क्या मनुवादी मानसिकता के साथ शासन करते हैं असम के मुख्यमंत्री?

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हाल ही में एक बार फिर भाजपा नेताओं के मनुवादी मानसिकता की झलक देखने को मिली हैं। बीते छब्बीस दिसंबर, दो हजार तेईस को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने अपने एक्स हैंडल जो ट्विटर का बदला हुआ नाम है पर पोस्ट करते हुए दावा किया की, शुद्र – ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा करने के लिए हैं।

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इस देश में आरएसएस की फैक्ट्री से निकलने वाले नेताओं की न चाहते हुए भी उनकी मनुवादी मानसिकता की झलक लोगो के सामने आ ही जाती हैं।

इससे यह सिद्ध भी होता हैं की, मनुवादी मानसिकता से ग्रसित नेता देश के पचासी फीसदी मूलनिवासी बहुजन समाज के प्रति क्या सोच रखते हैं।

बताते चले की बीते चब्बीस दिसंबर, दो हजार तेईस को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने अपने एक्स हैंडल जो ट्विटर का बदला हुआ नाम है पर पोस्ट कर दावा किया की, शुद्र – ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा करने के लिए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री की पोस्ट में एक एनिमेटेड वीडियो भी शामिल था, जिसमें कहा गया था कि, खेती, गाय-पालन और व्यापार वैश्यों के अभ्यस्त और प्राकृतिक कर्तव्य हैं, जबकि तीन वर्णों – ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य – की सेवा करना शूद्रों का स्वाभाविक कर्तव्य है।

इन शब्दों को सुनना और समझना आपके लिए इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि, ये शब्द किसी प्रदेश के सरकार के हैं।

ये शब्द है भाजपा शासित प्रदेश असम के मुख्यमंत्री की जो चीख चीख कर खुद को मनुवादी मानसिकता के होने का दावा कर रहे हैं।

संवैधानिक पदों पर बैठ कर इस तरह से दावे और पोस्ट करना संविधान की अवहेलना हैं।

असम के मुख्यमंत्री शायद यह भूल चुके हैं की, संवैधानिक पद पर रहते हुए आपने प्रत्येक नागरिक के साथ समान व्यवहार करने की शपथ ली थी।

अगर आपको धार्मिक ग्रंथों से फुर्सत मिले तो कभी संविधान को पलट कर देखिएगा, जिसके कई अनुच्छेदों के विरोध में आपने यह पोस्ट किया हैं।

बताते चले की भारतीय संविधान के अनुच्छेद तेरह के अनुसार, “अधिकारों से असंगत या उन्हें कम करने वाली विधियाँ शून्य होंगी।” यानी की असम के मुख्यमंत्री जिस वर्णव्यवस्था की गुणगान कर रहे हैं, उसे संविधान निर्माताओं ने संविधान बनाने के समय ही शून्य कर दिया था।

साथ ही अनुच्छेद तेरह, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों को यह शक्ति प्रदान करता है जिनके आधार पर मूल अधिकारों से असंगत विधियों को वे अवैध घोषित करते हैं ।

हालांकि मुख्यमंत्री के इस मनुवादी मानसिकता वाले ट्वीट के बाद मुख्यमंत्री को कई लोगो के विरोध का सामना करना पड़ा और बाद में बीते अठाईस दिसंबर को इस पोस्ट को डिलीट करते हुए माफी मांगी।

इस पोस्ट के पीछे उन्होंने यह दलील दी की, उनकी टीम के एक सदस्य ने भगवद गीता के एक श्लोक का गलत अनुवाद पोस्ट कर दिया था। उन्होंने माफी मांगते हुए यह दावा किया कि, असम जातिविहीन समाज का उदाहरण है।

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