय किया कि उनके प्रशासन में 50 प्रतिशत पदों को पिछड़ों के लिए आरक्षित की जा रही है।
आपने ठीक पहचाना है। राजर्षि छत्रपति शाहू जी महाराज ने यह एक सदी पहले यह ऐतिहासिक निर्णय लिया था। उन्होने कहा था कोल्हापुर करवीर संस्थान सरकार के जितने भी पद है उनमें से 50 प्रतिशत पद पिछड़ों के लिए आरक्षित होंगी और बाकि पदों पर सभी लोग समान रूप से हकदार रहेंगे।
राजर्षि शाहू महाराज ने पिछड़े कौन है? इस सवाल का भी जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण, प्रभु, शेणवी, पारसी छोड़ बाकि जातियों को यह आरक्षण लागू है। आज इन्हे ही भारत के संविधान के तहत एससी, एसटी, ओबीसी कहा जाता है।
राजर्षि शाहू महाराज के निर्णय को ऐतिहासिक भूमिका भी है। राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले ने पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व की बात कही थी। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र के बारे में कहा था कि शिक्षा संस्थानों में ब्राह्मण वर्ग के ही शिक्षक और अधिकारी है। उनके अनुसार शिक्षा क्षेत्र में मूलनिवासी बहुजन समाज के शिक्षक और अधिकारियों की नियुक्तियां प्रमुखता से होनी चाहिए। राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज ने पुरे महाराष्ट्र में एक आंदोलन खड़ा किया।
राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले का 1890 में महापरिनिर्वाण हुआ। इसके ठीक 12 वर्ष बाद राजर्षि शाहू महाराज ने अपने संस्थान में ठीक इसी विचार का ऐतिहासिक निर्णय लिया और गैर ब्राह्मण जातियों को अपने संस्थान की 50 प्रतिशत पदें आरक्षित की।
आज इस ऐतिहासिक घटना को 119 वर्ष हुए है। आज एससी, एसटी, ओबीसी के प्रतिनिधित्व के आरक्षण को संविधान में मौलिक अधिकार कहा गया है। लेकिन फिर भी कुछ वर्ग इसे विरोध करते आ रहा है। संविधान लागू होने के बाद 40 वर्ष के बाद अन्य पिछड़े वर्ग अर्थात ओबीसी को कुछ हद तक आरक्षण प्राप्त हुआ है। आरक्षण विरोध लोग आज भी इसे विरोध कर रहे हैं। दुःख की बात यह है कि ओबीसी, एससी, एसटी में जिस मात्रा में जागृति होनी चाहिए थी, नहीं हुयी है।








