23 जुलाई को आयोध्या में हो रहा है ब्राह्मण सम्मेलन..
पार्टी महासचिव और पार्टी का ब्राह्मण चेहरा सतीश मिश्रा को दी जिम्मेदारी..
विधान सभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने फिर एक बार ब्राह्मणों के वोटों के लिए 23 जुलाई 2021 को आयोध्या में ब्राह्मण सम्मेलन करने का ऐलान किया है। मायावती का मानना है कि ब्राह्मण आनेवाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को वोट नहीं देंगे।
आपको बता दें कि सतीश मिश्रा जोकि बसपा में ब्राह्मण समुदाय का चेहरा है, को ब्राह्मण समुदाय को बसपा के साथ जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई है। ब्राह्मणों को बसपा के साथ जोड़ने के लिए यह बताया जा रहा है कि बसपा शासन में ही ब्राह्मणों के हित सुरक्षित हो सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में सत्ता पर दावा कर रही हर एक पार्टी को सत्ता में आने के लिए 35 से 40 फीसद वोट की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश में वोटों का गणित अलग अलग प्रकार से किया जा रहा है। एक अनुमान के तहत यह बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के वोट 10 प्रतिशत के आसपास है। दूसरी ओर यह बताया जाता है कि ठाकुर वोटिंग 7 प्रतिशत के करीब है।
आपको बता दें कि राजनैतिक मामलों के जानकार यह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय तथाकथित “हिन्दुत्व की राजनीति” से ज्यादा खुद के प्रतिनिधित्व और हित को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। देश और राज्य की राजनीति में हमेशा ब्राह्मणों का ही वर्चस्व रहा है। जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है आजादी के बाद से वर्ष 1989 तक 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन 1990 के बाद से ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना है। अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग में अपने अधिकारों की चेतना का निर्माण होना यह इसके पिछे सबसे बड़ी वजह बताया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अनुसूचित जाति, अन्य पिछडा वर्ग और मुस्लिम समुदाय केंद्र में है। आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के वोट 20 प्रतिशत माने जाते हैं, करीब उतने ही वोट मुस्लिम समुदाय के हैं। बच्चा हुआ पिछड़ा वर्ग अलग अलग टुकड़ों में बटा हुआ है। अर्थात आंकड़ों की तरफ देखा जाए बच हुआ 43 प्रतिशत वोटों अधिकतर पिछड़ों का हिस्सा है, जिसमें यादव वोट संख्या में अधिक है।
दूसरी ओर 2007 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की के चुनाव जीते हुए उम्मीदवारों में 41 ब्राह्मण थे और दस वर्ष बाद 2017 के चुनाव में बीजेपी के विधायकों में से 46 ब्राह्मण चुने गए। लेकिन ब्राह्मण समुदाय की आकांक्षाएं इससे अधिक है।
राम मंदिर के कारण बीजेपी ब्राह्मण वोटों को अपना हिस्सा मान रही है और उसकी नजर सपा बसपा से नाराज ओबीसी और एससी जातियों पर है। जिसके लिए ओबीसी के सब-कटेगराइजेशन को बीजेपी ने मुद्दा बनाया है। इससे यह साफ दिखाई देता है कि ओबीसी और एससी आपस में एक दूसरे के विरोध में खड़े हों।
ऐसे में मायावती द्वारा ब्राह्मण सभा बुलाकर ब्राह्मणों का तुष्टीकरण करने की नीति कितनी काम आएगी इस पर सवाल है। दूसरी ओर फूले-अंबेडकर विचारधारा के कार्यकर्ताओं का मायावती पर यह आरोप है कि वह इस विचारधारा से भटक गई है और वह अब बहुजनों की पार्टी नहीं रही है।







