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जब से बिहार में जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक हुई हैं, तब से देश की राजनीति में हड़कंप मची हुई हैं। बिहार के मूलनिवासी अपनी संख्या के आधार पर अपनी हिस्सेदारी की मांग करने लगे हैं।
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बिहार सरकार द्वारा जारी जातिगत जनगणना के आंकड़ों के अनुसार बिहार में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गो की संख्या प्रदेश की कुल आबादी का चौरासी फीसदी हैं।
आंकड़ों के मुताबिक बिहार की कुल आबादी तेरह करोड़ सात लाख पच्चीस हजार तीन सौ दस (13,07,25,310) हैं । जिसमे से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग की आबादी लगभग ग्यारह करोड़ के आस पास हैं।
बिहार की कुल आबादी में अगर हम एससी, एसटी और ओबीसी की
आबादी की बात करे तो बिहार में अत्यंत पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की आबादी सबसे अधिक छत्तीस दशमलव शून्य एक फीसदी (36.01%) हैं।
आगर संख्या में बात करे तो तेरह करोड़ की आबादी वाले बिहार में ओबीसी की आबादी चार करोड़ सत्तर लाख अस्सी हजार पांच सौ चौदह (4,70,80,514) हैं।
अत्यंत पिछड़ा वर्ग के बाद प्रदेश में सबसे अधिक पिछड़ा वर्ग यानी बीसी की आबादी हैं । जो सताइस दशमलव एक दो (27.12%) फीसदी के साथ राज्य में दूसरी सबसे बड़ी समुदाय हैं।
अगर संख्या में बात करे तो बीसी (पिछड़ा वर्ग) की आबादी तीन करोड़ चौवन लाख तिरसठ हजार नौ सौ छत्तीस (3,54,63,936) हैं।
इसके बाद सबसे बड़ी समुदाय बिहार में अनुसूचित जाति की हैं। जो प्रदेश में उन्नीस (19%) फीसदी के साथ तीसरे स्थान पर हैं।
अनुसूचित जाति की आबादी की बात करे तो प्रदेश में एससी की आबादी दो करोड़ छप्पन लाख नवासी हजार आठ सौ बीस (2,56,89,820) हैं।
जबकि अनुसूचित जनजाति की बात करे तो प्रदेश की कुल आबादी में वे एक दशमलव छह आठ फीसदी हैं। यानी संख्या में वे लगभग बाइस लाख के आस पास होते हैं।
अगर हम बिहार के एससी, एसटी और ओबीसी की आबादी को जोड़ दे तो यह संख्या ग्यारह करोड़ से अधिक हो जाती हैं। यानी बिहार की कुल तेरह करोड़ की आबादी में ग्यारह करोड़ बिहार के मूलनिवासियों की आबादी हैं।
जबकि दो करोड़ के आस पास जनरल कैटेगरी के लोग हैं। जिनमे ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ जैसी जातियां शामिल हैं।





