भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतित


दुनियाभर के 102 लेखकों ने भारत के राष्ट्रपति को लिखा पत्र
पेन अमेरिका और पेन इंटरनेशनल में जुटें दुनियाभर के लेखक स्वतंत्रता की पूर्वसंध्या पर लिखे पत्र में भारत के भी लेखक शामिल

“स्वतंत्र अभिव्यक्ति एक मजबूत लोकतंत्र की आधारशिला है। इस मूल अधिकार के कमजोर होने से अन्य सभी अधिकार ख़तरे में हैं और एक स्वतंत्र गणराज्य के रूप में भारत के उभरने पर किए गए वादों से गंभीर रूप से समझौता किया जा रहा है।” यह वाक्य किसी किताब या किसी के भाषण से नहीं लिए गए है। बल्कि दुनिया के ख्यातनाम 102 लेखकों और कलाकारों ने भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से लोकतांत्रिक आदर्शों का समर्थन करने का आह्वान किया।

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त 102 लेखक व कलाकार इस पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए लेखकों के संगठन पेन अमेरिका और पेन इंटरनेशनल में शामिल हुए थे।

पेन अमेरिका यह वर्ष 1922 में न्यूयॉर्क में स्थापित लेखकों व कलाकारों नेटवर्क ऑर्गनईजेशन है। पोएट, एस्सेईस्ट, नावेलिस्ट के पहले आद्यक्षरों से इसका पेन यह नाम बना है। दुनिया भर में 7500 से अधिक लेखक व कलाकार इस नेटवर्क के सदस्य है।

15 अगस्त को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में के अनुसार मरीना अब्रामोविक, पॉल ऑस्टर, जेएम कोएत्ज़ी, जेनिफर एगन, जोनाथन फ्रेंज़ेन, अजार नफीसी और ओरहान पामुक सहित 102 लेखकों और कलाकारों ने भारत की आजादी के 75 वर्ष अर्थात अमृत महोत्सव के अवसर पर भारत के राष्ट्रपति को 14 अगस्त को पत्र लिखा है। पत्र में भारत के जेलों में बंद लेखकों, असहमति रखने वालों और आलोचकों को रिहा किए जाने की मांग की है।

राष्ट्रपति को निवेदन करते हुए इस पत्र के अंत में लिखा है कि हम आपसे भारत की स्वतंत्रता की भावना में स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बढ़ावा देने और उसकी रक्षा करने वाले लोकतांत्रिक आदर्शों का समर्थन करने और एक समावेशी, धर्मनिरपेक्ष, बहु-जातीय और -धार्मिक लोकतंत्र के रूप में भारत की प्रतिष्ठा को बहाल करने का आग्रह करते हैं, जहां लेखक नजरबंदी के खतरे, जांच, शारीरिक हमले, या प्रतिशोध के बिना असहमति या आलोचनात्मक विचार व्यक्त कर सकते हैं।

पत्र में कहा गया है कि स्वतंत्र भारत ने कई औपनिवेशिक युग अर्थात अंग्रेजों के काल के उन कानूनों को कायम रखा है जो बोलने की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करते थे और आलोचनावादी लेखकों और पत्रकारों को आरोपित करने के लिए उपयोग किए जाते थे।

इस पत्र पर हस्ताक्षर करने विश्वभर से जुड़ें लेखकों में से भारत के झुम्पा लाहिरी, अब्राहम वर्गीज, शोभा डे, राजमोहन गांधी, रोमिला थापर, आकार पटेल, अनीता देसाई, गीतांजलि श्री, पेरुमल मुरुगन, पी. साईनाथ, किरण देसाई, सुकेतु मेहता और जिया जाफरी आदि शामिल है।

आपको बता दें कि गोविंद पानसरे, नरेंद्र दाभोलकर, एमएम कलबुर्गी, और गौरी लंकेश जैसे प्रमुख पत्रकारों, विचारकों और लेखकों की हत्याओं और ‘बिना किसी जवाबदेही के जांच की धीमी गति’ के मुद्दों को इस पत्र में उठाया गया है। मोहम्मद जुबैर, सिद्दीकी कप्पन, तीस्ता सीतलवाड़, अविनाश दास और फहद शाह सहित लेखकों, स्तंभकारों, संपादकों, पत्रकारों और कलाकारों के ‘उत्पीड़न’ पर भी कड़ा विरोध दर्ज किया है।

भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखे इस पत्र व विज्ञप्ति को pen.org इस वेबसाइट पर आप पढ़ सकते हैं।

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