ओबीसी महिला आरक्षण के बिना 33 प्रतिशत आरक्षण बिल निरर्थक…डा लता प्रतिभा मधुकर

क्या संसद में कल सचमुच महिला आरक्षण विधेयक पारित हुआ?
33 प्रतिशत आरक्षण के साथ प्रधान मंत्री मोदी ने जन गणना का मुद्दा जोड़ा है। जब तक जनगणना नही होगी आरक्षण नहीं मिलेगा।
आज लोकसभा और राज्यसभा में दो दलित और एक आदिवासी और दो ओबीसी महिला प्रतिनिधियों के अलावा सारी उच्च वर्णीय और सवर्ण जाति की महिला प्रतिनिधि है। sc और st को पहले ही 33 प्रतिशत में आरक्षण मौजूद है। लेकिन ओबीसी महिलाएं उस में से गायब हैं। देश की संपूर्ण महिला जनसंख्या में 52 प्रतिशत ओबीसी महिलाएं शामिल है, लेकिन उन का प्रतिनिधित्व नहीं है। जब तक उन का समावेश नही होगा 33 प्रतिशत में तब तक एससी , एसटी में से केवल 2 आदिवासी, 2 दलित महिलायें नाममात्र रखकर 29 प्रतिशत सारी सवर्ण और सधन महिलाएं (जैसे आज भी है) लोकसभा, राज्यसभा में सदस्यत्व लेंगी और लेते आई हैं। सवर्ण महिला प्रतिनिधि को स्थानीय स्वराज संस्था में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं। उन्हे संसद में इंटरेस्ट है।
ये बिल न लाने के पीछे ओबीसी नेताओं को खलनायक या खलनायिका के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है। सवाल है कि आज ओबीसी महिलाओंको अगर भाजपा या धर्मांधता से दूर करना हैं, तो उन्हे मैनस्ट्रीम में लाने के सारे अवसर, सहूलियत , आरक्षण खुले करने होंगे। आज सब से ज्यादा उत्पादक, कारीगर, किसान, और असंगठित मजदूर महिलाएं ओबीसी जातियों में हैं। उन्हें जन आंदोलनों में और राजनीतिक पार्टी में भी ओबीसी के नाम पर संगठित नही किया जा रहा है। बल्कि किसी परियोजना के विस्थापित के तौर पर, या वंचित परिभाषा की तहत। जो जमीन को जोते बोए , वो ही जमीन के मालिक होना तो दूर , अब वे मजदूर भी नही रहे। उन्हे संगठित करने का एकमात्र तरीका है शोषित ओबीसी का जनसंगठन… ओबिसी जन गणना और ओबीसी जाती के स्त्री, पुरुष और अन्य को आरक्षण देना आज नितांत आवश्यक है। ओबीसी महिलाओं को 33 प्रतिशत में उन की संख्या की तुलना में भागीदारी मिलनी चाहिए। वैसे भी आरक्षण की जरूरत उच्च वर्णिय महिलाओं को कम है क्यों कि आज भी वे ही संसद में प्रतिनिधि है और उन की सीट आरक्षित है , उन की लड़ाई केवल उच्च वर्णिय पुरुष प्रतिनिधियों के साथ हैं। इसलिए ओबीसी महिलाओं को दूर रखने की साजिश में इन उच्च वर्णिय प्रतिनिधियों का भी हाथ हैं।
ओबीसी महिलाओं ने अब 33 प्रतिशत में उन की संख्या की तुलना में आधा आरक्षण मांगना चाहिए। तब 3 प्रतिशत वर्ण की 3 प्रतिशत भागीदारी होगी। मुस्लिम, ख्रिस्ती, बौद्ध, जैन, सीख तथा अन्य धर्म जिस में ओबीसी हो, उन्होंने भी इस मांग को उठाना चाहिए। अन्यथा सावित्री फातिमा की बेटियों ने जिन्होंने हम सब के हाथ में कलम दी और ब्राह्मण वादी पितृसत्ता का पर्दाफाश किया, उन महान क्रांति ज्योति के साथ गद्दारी होगी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य महिलाओं के हक के लिए इस देश की ओबीसी, आदिवासी , दलित _बहुजन महिला और पुरुष नायक महानायक ने लड़ाई की। उन की कोई भी महिला ने 1848 तक भी अपने ऊपर हो रहे अन्याय अत्याचार के विरुद्ध ललकार नही पाई थी। उच्च वर्ण की महिलाओं को बाल विवाह, केशवपन, अशिक्षा, अज्ञान की कीचड़ से बाहर निकालने वाली ये बहुजन प्रतिभाशाली , बुद्धिमान, शिक्षित महिलाएं थी। उन को कीचड़ में फेंककर अज्ञानी रखने का कार्य जिस ब्राह्मण वादी पितृसत्ता ने किया है, उस के खिलाफ ओबीसी महिलाओं का साथ देने आदिवासी और दलित महिलाऐं जैसी खड़ी है सवर्ण /उच्चवर्णीय महिलाओं को ओबीसी महिला के आरक्षण की मांग को आगे आकर समर्थन देने की जरूरत है। जाती आधारित जनगणना और उस आधार पर ओबीसी महिलाओं का 33 प्रतिशत आरक्षण में हिस्सा मंजूर होना चाहिए।
हमारे इस मांग का जहां सम्मान होगा, उस का हम भी सम्मान करेंगे।


©डा लता प्रतिभा मधुकर
( भारतीय पिछड़ा ओबीसी शोषित संगठन )

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