देश के मूलनिवासियों पर हो रहे हमलों पर कब लगेगी लगाम ?

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इस देश के मूलनिवासियों जिसमें देश के एससी, एसटी, ओबीसी और कन्वर्टेड माइनोरिटीज़ आते हैं इन्होंने हजारों सालो से मनुवादियों का शोषण सहा, लेकिन संविधान लागू होने के सात दशक बाद आज भी कई तरह से मूलनिवासी बहुजन समाज शोषण सह रहा हैं।

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हम आए दिन अस्पृस्यता से जुड़े मामले देखते और सुनते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है की यह मामले तमाम कानूनों के बाद भी इस देश में घट रही हैं ।

एनसीआरबी यानी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक इस तरह के मामले घटने के बजाय लगातार बढ़ी हैं।

इक्कीसवीं सदी में भी इस देश में अस्पृस्यत से जुड़े ऐसे मामले सामने आए है जिसे सुनकर रुह कांप जाती हैं।

वो फिर साल दो हजार पंद्रह में घटी राजस्थान के डंगावास में मूलनिवासियों के ख़िलाफ़ हिंसा हो या फिर साल दो हजार सौलह में घटी रोहित वेमुला का मामला।

या फिर साल दो हजार उन्नीस में घटी डॉक्टर पायल तड़वी का मामला हो या फिर दो हजार बीस में उत्तर प्रदेश के हाथरस का मामला हों।

ऐसे असंख्यक घटनाए हैं जो इस देश में हर रोज घट रही हैं। जिनमे से कुछ मामले हम और आप तक पहुंच जाते हैं, जबकि ऐसे कई घटनाओं का गला घोंट दिया जाता हैं, जिससे पीड़ितो की आवाज हम और आप तक नहीं पहुंच पाती हैं।

आश्चर्य की बात यह है की इस संबंध में कई कानून बनने के बाद भी इस तरह के मामलों में कोई कमी नहीं आई हैं। बल्कि और अधिक बढ़ी हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताती हैं कि इस देश के मूलनिवासियों के ख़िलाफ़ अत्याचार के मामले कम होने के बजाय और अधिक बढ़े हैं।

साल दो हजार बीस में आई रिपोर्ट के मुताबिक साल दो हजार उन्नीस में अपराध के मामले साल दो हजार अठारह के मुकाबले सात दशमलव तीन फीसदी बढ़ी हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, जहां दो हजार अठारह में पूरे देश में मूलनिवासियों के खिलाफ बयालीस हजार सात सौ तिरानवे (42,793) मामले दर्ज हुए थे वहीं, दो हजार उन्नीस में इस तरह के पैंतालीस हजार नौ सौ पैंतीस (45,935) मामले सामने आए हैं।

जिसमे सामान्य मारपीट के कुल तेरह हजार दो सौ तिहत्तर (13,273) मामले सामने आए थे। जबकि अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) क़ानून के तहत चार हजार एक सौ उनतीस (4,129) मामले और दुष्कर्म के तीन हजार चार सौ छीयासी (3,486) मामले दर्ज हुए हैं।

अगर इस संबंध में कानूनों की बात करे तो देश में अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, उन्नीस सौ नवासी (1989) मौजूद है।

इसके तहत एससी और एसटी वर्ग के सदस्यों के ख़िलाफ़ किए गए अपराधों का निपटारा किया जाता है। इसमें अपराधों के संबंध में मुकदमा चलाने और दंड देने से लेकर पीड़ितों को राहत एवं पुनर्वास देने का प्रावधान किया गया है। साथ ही ऐसे मामलों के तेज़ी से निपटारे के लिए विशेष अदालतों का गठन भी किया जाता है।

इसके अलावा अस्पृश्यता पर रोक लगाने के लिए अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, उन्नीस सौ पचपन बनाया गया था जिसे बाद में बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कर दिया गया। इसके तहत छुआछूत के प्रयोग एवं उसे बढ़ावा देने वाले मामलों में दंड का प्रावधान है।

ऐसे कई कानूनन प्रावधानों के बावजूद देश में मूलनिवासियों के साथ अत्याचार के मामलो में लगातार वृद्धि देखने को मिली हैं, जो दर्शाती हैं की ऐसे कानून इस देश में सिर्फ नाम मात्र का रह गया हैं।

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