साथियों,
किसानों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन का हर वर्ग को समर्थन करना चाहिए क्योंकि यह केवल किसानों का ही मुद्दा नहीं है बल्कि कृषि संबंधित केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों का आम उपभोक्ता को बहुत बड़ा नूकसान होने वाला है। केवल आम उपभोक्ता को ही नहीं बल्कि मजदूरों का बहुत बड़ा नूकसान होगा। इसके साथ साथ बड़े पैमाने पर कर्मचारी, छात्र और नौजवान भी बड़े पैमाने पर प्रभावित होंगे ।आइए कुछ उदाहरणों के माध्यमों से समझने का प्रयास करें। मैं हरियाणा के संबंध में यहां पर ज्यादा बात करूंगा ।साथियों जिस तरह से प्राइवेट स्कूलों के आने से सरकारी स्कूल बर्बादी के कगार पर पहुंच गए हैं, ठीक उसी तरह निजी मंडियों के आने से सरकारी मंडियां उपेक्षा की शिकार होगी और धीरे-धीरे बंद हो जाएंगी, इससे जुड़े कर्मचारी भी घर भेज दी जाएंगे। पहले तो निजी मंडिया किसानों को बहुत सुख सुविधाएं देंगी, बहुत सारा लाभ भी देंगी, लेकिन जब सरकारी मंडियां बंद हो जाएंगी ,तब बड़े पैमाने पर किसानों को, मजदूरों को निजी मंडी में आने-जाने का भी टैक्स देना पड़ेगा। भले ही आप उस निजी मंडी से कुछ खरीदें या ना खरीदें।किसानों से संबंधित और किसानी से संबंधित बहुत सारे विभाग है जो कि धीरे धीरे खत्म हो जाएंगे। जैसे जब सरकारी मंडियों के माध्यम से खरीद नहीं होगी तो फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया( भारतीय खाद्य निगम) बंद हो जाएगा। हरियाणा में स्टेट वेयरहाउस ,हैफेड ,एग्रो ,मार्केट कमेटी, हरियाणा कृषि विपणन एवं मंडी बोर्ड और कृषि से संबंधित कुछ अन्य विभाग भी बंद हो जाएंगे । अलग अलग राज्यों में कृषि से संबंधित ढेर सारे विभाग अलग-अलग नामों से होंगे, स्वभाविक है ,धीरे धीरे यह सभी विभाग बंद हो जाएंगे ।जब यह विभाग बंद हो जाएंगे तो इनमें नए कर्मचारियों की भर्ती बंद हो जाएगी। नए कर्मचारियों की भर्ती बंद होने का मतलब है इस देश के युवाओं लिए रोजगार के अवसर कम होना। अर्थात नौजवानों के लिए बेरोजगारी बढ़ेगी। इसलिए जो छात्र आज विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, उनके लिए सीधे तौर पर रोजगार की कमी होगी।साथियों राशन कार्ड पर, राशन डिपो पर बहुत सारी सरकारी योजनाओं के तहत किसानों और मजदूरों को, वंचित को तथा गरीबों को अनाज-दाले तथा अन्य जरुरत की चीजें तथा कुछ अन्य सुविधाएं मिलती हैं, धीरे धीरे यह सारी सुविधाएं बंद हो जाएंगी इन काले कानूनों के लागू होने से। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इनका सबसे ज्यादा नुकसान किसको होने वाला है ? क्योंकि अदानी-अंबानी की प्राइवेट कंपनियां कम या अधिक दामों पर खरीद कर सस्ते दामों पर गरीब लोगों को कुछ देने वाले नहीं हैं बल्कि वे अधिक से अधिक मुनाफा कमाएंगे ।साथियों इन काले कानूनों से बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों आम आदमी के लिए जरुरत के सामान की कालाबाजारी बढ़ेगी, जिसे किसानों से बहुत सस्ते दामों पर खरीदा जाएगा और बहुत महंगे दामों पर बेचा जाएगा ,जिसका शिकार सबसे ज्यादा मजदूर वर्ग ही होगा। इसे आज समझने और जानने की जरूरत है।साथियों एमएसपी का मुद्दा ही केवल महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है,इसके अतिरिक्त इससे जुड़े और भी ढेर सारे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन्हें आज समझने की जरूरत है देश के विकास के लिए, जनता के कल्याण के लिए, क्योंकि सरकार कल्याणकारी भावना से अपना हाथ खींच रही है और बहुत सारे विभागों को पूंजीपतियों के हवाले कर रही है।कुछ मूर्ख लोग तथा किसानों के विरोधी इसे केवल किसानों का मुद्दा समझ रहे है जबकि वास्तव में यह केवल किसानों का मुद्दा नहीं है। आइए इस मूर्खता को त्याग कर किसानों के साथ जुड़े किसानों के इस आंदोलन को तन मन धन से सहयोग करें।कोरोना काल में लाए गए कृषि कानूनों से संबंधी विधेयक बहुत जल्दबाजी में लाए गए, जो प्रवर समिति को भी नहीं भेजें गए, जिन पर किसानों के संगठनों की राय नहीं ली गई, जिन पर इस देश की आम जनता की राय नहीं ली गई, जिन पर ठोस तरीके से संसद में बहस नहीं की गई ,जिन पर संवैधानिक आचरण को भी अमल नहीं लाया गया।कृषि विधायकों का आम जनता पर ,आम उपभोक्ता पर क्या असर होगा ? इसका विश्लेषण भी सरकार द्वारा नहीं किया गया।किसान जातियों से आपका किसी मुद्दे पर विरोध हो सकता है लेकिन इस विरोध को खत्म करके आपको उनके साथ आज खड़ा होना चाहिए क्योंकि किसानों के साथ-साथ इन विधायकों का असर आप पर भी पड़ने वाला है ।आप भी इससे बड़े पैमाने पर प्रभावित होंगे।प्राइवेट कंपनियां 1000-1000 पेज के एग्रीमेंट किसानों से करेंगी,इन एग्रीमेंट पर किसान अपनी मजबूरी वश धड़ाधड़ हस्ताक्षर करेगा, उसे कुछ पता भी नहीं चलेगा और निजी कंपनियां धीरे-धीरे उसकी जमीन को गिरवी कर लेगी, जिस प्रकार हम बैंक में जब लोन लेने जाते हैं तो एक पढ़े-लिखे आदमी की भी समझ में कुछ नहीं आता और वह लोन(ऋण) लेने के चक्कर में धड़ाधड़ बैंक के कागजों पर हस्ताक्षर कर देता है, ठीक उसी प्रकार किसान भी इसका बड़े पैमाने पर शिकार होगा और इस किसान की शिकार होने से मजदूरों पर इसका बहुत बड़ा असर पड़ने वाला है। क्या आप इसको जानते हो ? क्या आप इसको समझते हो?कुछ मुर्ख और बेवकूफ किसानों के आंदोलन का फेसबुक पर विरोध कर रहे हैं और उस तबके के लोग कर रहे हैं जो हमेशा किसानों से जुड़ा रहा है। आइए कुछ विचार करें।जब किसान की जमीन गिरवी हो जाएगी बड़ी-बड़ी कंपनियों के हवाले तो ,उस जमीन पर कंटीली तारें लगा दी जाएंगी और उस खेत की जमीन के चारों और सुरक्षा गार्ड होंगे और उस खेत में जो मजदूर-किसान और आम घराने के औरतें घांस-फूस या न्यार लेने जाती हैं ,यह सब उनका बंद हो जाएगा या फिर उन्हें और भी बड़े पैमाने पर शोषण का शिकार होना पड़ेगा।गांव में जो औरतें आज गाय पालन, भैंस पालन, भेड़ पालन करती हैं और दूध बेचने का काम करती हैं उन्हें भी बड़े पैमाने पर कठिनाई आने वाली है हम सबके यह सब धंधे चौपट हो जाएंगे।बड़ी बड़ी निजी कंपनियां फसलों की कटाई पर,बिजाई पर उन मशीनों को इस्तेमाल करेंगी,जहां पर कम से कम मजदूरों की आवश्यकता हो। इस प्रकार किसानों के साथ-साथ मजदूरों का भी बड़े पैमाने पर नुकसान होने वाला है।कृषि भारत के संविधान के अनुसार राज्य का मुद्दा है लेकिन अभी यह धीरे-धीरे सीधे तौर पर केंद्र के हाथों में सिमट जाएगा और सरकारी मंडियों के माध्यम से खरीद बेच पर जो राज्य को 6 प्रतिशत आमदनी होती थी वह बंद हो जाएगी। इस प्रकार राज्य को भी नुकसान होगा।इसके साथ साथ ढाई प्रतिशत आढ़तियों को खरीद बेच पर मिलता था ,वह भी बंद हो जाएगा । छोटे व्यापारी और आढ़ती बेरोजगार हो जाएंगे और यह सीधे तौर पर बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों तथा निजी मंडियों के मालिकों को मिलेगा जिससे बड़े पैमाने पर लोग बेरोजगार होंगे।इसके अतिरिक्त इन विधायकों से संबंधित और भी मुद्दे हैं जिन पर आने वाले समय में चर्चा करेंगे ।धन्यवाद।
जय किसान, जय संविधान,
सुरेश द्रविड़ (राष्ट्रीय संगठन सचिव,बामसेफ)









