अन्य 10 दलों को कुल मिलकर मात्र 19.38 करोड़ रुपये चंदे में दिए।
करीब 212.05 करोड़ रुपये अकेले बीजेपी को और जेडीयू को 27 करोड़।
असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) का अध्ययन।
पूंजीवादी और राजनीतिक दलों का आर्थिक गठजोड़।
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भारत की पूंजीवादी ताकतें राजनैतिक सत्ता पर हमेशा प्रभाव डालती है। उसका महत्वपूर्ण जरिया होता है, चुनावी चन्दा। आजादी के पहले से काँग्रेस को इस देश की पूंजीवादी ताकतों ने समर्थन दिया। क्योंकि शायद उन्हे पता था कि कभी न कभी अंग्रेज इस देश से जाने वाले है, इसलिए इस देश की सत्ता उन लोगों के हाथों में हो जिनसे उनका तालमेल हैं। इसलिए इन पूँजीपतियों का काँग्रेस को न केवल आजादी के पूर्व भरपूर सहयोग मिला, बल्कि आजादी के बाद भी मिलता रहा। लेकिन आज पलड़ा थोड़ा पलट रहा है। आज काँग्रेस के साथ साथ बीजेपी को भी इस देश की पूंजीपति ताकतें भरपूर मदद कर रही हैं।
यह हम इसलिए बता रहे हैं क्योंकि हाल ही में हुए एक अभ्यास के तहत यह पता चला है कि इलेक्टरल ट्रस्ट जिन्हे हिंदी में चुनावी न्यास कहते हैं उन्होंने बिते समय जितना कुछ धन राजनैतिक दलों को बतौर दान दिया है उनमें से सबसे ज्यादा धन बीजेपी को दिया है। 2020-2021 के बिच 82 (बयासी) प्रतिशत से अधिक धन अकेले बीजेपी को दिया है।
एडीआर अर्थात असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट से पता चलता है कि सात एलेक्टरल ट्रस्ट ने अपनी 258.49 (दो सौ अंठावन करोड़ दशमलों उनचास) करोड़ रुपयों की राशि में से 82 (बयासी) प्रतिशत राशि बीजेपी को दी है।
आपको बता दें की एडीआर ने इसपर विस्तृत अध्ययन किया है। अध्ययन के अनुसार देश के 23 एलेक्टरल ट्रस्ट में से 16 ट्रस्टों ने 2020-2021 की अपनी जानकारी चुनाव आयोग को दी है, जिनमें से केवल 7 ट्रस्टों ने राशि मिलने की घोषणा की है। इसमें उद्योग घरानों और व्यक्तियों से कुल 258.49 (दो सौ अंठावन करोड़ दशमलों उनचास) करोड़ रुपये मिले जिनमें से 99.98 प्रतिशत वितरित किए हैं। इस कुल रकम में से करीब 212.05 (दो सौ बाढ़ करोड़ 50 हजार) रुपये बीजेपी को प्राप्त हुए हैं। यह कुल राशि का 82.05 है। बीजेपी की सहयोगी पार्टी जनता दल यूनाइटेड को 27 करोड़ मिले हैं मतलब 10.45 फीसद चन्दा मिल है।
बाकी राजनैतिक दलों की बात करें तो काँग्रेस, राष्ट्रवादी काँग्रेस, अन्ना द्रमुक, द्रमुक, राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी, भाकपा, माकपा, लोकतान्त्रिक जनता आदि 10 दलों को कुल मिलकर 19.38 (उन्नीस करोड़ अड़तीस लाख) रुपये की राशि इन सात ट्रस्टों द्वारा प्राप्त हुई है। रिपोर्ट की माने तो सात ट्रस्टों में 2020-21 में 159 व्यक्तियों ने अपना अंशदान किया।
साथियों, यह तो हुई कानूनी तरीके से चुनावी चंदे की बात। लेकिन आपको यह भी पता होगा की सबसे ज्यादा धनराशि चुनाव पर खर्च करने वाली पार्टी अगर कोई है तो आज भारतीय जनता पार्टी है उसके बाद काँग्रेस है। बीजपे को चुनावी बॉन्ड से भी हजारों करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। साथियों आपको यह भी पता होगा कि अनेक कई नेता ऐसे हैं जो काँग्रेस से निकलकर भाजपा में चले गए हैं। उसी तरह इन चुनावी न्यासों का भी दिखता है।
हालांकि, उद्योगपतियों और उद्योग घरानों की शासक जातियों के प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ साठगांठ नई बात नहीं है। उद्योग घरानों के अनुकूल कानून, नियम बनाना और बजट में प्रावधान करना यह इनका प्रमुख लक्ष्य होता है। इसके खिलाफ समय-समय पर समाज से विरोध होता रहा है। हाल ही में हुआ किसान आंदोलन यह इसका उदाहरण हम कह सकते हैं।
खैर, बीजेपी काँग्रेस जैसे शासक जातियों के बड़े दलों को उद्योगपतियों और उद्योग घरानों से हर तरीके से आर्थिक मदद मिलती है यह बात साफ जाहीर है। लेकिन हम इसके बारे में कितने चिंतित है? क्या हम संविधान को लागू करने की राजनीति के लिए अपना आर्थिक समर्थन देते हैं? इस देश के अगर 2 करोड़ लोग भी सालाना 500 रुपये संविधान को लागू करने की लिए राजनीतिक दलों को देते हैं तो भी हम इन उद्योगपतियों और उद्योग घरानों और इनके राजनैतिक दलों की साँठगाठ को परास्त कर सकते हैं।
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