आईआईटी मद्रास में एक औऱ छात्र ने की आत्महत्या।

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प्रबंधन के खिलाफ छात्रों ने किया विरोध प्रदर्शन।

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आईआईटी-बॉम्बे में आत्महत्या का मामला सुलझा भी नहीं था कि एक और आत्महत्या का मामला आईयाईटी-मद्रास से निकल कर आया हैं। जहाँ बीते तेरह फरवरी को महाराष्ट्र के रहने वाले सत्ताईस वर्षीय रिसर्च स्कॉलर स्टीफन सनी ने आत्महत्या कर ली।

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हर माता-पिता का सपना होता हैं की हम अपने बच्चों को देश के टॉप कॉलेजों में पढ़ाये। लेकिन यह सपना इतना भी आसान नहीं हैं। खास कर देश के मूलनिवासी बहुजन समाज के बच्चों के लिए।

मनुवादी व्यवस्था ने आपके बच्चों को उच्च शिक्षा से अलग-थलग रखने के लिए वे तमाम तरह की व्यवस्थाएं कर रखी हैं। अगर फिर भी वो किसी तरह उच्च शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला ले भी लेता हैं तो वहाँ उसे इतना जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ेगा कि या तो वो पढ़ाई अधूरा ही छोड़ कर भाग जाएगा या फिर आत्महत्या कर लेगा। और अगर किसी तरह जातिय उत्पीड़न सह कर रह गया तो उसके सरनेम की वजह से इंटरव्यू में कम मार्क्स देकर उसे बाहर निकाल देंगे।

अगर आप भी अपने बच्चों को आईआईटी जैसे उच्च शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले के बारे में सोच रहे हैं तो हमारा मकसद आपको डराना नहीं हैं। लेकिन यह स्थिति एक कड़वा सच हैं, जिससे हम मूंह नहीं फेर सकते।

क्योंकि उच्च शैक्षणिक संस्थानों में आत्महत्या के कई मामले हमारे और आपके सामने आ चुकी हैं। फरवरी महीने में ही ऐसे दो आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। जिसमे पहला मामला आईयाईटी-बॉम्बे का हैं, जहा बीटेक फर्स्ट ईयर के दर्शन सोलंकी ने बीते बारह फरवरी को होस्टल के सातवें माले से कूद कर अपनी जान दे दी। इसमें परिवार वालो का आरोप हैं कि, दर्शन के मौत के पीछे संस्थान में हो रहे जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न हैं। परिजनों के मुताबिक दर्शन ने पहले भी संस्थान में हो रहे जातिगत भेदभाव के बारे में जिक्र किया था।

वही दूसरा मामला दर्शन सोलंकी के मौत के ठीक एक दिन बाद यानी तेरह फरवरी का हैं। जहा आईआईटी-मद्रास के सत्ताईस वर्षीय रिसर्च स्कॉलर स्टीफन सनी ने आत्महत्या कर ली।

मिली जानकारी के मुताबिक उसी दिन आईआईटी मद्रास कैंपस में एक अन्य छात्र ने भी अपनी जान लेने की कोशिस की थी, लेकिन उसे बचा लिया गया। लेकिन स्टीफन सनी के मौत के बाद छात्रों ने कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ विरोध शुरू कर दिया।

छात्रों का आरोप हैं कि ऐसी और भी घटनाएं कॉलेज में घट चुकी हैं। लेकिन आत्महत्याओं को रोकने के लिए प्रबंधन द्वारा बहुत कम प्रयास किया गया है।

बताते चलें कि आईआईटी मद्रास पर समय-समय पर जातिवाद के आरोप लगते रहे हैं। इस संस्थान को साल दो हजार उन्नीस में धार्मिक भेदभाव का सामना करने वाली छात्रा फातिमा लतीफ की आत्महत्या के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा था।

लेकिन इतने आरोपो औऱ विरोध का सामना करने के बाद भी प्रबंधन में कोई सुधार नहीं आया और आज भी संस्थान में आत्महत्या और जातिवाद की घटनाएं घट रही हैं।

विरोध कर रहे छात्रों ने आरटीआई यानी सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि, आईआईटी-मद्रास में देश में किसी भी अन्य आईआईटी की तुलना में सबसे अधिक आत्महत्याएं हुई हैं। पिछले दस वर्षों में इस कैंपस में चौदह आत्महत्याओं की सूचना दी है।

आईआईटी-मद्रास के आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्कल नामक एक छात्र समूह ने एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ भेदभाव के मुद्दों पर एक सक्रिय प्रकोष्ठ (सेल) बनाने की मांग की हैं।

छात्रों का कहना हैं की हर मौत के बाद जांच होती हैं। लेकिन किसी भी तरह की भेदभाव का जिक्र नही किया जाता हैं, और मौत का कारण मानसिक स्वास्थ्य का ठीक न होना बता दिया जाता हैं।

इसपर आरोप लगाते हूए एक छात्र ने कहा की, ‘प्रशासन ने शुरू में कहा था कि वे पूरा सहयोग करेंगे, लेकिन इससे कुछ नहीं निकला। फातिमा लतीफ की घटना के बाद भी इस मुद्दे को देखने के लिए प्रभावी रूप से कोई कदम नहीं उठाया गया। इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने बाद में निष्कर्ष निकाला कि फातिमा लतीफ ने होम सिकनेस और कुछ मनोवैज्ञानिक मुद्दों के कारण खुदकुशी का कदम उठाया था।

स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के नेता निरुबन चक्रवर्ती ने आरोप लगाते हुए कहा कि, आईआईटी में फैकल्टी भर्ती में आरक्षण का पालन नहीं किया जा रहा है, जो कथित रूप से उत्पीड़ित और हाशिये के समुदायों के छात्रों के खिलाफ एक माहौल बनाता है।

इस मामले में चक्रवर्ती ने कहा कि, ‘हम मांग करते हैं कि रोहित वेमुला अधिनियम को इस भेदभाव को समाप्त करने के लिए लागू किया जाए, जो छात्रों को आत्महत्याओं की ओर ले जाता है।’

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