तेरा मेरा मनुवां कैसे एक होइ रे ।
मै कहता हौं आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखी ।
मै कहता सुरझावन हारी, तू राख्यो अरुझाई रे ॥
मै कहता तू जागत रहियो, तू जाता है सोई रे ।
मै कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे ॥
जुगन-जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोई रे ।
तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोई रे ॥
सतगुरू धारा निर्मल बाहै, बामे काया धोई रे ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे ॥
संत कबीर दास जी कहते हैं तुम्हारा और मेरा मन एक कैसे हो सकता है। मैं तो प्रत्यक्ष प्रमाण देख करके विश्वास करता हूं। जो मुझे अपनी आंखों के सामने दिखता है उस पर विश्वास करता हूं जबकि तुम किसी किताब में जो लिखा है उस आधार पर सही और गलत का निर्णय करते हो और किताब में लिखी बात को बिना जांचे परखे सत्य मान लेते हो।
मैं चाहता हूं कि हर मुद्दे को सीधे, सरल और सुस्पष्ट शब्दों में अपनी बात रख कर मसले को सुलझा दूं। जबकि तुम हर मुद्दे को उलझा (कंफ्यूज) करके रखते हो, लोगों को स्पष्ट और सरल शब्दों में अपनी बात नहीं बताते हो जिससे कि लोग उस मुद्दे में उलझे रह जातें हैं और मुद्दा हल नहीं हो पाता।
मैं तो हमेशा तुम्हें बताता हूं कि तुम जागरूक रहो, हमेशा अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहो। परंतु तुम आलस्य में सोते रहते हो और अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं रहते हो जिसका फायदा दूसरे लोग उठाते हैं और तुम्हें अधिकार विहीन करते हैं।
मैं तुम्हें समझाता हूं कि किसी के प्रति आवश्यकता से अधिक मोह मत करो और निरपेक्ष भाव से सही और गलत का मूल्यांकन करो। किसी की अंधभक्ति मत करो जानो छानो तब मानो परंतु तुम दूसरों के मोह पास में फस जाते हो, दूसरों के अंधभक्त बन जाते हो और बिना ठीक से जाने, बिना छाने, दूसरों की गलत बात भी मान लेते हो और इसीलिए तुम्हारी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है।
तुम्हें तथागत बुद्ध ने समझाया, रैदास ने समझाया, नानक ने समझाया, फुले ने समझाया, पेरियार ने समझाया, नारायणा गुरु ने समझाया, बिरसा मुंडा ने समझाया, बाबासाहेब अंबेडकर ने समझाया, रामस्वरूप वर्मा, जगदेव बाबू, ललई सिंह यादव ने समझाया। फिर मा दीनाभाना, डीके खापर्डे, मान्यवर कांशी राम ने समझाया, गंगावने ने समझाया, बीडी बोरकर, सुरेंद्र सिंह धम्मी, अशोक परमार,दयाराम, श्रीराम मौर्या और तमाम महापुरुषों, संतों, गुरुओं ने समझाया। लेकिन तुमने संतों, गुरुओं, महापुरुषों की बात नहीं मानी और इसलिए आज तुम दुखी हो, कष्ट में हो और तुम्हें मुक्ति नहीं मिल रही है।
तुम बिना अनुशासन के यहां वहां जहां तहां विचरण कर रहे हो और इस प्रकार तुम्हारा सब धन संपदा समाप्त हो जा रही है और इसलिए तुम्हारे बाल बच्चों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
इसलिए अपने मन को निर्मल करो अपने संतों, गुरुओं, महापुरुषों के विचार रूपी धारा में स्नान कर लो और अपने काया को और मन को पूरी तरह से धो कर निर्मल कर लो और महापुरुषों के विचारधारा का अनुसरण करो और अगर ऐसा करते हो तो जैसा तुम करोगे उसके अनुसार जरूर तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी।
संत कबीर दास के जन्मदिवस की बधाई
जय भीम जय मूल निवासी जय संविधान
– रमा शंकर
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