मंत्रियों की जातियों के नाम गिनाने वाली सरकार जातीय जनगणना क्यों नहीं कराती?

कांग्रेस और भाजप की ओबीसी के बारे में एकजैसी नीति क्यों है? यह सवाल गंभीर है, और उसका कारण भी है। कारण है ओबीसी की संख्या, शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व, गरीबी, स्वास्थ्य, भूमि आदि के बारे में आंकड़े न होना। उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में ओबीसी के कई सारे मामले केवल इन आंकड़ों को तरसते रहे हैं। इन आंकड़ों को इकट्ठा करने का रास्ता देश की सार्वजनिक जनगणना है। इसको लेकर जाति आधारित जनगणना की मांग बार बार उठी है। लेकिन  कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपने काल में जाति आधारित जनगणना को करने से नकार दिया है। आखिर कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों ने सत्ता में रहते हुए क्यों इस प्रकार से बर्ताव किया?

आपको बता दें कि मंडल कमीशन ने ओबीसी के बारे में जनसंख्या को लेकर आंकड़े नहीं होने से निर्माण हुयी समस्याओं को उद्घाटित किया है। मंडल कमीशन के बाद ओबीसी की ओर से जाति आधारित जनगणना की मांग बार बार की गयी है। लेकिन अभी तक सरकारें इन आकड़ों को इकट्ठा करने के लिए पहल नहीं कर रही है। 

आपको बता दें कि 1996 में जब एचडी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री थे, उनके कार्यकाल में जातिआधारित जनगणना को सरकार ने मान्यता दी थी। उनके बाद आई के गुजराल प्रधानमंत्री बनें यह निर्णय कायम था। लेकिन जब 1999 में अटल बिहारी वाजपेई प्रधान मंत्री बनें तो उन्होंने इस निर्णय को रोक लिया। आपको बता दें तत्कालीन जनगणना रजिस्ट्रार जनरल ने भी जातिगत जनगणना को अप्रूव किया था।  अटल बिहारी वाजपेई के कार्यकाल में ही वर्ष 2001 की जनगणना हुयी। इसमें जातिगत जनगणना को नहीं किया गया। उसके बाद की जनगणना 2011 में हुयी तब कांग्रेस की सरकार थी और देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह थे। कांग्रेस सरकार ने भी जातिगत जनगणना करने से इंकार किया। अब फिर से बीजेपी की सरकार केंद्र में है। बीजेपी ओर से नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री है। 2021 की जनगणना इनके कार्यकाल में हो रही है। लेकिन सरकार ने साफ़ किया है कि इस बार भी ओबीसी की जातिगत जनगणना नहीं होगी। आपको बता दें कि 2018 में तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जातिगत जनगणना कराने के बारे में औपचारिक घोषणा भी की थी। लेकिन यह सरकार भी अटलबिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह सरकारों के निर्णय की तरह जातिगत जनगणना न करने के निर्णय पर कायम है।

इस बात पर गौर करें कि जब 2011 की जनगणना हो रही थी तब केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अलग से सामाजिक-आर्थिक-जातिगत जनगणना का काम किया। जिसे अंग्रेजी में Socio Economic and Caste Census (SECC) 201 कहा गया। लेकिन इसने भी अपने सभी आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया है।

अब बारी है जनगणना 2021 की। महाराष्ट्र और बिहार राज्य सरकारों ने विधानमंडल में प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार को निवेदन किया है की वह जाति आधारित जनगणना करें। पिछले कई वर्षों से बामसेफ के देश के कई पिछड़े वर्ग संगठनों ने प्रत्येक जिलों से इस बात को लेकर राष्ट्रपति के नाम हजारों निवेदन भेज रहें हैं। लेकिन केंद्र सरकार ने जातीय जनगणना न करने का अपना निर्णय नहीं बदला है। 

बताया जाता है कि कोरोना महामारी के कारण इस जनगणना का काम 2022 में आगे चला गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2021 इस जनगणना में पहली बार ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की जानकारी, उनकी पहचान के साथ दर्ज की जायेगी। अगर ट्रांसजेंडर की गणना करने के लिए जनगणना फॉर्म में बदलाव हो सकता तो फिर ओबीसी की जातिगत जनगणना कराने के लिए जनगणना फॉर्म में  एससी एसटी के साथ ओबीसी का कॉलम क्यों नहीं जोड़ा जा रहा है?

यह दिलचस्प बात है कि हाल ही में बीजेपी ने ओबीसी के 28 नेताओं को केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान दिया। जिसकी जातियों की भी लिस्ट जारी की गयी। ओबीसी के मंत्री बनाये जाने पर कई जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभार के होर्डिंग लगाए जा रहे हैं। होर्डिंग ओबीसी वेलफेयर असोसिएशन के नाम से है लेकिन इसके किसी पदाधिकारियों का नाम होर्डिंग पर नहीं है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल और तामिलनाडु चुनाव में जातियों का नाम लेकर बीजेपी के नेताओं ने बयानबाजी की। 

एक ओर पिछड़े वर्ग के लोग जातिगत जनगणना की मांग इसलिए कर रहे हैं कि यह पता चलें कि पिछड़े वर्ग की सभी क्षेत्र में वास्तविक स्थिति क्या है, आरक्षण का भी मुद्दा इसमें है। दूसरी ओर जातिगत जनगणना को नकारनेवाली मोदी सरकार ने अक्टूबर 2017 दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायधीश जी रोहिणी की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय आयोग गठित किया था। उसका यह उद्देश्य बताया गया कि ओबीसी में शामिल गैर-प्रभाशाली जातियों की क्या स्थिति है और कौनसी जातियां आरक्षण से वंचित रह गयी है। आपको बता दें की इस आयोग का कार्यकाल अब 31 जुलाई 2021 तक आगे बढ़ाया गया है। 2017 से अबतक इसका दस बार कार्यकाल आगे बढ़ाया गया है। हो सकता है उत्तरप्रदेश चुनाव के पूर्व यह रिपोर्ट आ जाएं। ओबीसी का विभिन्न उपवर्गों में वर्गीकरण करने के लिए यह पहल है। इस पर सवाल यह उठाया जा रहा है कि फिर सरकार जातिगत जनगणना को क्यों नहीं कराती? जिससे साफ पता चलेगा कि इस देश की विभिन्न सत्ताओं में कौनसी सी जातियां प्रभावशाली है। 

सेफोलॉजिस्ट और स्वराज अभियान के अध्यक्ष योगेंद्र यादव अपने एक लेख में कहते हैं “… सरकार ने संसद में उत्तर देते हुए फिर स्पष्ट किया की आने वाली सेंसस में ओबीसी की या सामान्य जातिवार जनगणना नहीं होगी। ऐसा क्यों होता है? जिस वर्ग को संविधान और कानून में मान्यता मिल चुकी है, जिस पर आरक्षण की नीति जारी है, उसकी गिनती क्यों नहीं होती? जातीय आरक्षण के विरुद्ध तर्क देने वाले भी इन आंकड़ों की मांग क्यों नहीं करते? कौन डरता है जातीय पिछड़ेपन के आंकड़ों के सार्वजनिक होने से? ये साधारण सवाल नहीं हैं। इनके पीछे भारत की सर्वोच्च सत्ता का राज छिपा है, उस सामाजिक सत्ता का जो सरकार और संसद से ऊपर है। वो जातीय सत्ता जो हजारों साल से चली आ रही है।”

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