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भारत में शिक्षा का स्तर इतना गिरा हुआ है की आज डिग्रियां लेकर के भी लोग नौकरी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। जिसका सबसे बड़ा करना है शिक्षा का बेस मजबूत न होना। खास कर सरकारी स्कूलों में शिक्षा नाम मात्र की दी जाती हैं। जहा लगभग नब्बे से पंचांवे फीसदी बच्चे मूलनिवासी बहुजन समाज से संबंध रखते हैं।
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स्कूल का सबसे अहम काम बच्चो को शिक्षित करना होता हैं। लेकिन भारत के सरकारी स्कूलों का हाल इस काम में बहुत बुरा हैं। इन स्कूलों में खिचड़ी और कपड़े के अलावा शिक्षा बस नाममात्र की दी जाती हैं।
भारत के सरकारी स्कूलों में बच्चों को किताबें तो मुफ्त में मिल जाती हैं पर उसे पढ़ना कैसे हैं? उनमें दिए प्रश्नों को हल कैसे करना है? ये चीजे उस ढंग से नहीं बताई जाती है, जिससे बच्चे सही मायने में सीख सके।
जिसके बाद परिणाम यह आता है की सरकारी स्कूलों के अधिकतर बच्चे अपनी कक्षा की पुस्तकों को सही ढंग से पढ़ तक नहीं सकते हैं और वे अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले अपने ही उम्र के बच्चो से पिछड़ जाते हैं।
सरकारी स्कूलों की इस दुर्दशा के सबसे बड़े कारणों में एक शिक्षकों और प्रिंसिपल के खाली पद हैं। जिससे कार्यरत कम शिक्षकों के ऊपर काम का अधिक प्रेसर बनता हैं।
एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में प्रिंसिपल के सड़सठ फ़ीसदी पद खाली पड़े हैं।
बताते चले की, इन खाली पड़े सड़सठ फीसदी पद पर नियुक्ति सिर्फ प्रमोशन के ज़रिये ही हो सकती है और पिछले चार सालों में ऐसा कोई प्रमोशन नहीं हुआ है।
शिक्षकों का कहना है की सरकार, विभाग्य मुद्दे का हवाला देकर इन रिक्त पदों को भरने में देरी कर रही हैं। उन्होंने कहा की, प्रिंसिपल के रूप में कार्य करने वाले शिक्षक को दो पदों के कार्यभार को संभालना पड़ता है, जिससे उनकी दक्षता प्रभावित होती है।
खबर के मुताबिक प्रदेश के कई शिक्षक प्रिंसिपल के रिक्त पदो को भरने में सरकार द्वारा की जा रही देरी के विरोध में अप्रैल से काली पट्टी बांधकर कक्षाएं ले रहे हैं।







