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मूलनिवासियों के पिछड़ेपन का कारण कौन?
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मनुस्मृति के प्रावधानों के अनुसार ही लगभग तीन हजार वर्षों तक देश के मूलनिवासियों के साथ जानवरों जैसा सलूक किया गया। इसी तरह रामायण जैसे ग्रंथो को भी समाज मे नफरत फैलाने और समाज को तोड़ने वाला बताया जा रहा हैं। यह कितना सही हैं आईये जानते हैं।
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बाबा साहेब ने पच्चीस दिसम्बर, उन्नीस सौ सत्ताईस को असमानता के प्रतीक मनुस्मृति को जलाने का काम किया। उन्होंने ‘बहिष्कृत भारत’ में मनुस्मृति को जलाने के कारण बताते हुए कहा था कि, “मनुस्मृति को पूजने वाले अछूतों के कल्याण का कोई काम नहीं करते हैं और जाति व्यवस्था के समर्थक होते हैं।”
उनका मानना था कि, भारतीय समाज में जो कानून चल रहा है। वह मनुस्मृति के आधार पर है। यह एक ब्राम्हण, पुरूष सत्तात्मक, भेदभाव वाला कानून है। इसे खत्म किया जाना चाहिए और इसी सोच के साथ उन्होंने सबसे पहले पच्चीस दिसम्बर, उन्नीस सौ सत्ताईस को सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाने का काम किया।
मनुस्मृति में ऐसे कई प्रावधान थे जो हर तरह से देश के मूलनिवासियों अर्थात वर्तमान के एससी, एस्टी, ओबीसी और कनवर्टेड माइनॉरिटी के साथ-साथ महिलाओं की समाजी, आर्थिक , राजनीतिक और शैक्षणिक विकास पर बाधा बन रही थी।
आईये मनुस्मृति के उन नियमो पर एक नज़र डालते हैं जो पूरी तरह देश के मूलनिवासियो और महिलाओं के खिलाफ थी।
मनुस्मृति में ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है । इसके अतिरक्त वह शूद्र जो कुछ करता है , उसका कर्म निष्फल होता है।
आगे मनुस्मृति कहता है कि, शूद्र को भोजन के लिए झूठा अन्न, पहनने को पुराने वस्त्र, बिछाने के लिए धान का पुआल और फ़टे पुराने वस्त्र देना चाहिए। मतलब मनुस्मृति काल मे आप कितने भी योग्य क्यों न हो? आपके पास अच्छा खाना और पहनने के लिए अच्छे कपड़े होते हुए भी मूलनिवासियों को वही पुराने वस्त्र और जूठा खाना खाना पड़ता था जो वे देते थे।
ऐसे एक या दो नहीं बल्कि ऐसे कई नियम मनुस्मृति में लिखे गए हैं। जो देश के मूलनिवासियो और महिलाओ की स्थिति जानवरो से भी बद्तर बना देती हैं।
इसी तरह ‘रामचरितमानस’ भी देश के मूलनिवासियों के अधिकरो के खिलाफ हैं। यह बात बीते दिनों बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने भी कही हैं। इससे पहले केरल के मंत्री और कम्युनिस्ट नेता एमबी राजेश ने भी मनुस्मृति को क्रूर बताया था।
बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर का दावा हैं कि, “मनुस्मृति और रामचरितमानस जैसे हिंदू ग्रंथ अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों और शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाओं के खिलाफ हैं।
उन्होंने कहा कि, रामायण पर आधारित रामचरितमानस ‘समाज में नफरत फैलाती है । रामचरितमानस के कुछ हिस्से कुछ जातियों के खिलाफ भेदभाव का प्रचार करती हैं । उन्होंने इन ग्रंथों को समाज को बांटने वाला बताया हैं।
बताते चले कि इनसे पहले भी केरल के मंत्री और कम्युनिस्ट नेता एमबी राजेश ने भी एक बयान में कहा था कि, मनुस्मृति एक ‘क्रूर’ जाति व्यवस्था की वकालत करती है।








