सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश ने कहा, पूजा अर्चना बंद करके हमें संविधान के सामने झुकना चाहिए ।

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बीते तीन मार्च, दो हजार चौबीस को सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश ने एक नए न्यायालय भवन के शिलान्यास कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि, कोर्ट के कार्यक्रमों के दौरान पूजा-अर्चना बंद कर देना चाहिए। इसके बजाय संविधान के सामने झुकना चाहिए।

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बीते तीन मार्च दो हजार चौबीस को सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश जस्टिस अभय एस. ओका ने कहा कि, अदालत से संबंधित कार्यक्रमों में पूजा-अर्चना बंद कर दी जानी चाहिए और कार्यक्रमों की शुरुआत से पहले संविधान की प्रस्तावना की एक प्रति के सामने झुककर धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

यह बात उन्होंने तब कही जब वे पुणे के पिंपरी-चिंचवाड़ में एक नए न्यायालय भवन के शिलान्यास कार्यक्रम में पहुंचे थे।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओका ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सुझाव दिया कि, अदालत से संबंधित कार्यक्रमों में पूजा अर्चना यानी हिंदू धार्मिक अनुष्ठान बंद कर दी जानी चाहिए और कार्यक्रमों की शुरुआत से पहले संविधान की प्रस्तावना की एक प्रति के सामने झुककर धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि, डॉ. आंबेडकर ने हमें एक आदर्श संविधान दिया है जिसमें धर्मनिरपेक्षता का उल्लेख है। हमें इसे आगे बढ़ाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि, हमारी अदालत व्यवस्था भले ही अंग्रेजों द्वारा बनाई गई हो लेकिन यह हमारे संविधान से चलती है और अदालतें संविधान द्वारा दी गई हैं।

जस्टिस ओका ने यह भी कहा कि, संविधान के पचहत्तर वर्ष पूरे होने पर नई प्रथा शुरू की जानी चाहिए और इस बात पर जोर दिया कि संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक शब्द उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि, जब संविधान के पचहत्तर वर्ष पूरे हो जाएं तो इसकी गरिमा बनाए रखने के लिए हमें यह नई प्रथा शुरू करनी चाहिए और यह समय हमारे लिए धर्मनिरपेक्षता को आगे बढ़ाने का सबसे अच्छा अवसर है।

आपकी क्या राय हैं? जस्टिस अभय एस. ओका के सुझाव पर। क्योंकि यह बात उस समय और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं जब संविधान लागू हुए सात दशक से अधिक का समय हो चुका हो।

भले ही हमारे पास विश्व की सबसे बेहतरीन संविधान हैं, लेकिन आज भी संविधान पूर्णरूप से इस देश में लागू नहीं हुई हैं।

इसी देश में हमें संविधान विरोधी लोग दिख जाते हैं, जो खुले आम संविधान की प्रतियां जलाते हैं। लेकिन सरकार और खुद को संविधान समर्थक बताने वाले मनुवादी मानसिकता के लोग और राजनीतिक पार्टियां शांत रहती हैं।

देश का संविधान जाति, धर्म और नस्ल से ऊपर हैं। संविधान ने देश को धर्मनिरपेक्ष रखा हैं और संविधान से ही देश की अदालतें चलती हैं फिर अदालतों के कार्यक्रमों में किसी विशेष धर्म की पूजा अर्चना क्यों?

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