कोविड-19,सरकार के नाकाम प्रबंधन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल।

कोविड की पहली लहर के सामने हर जगह, यहां तक कि समृद्ध देशों की भी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था नाकाफी साबित हुई।  लेकिन, दूसरी और तीसरी लहर का सामना करने वाले किसी भी देश ने इस तरह की अराजकता और मृत्यु के ऐसे तांडव का सामना नहीं किया, जैसा कि आज भारत में देखा जा रहा हैं। 

जहां उच्च न्यायालय मुख्य तौर पर ऑक्सीजन, दवाइयों और अस्पताल में बिस्तरों की कमी से जूझ रहे लोगों को राहत संबंधी आयामों पर चर्चा कर रहे हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 से मिलने वाले जीवन के अधिकार के विस्तार के तौर पर स्वास्थ्य के अधिकार के बड़े सवाल को उठाया है।  

अस्पतालों में बिस्तरों, दवाओं और ऑक्सीजन के संकट ने केंद्र और राज्य सरकारों की तैयारी की कमी की पोल खोल दी है।  साफ नजर आ रहा है कि अक्टूबर से फरवरी तक जब महामारी का असर कम था, उस दौरान आगे के लिए कोई तैयारी नहीं की गई। 

कोविड-19 की दूसरी लहर ने जिस राष्ट्रीय आपदा को जन्म दिया है, वैसी आपदा भारत ने आजादी के बाद से अब तक नहीं देखी है और इस बात के तमाम सबूत सामने आ रहे हैं कि यह टाला जा सकता था और इसके प्राणघातक प्रभाव को कम करने के लिए उचित कदम उठाए जा सकते थे। 

 स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस राहत का इस्तेमाल आंकड़ों को देखकर आगे की स्थिति के बारे में अनुमान लगाने और स्वास्थ्य व्यवस्था को और मजबूत करने में किया जा सकता था। लेकिन इस समय देश में जो हालात हैं उन्हें देख कर लगता है कि आम लोग ही नहीं बल्कि सरकारों के लिए भी संक्रमण की यह ताजा लहर चौंकाने वाली साबित हुई है।

 दूसरी लहर की तीव्रता का अंदाजा इस सामान्य आंकड़े से लगाया जा सकता है,  कि एक करोड़ आधिकारिक मामले का आंकड़ा छूने में भारत को 12 महीने का वक्त लगा, वहीं एक करोड़ से दो करोड़ का आंकड़ा सिर्फ चार महीने में पार हो गया। 

जब की दुनिया के बाकी देशों ने पहली और दूसरी लहर के बीच के समय का इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को बेहतर करने और अपनी जनता के लिए ज्यादा से ज्यादा वैक्सीन सुनिश्चित करने में किया।  ना की  आधिकारिक स्तर पर राजनीतिक लाभ के लिए कोरोना विस्फोट का संभावित कारण बनने वाले आयोजनों को हरी झंडी दिखाने वाली मानसिकता का ऐसा प्रदर्शन किया गया।

 सरकार ने इन दोनों ही मामलों पर ढिलाई बरती। जो न सिर्फ ऑक्सीजन और दवाइयों जैसे अहम स्वास्थ्य जरूरतों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित कराने में नाकाम रही, बल्कि इसने आवश्यक संख्या में कोविड के टीकों का प्री-ऑर्डर भी नहीं किया।

सवाल यह है की  सरकार ने इस लहर का पूर्वानुमान क्यों नहीं लगाया और जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए? 

  आपकी जानकारी के लिए बता दे की  प्रधानमंत्री की निजी जिम्मेदारी और सही मायनों में आपराधिक लापरवाही और बढ़ जाती है,   की उन्होंने न केवल सामान्य बुद्धि बल्कि विशेषज्ञों की सलाह को भी नजरअंदाज करते हुए बड़ी-बड़ी चुनावी सभाओं और हरिद्वार में कुंभ मेले का आयोजन होने दिया और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की तैयारी को बेहतर बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

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