कोरोना महामारी : ग्रामीण इलाकों को अधिक खतरा

करोना महामारी की पहली लहर को शहरों और अमीरों के साथ जोड़कर देखा जा रहा था हालांकि बाद में गांवों में भी लहर का कुछ असर देखने को मिला। परंतु दूसरी लहर अमीरों और शहरों तक सीमित नहीं रह गई है अब ग्रामीण इलाकों और गरीबों पर भी इसका भयानक असर देखने को मिल रहा है। पहली और दूसरी लहर के बीच महत्वपूर्ण फ़र्क़ टीकाकरण के माध्यम से बख़ूबी समझा जा सकता है।

विश्व स्तर पर देखें तो विकसित राष्ट्र हमसे टीकाकरण में काफी आगे जा चुके है। अमेरिका अपनी 40% आबादी को पूरी तरह से अर्थात दूसरी डोज़ भी लगा चुका है। जबकि भारत केवल 3% आबादी को ही टीकाकरण कर सका है। और अगर इसमें ग्रामीण व शहरी आबादी में देखें तो हालात और भी बदतर दिखते है।

भारत की 65% आबादी गांवों में रहती है। कोरोना मामलों के संदर्भ में देखें तो अप्रैल 2021 में 70% मामले शहरों में और 30 % गांवों में थे लेकिन मई 2021 में यह मामले 35% शहरों में और 65% गांवों में हो गए। जोकि एक बड़ा और ख़तरनाक बदलाव माना जाना चाहिए।

आंकड़ों के आधार पर यह माना जा सकता है कि जिन लोगों ने टीकाकरण करवाया उनमें वायरस का प्रभाव कम हुआ उनके मुकाबले जिन्होंने नहीं करवाया। विशेषज्ञों का तो यहाँ तक कहना है कि टीकाकरण से बीमारी की गंभीरता से बचा जा सकता है। ऐसे में क्या ग्रामीणों को टीकाकरण से महरूम रखा जा सकता है जो आंकड़ों में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। ज़मीनी हक़ीक़त को देखें तो गांवों में महामारी का प्रभाव ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है और होगा। जैसा कि उत्तर भारत के राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार में लाशों के गंगा और अन्य नदियों में पाए जाने पर हुआ है।

गांवों और महामारी के सन्दर्भ में कुछ बातें स्पष्ट है जैसे – महामारी का ज्यादा वीभत्स रूप; सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं की कमी; टीकाकरण का अभाव। टीकाकरण के अभाव के भी कई कारण हो सकते है जैसे- ग्रामीणों में टीकाकरण को लेकर भ्रांतियां; स्मार्ट मोबाइल फोन या इंटरनेट की कमी के कारण टीकाकरण के लिए रजिस्टर करवाने की समस्या; सरकारी तंत्र का टीकाकरण नीति में ग्रामीणों के प्रति अस्पष्टता का होना।

जिस रफ़्तार से भारत में टीकाकरण हो रहा है उस रफ्तार में यदि आमूलचूल परिवर्तन नहीं किए गए तो ग्रामीणों को पूरी तरह से टीकाकरण करने में सालों लग जाएंगे। क्योंकि पूर्ण सुरक्षा के लिए एक व्यक्ति को दो डोज़ और दोनों के बीच कम से कम 6 सप्ताहों का अंतर होना चाहिए (जो कि कुछ मामलों में 12-16 सप्ताह भी है)। महामारी की महाकायता को देखते हुए जब तक यह पूरा प्रोसेस पूरा होगा तब तक कितना मानवीय नुकसान हो चुका होगा अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। और यह सोचकर दिल दहल उठता है कि तीसरी लहर भी दस्तक देने वाली है जो कि सरकारी समझ भी है। ग्रामीण आँचल के सन्दर्भ में टीकाकरण की चुनौती और भी सोचनीय हो जाती है जब जाति, लिंग और धर्म आधारित विभेदों के कारण हो रही सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में कोताही को देखा जाता है और उन्हें टीकाकरण के सन्दर्भ में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

प्रोफसेर नरेंद्र कुमार,
आप जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में सेंटर ऑफ़ पोलिटिकल स्टडीज में प्रोफेसर है।
विश्व की जानी-मानी सेज, ईपीडब्ल्यू, ऑक्सफ़ोर्ड आदि एकेडमिक पत्रिकाओं में आपके शोध लेख प्रकाशित है।

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