गैर सरकारी शिक्षा संस्थाओं में एलकेजी यूकेजी (पूर्वप्रथमिक शिक्षा) के बच्चों की बुक, फीज, स्कूल की तानाशाही अक्सर देखने को मिलती है। लेकिन सरकार और इन शिक्षा संस्थानों पर सवाल कौन उठाता है?
गैर सरकारी स्कूलों की तानाशाही होती है कि कॉपी किताबें स्कूल से ही लेनी होंगी, हजारों में इनकी क़ीमत, फीस भी हजारों में। की स्कूलों की खबर आती है कि फीस लेट हुई तो बच्चों को प्रताड़ित किया गया, ताकि माता-पिता को दहशत मिलें।
फिर भी लोग अपने बच्चों को इन गैर सरकारी स्कूलों में पढ़ाने पर मजबूर हैं। क्यों?
जिस देश में सरकारों को 80 करोड़ लोगो के लिए 5 किलो राशन देना पड़ रहा है, वहां कैसे इन स्कूलों में शिक्षा ले सकते है?
सरकारी स्कूल में पढ़ाई की जगह खाना बनाने और उसका हिसाब किताब पर जोर होता है। यानि वहां पर शिक्षा जीरो।
हर मां-बाप अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए सरकार की तरफ आशा भरी नजरों से देखते हैं। पर दिन दहाड़े लूट हो रही है।
क्या सरकार अनुच्छेद 45 को ध्यान में रखकर शिक्षा के नाम पर इस लूटमारी पर रोक लगाएगी? क्या सरकारी स्कूलों की शिक्षा और व्यवस्था को ठीक करेगी? जिससे हर नागरिक को बेहतर और समान शिक्षा मिल सके।
नागरिकों को शिक्षा अगर मिलेगी तो आगे जाकर देश के विकास मे अपनी भूमिका अदा करेंगे और यदि अनपढ़ रहेंगे तो उन्हे बोझ कहा जाएगा। जिम्मेदारी सरकार की है। और अच्छी सरकार बनाने की जिम्मेदारी नागरिकों की है।
भूपेन्द्र सिंह, उत्तराखंड
इनकी फेसबूक पोस्ट पर आधारित
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