“सेंगोल” जादू की छड़ी अथवा जनतंत्र विनाशक आगाज।

“सेंगोल” तमिल भाषा का शब्द है। यह संस्कृत भाषा के सकु शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ शंख होता है। शंख सनातन धर्म में पूजा के अवसरों पर प्रयोग किया जाता है। सेंगोल शब्द का संबंध धर्म से है। यह धर्म की राजनीति का प्रतीक है। जिस धर्म की राजनीति में देश की जनता के पास संप्रभुता न होकर ब्राह्मणों के पास संप्रभुता होती है। महाभारत में श्री कृष्ण युद्ध के मैदान में शंखनाद करते हैं। यहां श्री कृष्ण गीता में उपदेश देते हैं अर्जुन मार! मारना ही धर्म है। “न हन्यते हन्यमाने शरीरे”अर्थात मारने से शरीर का नाश होता है आत्मा का नहीं क्योंकि आत्मा अजर और अमर है। सेंगोल के विषय में प्रचारित किया गया कि चोल वंश में जब एक राजा दूसरे राजा को सत्ता हस्तांतरण करता था तो उसे वह सैंगोल भेट करता था। इससे मामला बिल्कुल साफ हो जाता है कि सेंगोल शब्द का संबंध राज्य तंत्रीय व्यवस्था से है लोकतांत्रिक व्यवस्था से नहीं। फिर भारत की नई संसद में सेंगोल की स्थापना क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म कर राजनैतिक शासन व्यवस्था लाने का आगाज है? यहां सैंगोल का अर्थ राजदंड बताया जाता है जबकि सैंगोल का संबंध धर्म से है इसलिए इसे धर्मराजदंड ही कहना उचित होगा। अर्थात धर्म द्वारा राज करने की यन्त्रणा।

भारत की नई संसद में सैंगोल की प्रस्थापना 28 मई 2023 अर्थात वी. डी. सावरकर के जन्मदिन के शुभ अवसर पर जिस वी. डी. सावरकर ने अंग्रेजों के समक्ष पांच दया याचिकाएं दायर किया था जबकि भारत के मूलनिवासी अमर शहीद भगत सिंह और उधम सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके उन्होंने फांसी के फंदे को ही चुना किन्तु झुके नहीं। देश की जनता को इस बात का चिंतन करना अवश्य चाहिए कि आखिर वी.डी. सावरकर ने कौन सा ऐसा राष्ट्रहित में कार्य किया था जिसके जन्मदिन पर भारत की नई संसद में सेंगोल की प्रस्थापना की गई और उन्हें लोग वीर सावरकर कहते हैं। दया याचिका दायर करने वाला व्यक्ति वीर कैसे? नई संसद में सेंगोल की प्रस्थापना से पूर्व, प्रचारित किया गया कि इस सेंगोल को ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण करते समय 14 अगस्त 1947 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को हस्तांतरण किया था जबकि 26 नवंबर 1949 को डॉक्टर अंबेडकर ने भारत का संविधान तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जिनके साथ पंडित जवाहरलाल नेहरु भी खड़े थे,को हस्तांतरित किया। उन्होंने सेंगोल को क्यों गोल कर दिया? यह एक देश की जनता के सामने सवाल है? इस सैंगोल को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इलाहाबाद के एक म्यूजियम में सुरक्षित रखा जिसका उपयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई संसद में स्पीकर के आसन के बगल में प्रस्थापित किया। दंड का अर्थ छड़ी भी होता है और दंड का अर्थ दण्ड देना भी होता है। स्कूल का टीचर बच्चों को पढ़ाने में दंड के तौर पर छड़ी का प्रयोग करता था और आज भी कहीं कहीं अध्यापक करते हैं और कहीं कहीं तो उसी छड़ी के माध्यम से जातिय द्वेष से टीचर बच्चों को इतना पीटते हैं कि वह छड़ी जानलेवा साबित हो जाती है।

आर्य संस्कृति की रक्षक भाजपा सरकार और उसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की नई संसद में सेंगोल प्रस्थापित कर राजतंत्र का शंखनाद किया है जिसमें शासन सत्ता संविधान से नहीं बल्कि धर्म से चलेगी। धर्म शास्त्रों की धार्मिक धारणाओं से चलेगी। वर्ण धर्म के अनुसार सभी वर्णों के लोग धर्म शास्त्रों द्वारा निर्धारित कार्य को करेंगे। धार्मिक धारणाओं के विरोध करने पर उन्हें मनुस्मृति अथवा धर्म सूत्रों के अनुसार दंडित किया जाएगा। जाट गुर्जर अहीर गड़रिया कुर्मी पासी चमार खटीक कहार धोबी सभी के सभी आर्य सांस्कृतिक मूल्यों के अनुसार अपना-अपना कार्य करेंगे।क्षत्रिय राजा होगा और वह ब्राह्मणों की मंत्राणा के बगैर कोई भी कार्य नहीं करेगा। दंड व्यवस्था मनुस्मृति की धार्मिक धारणाओं के अनुसार निर्धारित होगी। शुद्र को अपने से ऊपर के तीनों वर्णों की निन्दा रहित होकर सेवा करना ही उसका धर्म होगा। शिक्षा का दरवाजा उसके लिए बंद होगा फिर उसे शेर की तरह दहाड़ ने का अवसर ही नहीं मिलेगा। यह सेंगोल लोकतांत्रिक व्यवस्था को नष्ट कर राज्यतंत्रीय व्यवस्था को प्रस्थापित करेगा जिसमें संप्रभुता ब्राह्मणों के हाथ में होगी भारत की जनता के हाथ में नहीं। जैसा कि संवैधानिक व्यवस्था में संप्रभुता देश की जनता को के हाथ में होती है। आर्यपुत्र चाहे वह कांग्रेसी हो अथवा भाजपाई, समाजवादी हो अथवा साम्यवादी सभी का लक्ष्य एक है क्योंकि भारत की संवैधानिक व्यवस्था ने उन लोगों को उनके बराबर लाकर खड़ा कर दिया जो उन्हें कभी अपने पैर की जूती समझते थे। संविधान ने उनके हाथों में संप्रभुता प्रदान किया जिसे आर्यपुत्रों ने अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा कार्य समझा। ऐसा वे महसूस करते हैं।इसलिए वे अपने बौद्धिक षड्यंत्र के माध्यम से भारत की नई संसद में सेंगोल की स्थापना किया। भारत की नई संसद में सेंगोल की स्थापना लोकतांत्रिक मूल्यों को तहस-नहस कर ,राज्यतंत्रीय व्यवस्था लाने का उनका शंखनाद है जिसको भारत की मूलनिवासी जनता को समझने की नितांत आवश्यकता है। संवैधानिक व्यवस्था ने आर्य पुत्रों के जीवन के पूर्व निर्धारित मूल्यों को तहस-नहस किया जिसके कारण उनका भिन्न-भिन्न संस्थाओं से एकाधिकार समाप्त होने लगा जिसके कारण उन्होंने समय-समय पर नए पैंतरा बदलते रहे हैं। सेंगोल आर्य पुत्रों की जादू की छड़ी जैसे प्रतीत होती है जिसको देश की आम जनता समझ नहीं पाती क्योंकि बौद्धिक षड्यंत्र दिखाई नहीं देता उसका परिणाम जब सामने आता है तो लोगों को पछतावा के अलावा कुछ नहीं मिलता क्योंकि तब तक वह समय निकल चुका होता है जिसपर समय रहते कुछ किया जा सकता था। भाजपा और उसके नेताओं ने बड़े षड्यंत्र के तहत भारत की नई संसद में सेंगोल की स्थापना किया और उन्होंने अपने तरीके से उसके गुणों पर प्रकाश डाला। हकीकत यह ब्राह्मणवाद के पुनर्स्थापना का आगाज है जिसको भारत की जनता समझ नहीं पा रही है क्योंकि उसका दिमाग आर्य ब्राह्मणी सामाजिक व्यवस्था के नियंत्रण में है जिसके लिए आर्य ब्राम्हण अनवरत रूप से उनके दिमाग में धार्मिक धारणा डालने में प्रयासरत रहता है। 28 मई 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की नई संसद में जो सेंगोल स्थापित किया है इसका भविष्य में परिणाम भयावह होगा इसलिए देश की जनता को सेंगोल के विषय में चिंतन मनन शुरू कर देना चाहिए अन्यथा भारत का भविष्य बहुत बड़े संकट से गुजरेगा और भारत पुन:गुलामी की जंजीरों में जकड़ जाएगा। भारत के मूलनिवासी जब तक राजनीतिक सत्ता को अपने हाथों में शासक जातियों से नहीं छीनेंगे तब तक वे आर्य ब्राह्मणों के बौद्धिक षड्यंत्र के शिकार होते रहेंगे।
डॉक्टर अंबेडकर ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन लंदन में अपने संबोधन में कहा था, “हमारे दुख को अपने सिवाय कोई और नहीं मिटा सकता और हम अपने दुख को उस समय तक समाप्त नहीं कर सकते जब तक हमारे हाथों में राजनैतिक सत्ता न आ जाय”।…….

मा.दयाराम (पीपीआई-डी)

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