राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज ने महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश में भ्रमण कर आध्यात्मिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकात्मता का उपदेश दिया है । इतना ही नहीं उन्होंने 1955 में जापान जैसे देश में जाकर सबको विश्वबंधुत्व का संदेश भी दिया था। 1956 में उन्होंने स्वतंत्र भारत का पहला संत संगठन बनाया। अंतिम समय तक अपने प्रभावी खंजडी भजन के माध्यम से उन्होंने अपनी विचारप्रणाली का प्रचार तथा आध्यात्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय प्रबोधन किया।

उन्होंने अमरावती के पास मोझरी में गुरुकुंज आश्रम की स्थापना की। वहां उन्होंने अपने अनुभवों और अंतर्दृष्टि के आधार पर ‘ग्रामगीता’ की रचना की, जिसमें उन्होंने वर्तमानकालिक स्थितियों का निरूपण करते हुए ग्रामीण भारत के विकास के लिए एक नया विचार प्रस्तुत किया। वे मानते थे कि ग्राम विकास होने से ही राष्ट्र विकास होगा। उनकी विचारधारा का केंद्र बिंदु ग्रामोन्नती एवं ग्राम कल्याण ही था। इसी कारण उन्होंने ग्रामविकास की विविध समस्याओं के मूलभूत स्वरूप का विचार प्रस्तुत किया और उसे कैसे सुलझाएं इस विषय पर उन्होंने उपाय और योजनाएं भी बताई।

संत  तुकड़ो जी महाराज का जन्म (1909–1968) महाराष्ट्र के अमरावती जनपद के यावली नामक एक गांव में गरीब परिवार में हुआ था। उन्होंने वहां और बरखेड़ा में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की। उनके प्रारंभिक जीवन में उन्होंने कई महान संतों से संपर्क किया, लेकिन समर्थ अडकोजी महाराज की उन पर विशेष कृपा रही और वे उनके शिष्य बने।
तुकडोजी महाराज का मूल नाम माणिक था। तुकडोजी महाराज का नाम इसलिए तुकडोजी है क्योंकि भजन गाते समय जो भीख मिलती थी, उस पर ही उनका बचपन का जीवन बीता था। उनका ये नाम उनके गुरु अडकोजी महाराज ने रखा था। वे स्वयं को ‘तुकड्यादास’ कहते थे।  

उन्होंने अपने पूरे जीवनमें हृदय की पवित्रता और किसीके लिए भी मनमें द्वेषभाव न रखनेका पाठ पढ़ाया। अपने प्रारंभिक जीवनमें वह प्रायः भक्तिपूर्ण गीतोंको गाते थे, हालांकि बीतते समयके साथ-साथ उन्होंने समाजको यह बतलाया कि भगवान केवल मन्दिर, चर्च या मस्जिदमें नहीं रहता; अपितु वह तो हर जगह व्याप्त है। उसकी (भगवानकी) शक्ति असीम है। उनका लिखा मराठी भजन बोहोत प्रचलित है ,
 मनी नाही भाव, म्हणे देवा मला पाव , 

देव अशान, भेटायचा नाही हो।

देव बाजारचा भाजीपाला नाही हो

उन्होंने औपचारिक रूपसे बहुत ज्यादा शिक्षा नहीं ग्रहणकी थी, किंतु उनकी आध्यात्मिक भावना और उसकी संभाव्यता बहुत ही उच्च स्तरकी थी। उनके भक्ति गीतोंमें भक्ति और नैतिक मूल्योंकी बहुत ही ज्यादा व्यापकता है। उनकी खँजड़ी, एक पारंपरिक वाद्य यंत्र, बहुत ही अद्वितीय था और उनकेद्वारा उसे बजाया जाना अपने आपमें अनूठा था।

 हालांकि वह अविवाहित थे; परंतु उनका पूरा जीवन जाति, वर्ग, पंथ या धर्मसे परे समाजकी सेवाके लिए समर्पित था। वह पूर्णरूपसे आध्यात्मिक जीवनमें लीन थे। उनकेद्वारा सूक्ष्मतासे मनुष्यके स्वभावका अवलोकन किया जाता था, ताकि उन्हें उत्थानके राहपर प्रवृत्त किया जा सके।

वे कहते थे ……. 

हो पंथ पक्ष समाज सब 
सब की निराली शान हो पर देश का हर भेष   का 
इंसान यह इंसान हो 
पूरक बने सबके सभी 
पथ छोड  खींचतान के 
निश्चय करें हम पूर्ति है 
बस एक ही भगवान के।  

उनका साहित्यिक योगदान बहुत अधिक और उच्च श्रेणी का है। उन्होंने हिंदी और मराठी दोनों ही भाषाओंमें तीन हजार भजन, दो हजार अभंग, पाँच हजार ओवीसके अलावा धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षापर छह सौ से अधिक लेख लिखे। 

बता दे की राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज तथागत बुद्ध  के विचारों का पालन करते थे  , उन्होंने २५०० वी बुद्ध जयंती एक ही समय पर लगभग  १०००  गाओ  में मनाई।  तुकडोजी महाराज द्वारा मराठी भाषा में रचित एक महाकाव्य है जिसमें भारतीय ग्राम्य जीवन के विविध पक्षों का चित्रण है।  
 आध्यात्मिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकात्मता का उपदेश देने वाले महान राष्ट्रसंत  तुकड़ो जी महाराज उनके जयंती दिवस पर mnt न्यूज़ नेटवर्क उन्हें विनम्र अभिवादन करता है।    राष्ट्रसंत  तुकड़ो जी महाराज के विचारप्रणाली का अनुसरण  कर मूलनिवासी बहुजनो के जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास mnt न्यूज़ नेटवर्क  हमेशा करता रहेगा। 
जय भीम जय मूलनिवासी

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