केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को ‘जाग’ जाना चाहिए : आईएमए। मशहूर चिकित्सा पत्रिका ‘द लैंसेट’ (The Lancet) ने भी की आलोचना।

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देश में चरमराती स्वास्थ्य सुविधा, दवाइयों की कालाबाजारी, नीजि अस्पतालों की जमाखोरी के खिलाफ समाज में असंतोष बढ़ रहा है। दूसरी तरफ सरकारी अस्पताल और फ्रंट लाइन वर्कर पर काम का दबाव बढ़ रहा है।

आपको बता दें कि विदेश से मदद भी भारी मात्रा आ रही है। लेकिन इसके व्यवस्थापन की कमी दिखाई दे रही है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट द्वारा मेडिकल ऑक्सीजन को लेकर बनाया गया टास्कफ़ोर्स भी केंद्र सरकार की कई कमियों एवं लापरवाही को सामने ला रहा है।

इसी बिच हाल ही मे अब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने भी स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिख्खार नींद से जाग जाने की बात कि है।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने शनिवार 8 मई के एक पत्र में कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को ‘जाग’ जाना चाहिए और कोविड-19 महामारी से पैदा हो रही चुनौतियों से निपटने के लिए कदम उठाना आवश्यक है।

आईएमए ने यहां तक कह डाला है कि ‘कोविड-19 महामारी की दूसरी भयानक लहर से निर्माण संकट से निपटने में स्वास्थ्य मंत्रालय की ढिलाई और अनुचित कदमों को लेकर आईएमए बिल्कुल चकित है।’

केंद्र सरकार पर न केवल भारत के अंदर से हमला हो रहा है बल्कि वैश्विक चिकित्सा मंडली भी आलोचना कर रहे हैं।

अमेरिका की मशहूर चिकित्सा पत्रिका ‘द लैंसेट’ (The Lancet ) के हाल ही के एडिशन के सम्पादकीय में मोदी सरकार की नीति पर टिप्पणी की है।

‘द लैंसेट’ के सम्पादकीय में कहा गया कि “भारत ने COVID-19 को नियंत्रित करने में अपनी शुरुआती सफलताओं पर पानी फेर दिया. अप्रैल तक कई महीने बीतने के बावजूद भी सरकार की COVID-19 टास्क फोर्स पूरी नहीं हुई थी. उस निर्णय के परिणाम आज हमारे सामने स्पष्ट हैं. भारत को अब जब संकट बढ़ रहा है, अपने प्रतिक्रिया बल का पुनर्गठन करना चाहिए.”

इसी पत्रिका ने 2018 में नरेंद्र मोदी सरकार की आयुष्यमान भारत को लेकर जमकर तारीफ़ भी की थी। लेकिन आपको बता दें कि केंद्र आयुषमान भारत योजना यह अधीकतर नीजि क्षेत्र की स्वास्थ्य यंत्रणा पर ही अधिक निर्भर थी।

स्वास्थ्य संबधी कई बातों के लिए केंद्र सरकार हमेशा राज्य सरकारों को जिम्मेदार मानते रहा है। लेकिन आप अगर केंद्र की स्वास्थ्य मंत्रालय की कार्यक्षेत्र को देखेंगे तो उनका बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण दायरा है जिसमें कार्य होना चाहिए। इसके बावजूद वर्तमान सरकार के कुछ बुद्धिजीवी समर्थक स्वास्थ्य विषय को समवर्ति सूचि में रखने के लिए संविधान संशोधन की बात कर रहे है।

यह जाहिर है कि अस्पताल और औषधालय सुविधा यह राज्य का विषय है लेकिन समवर्ती सूचि में भी संक्रामक रोगों की रोकथाम, सामाजिक बीमा आदि विषयों के साथ साथ केंद्र सूचि की बीमा, वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्था, विशेष अनुसंधान तथा अध्ययन, दवाइयाँ आदि कई विषय ऐसे हैं जिसमें केंद्र को अपनी भूमिका निभानी है।

इसलिए इस बात को लेकर कोई आश्चर्य नहीं है जब केंद्र सरकार के ज्यादातर मंत्री चुनाव प्रचार में व्यस्त थे, तब महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में कोरोना की दूसरी लहर आयी, तब अपने राज्य की स्थिति को देखते हुए, राज्यों ने केंद्र की राह न देखते हुए, अपने अपने राज्य में कदम उठाने शुरू किए। इसमें कोविड-19 की टेस्टिंग, उपचार और टीकाकरण आदि पर अपने स्तर पर ध्यान देने के लिए लॉक डाउन लगाया गया।

वैक्सीन, ऑक्सीजन आदि बातों को लेकर केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों का टकराव शुरू हुआ। क्योंकि वैक्सीन जैसी कई वैद्यकीय बातें केंद्र के पास हैं।

आपको बता दें कि जब देश में इकोनॉमिक स्लो डाउन अर्थात आर्थिक मंदी की स्थिति आयी थी तब केंद्र सरकार ने अपनी तिजोरी खोलकर ऑटोमोबाइल, बैंकिंग सेक्टर के साथ साथ कई उद्योगों को मदद की थी। अब स्वास्थ्य सुविधाओं को ठीक करने के लिए राज्यों के साथ के तालमेल बनाते हुए क्या ऐसी कोई पहल हो सकती है? यह सवाल मन में उठना स्वाभाविक है।

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