म. गांधी की हत्या के बाद आर एस एस और जनसंघ देश की मुख्य राजनीति से अलग-थलग पड़े हुए थे। लेकिन यह दोनों संगठन 1950 के बाद किस प्रकार से आगे बढ़ें। जानिए इस लेख में…
1-सर्वप्रथम कांग्रेस हटाओ के नाम पर जयप्रकाश नारायण और लोहिया ने जनसंघ के साथ समझौता किया और जनसंघ ने जनता पार्टी में अपने को विलीन कर लिया और इस प्रकार 1977 में जनता पार्टी की सरकार में जनसंघ की तरफ से अटल बिहारी बाजपेई और लालकृष्ण आडवाणी मंत्री बने। जनसंघ के लोगों के द्वारा सत्ता की हिस्सेदारी का यह पहला प्रयास था जिससे अलग-थलग पड़े जनसंघ को देश की मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित होने का मौका मिला। 1980 में जनसंघ के लोग जनता पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी के रूप में नई पार्टी के रूप में तब्दील हो गये।
2- 1989 के दशक में भारतीय जनता पार्टी बहुत प्रयास कर रही थी परंतु आगे नहीं बढ़ पा रही थी फिर उसके साथ वी पी सिंह ने समझौता किया और भारतीय जनता पार्टी और लेफ्ट दोनों का समर्थन लेकर केंद्र में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने। परंतु भाजपा ने बैकवर्ड क्लास के मिलने वाले संवैधानिक हक अधिकार मंडल के विरोध में कमंडल (धर्म) यात्रा निकाली और वी पी सिंह की सरकार गिर गई। राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार को समर्थन करने से भाजपा की शक्ति बढ़ी थी परंतु भाजपा फिर भी वह केंद्र की सत्ता से बहुत दूर थी। सांप्रदायिक राजनीति करने के कारण कोई भी सेकुलर पार्टी भाजपा से अलायंस नहीं करना चाहती थी।

3-1993 में मुलायम सिंह और कांशीराम का गठबंधन हुआ और और एक नारा बहुचर्चित हुआ कि, “मिले मुलायम कांशीराम – हवा में उड़ गए जय श्रीराम”। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के गठबंधन से मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने। लगा था कि देश में बहुजनों का राज स्थापित हो जाएगा। पूरे देश के ब्राह्मणवादी लोग जिसमें कम्युनिस्ट, भाजपाई और कांग्रेसी सभी शामिल थे हर हालत में इस गठबंधन को तोड़ना चाहते थे। और अंत में वे इसमें कामयाब हो गए। 2 जून 1995 में बसपा सपा गठबंधन टूट गया। बसपा ने अपने सिद्धांतों और विचारधारा के विपरीत में जाकर भाजपा से समर्थन लिया और मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी। 4 माह बाद बसपा की सरकार भी गिर गई। इसके बाद परिणाम यह हुआ अब तक जो बसपा सवर्णों को टिकट नहीं देती थी इसके बाद उसने सवर्णो को टिकट देना शुरू कर दिया। धीरे धीरे बसपा अपने मूल विचारधारा से हटने लगी और बहुजन को सर्वजन कर दिया और इस प्रकार बहुजन राजनीति को समाप्त कर दिया। बसपा और भाजपा के गठबंधन के कारण भाजपा को आगे बढ़ने का और मौका मिला और दूसरी पार्टियां भाजपा से गठबंधन के बारे में सोचने लगी।
4-1994 में नीतीश कुमार बिहार जनता दल से जार्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में अलग हुए। फिर अलग एक पार्टी बनी समता पार्टी। 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित हो जाने के बाद भाजपा के साथ सहयोग की संभावनाओं की बात उठाने पर नीतीश कुमार ने कहा था कि – “जहर खा लेना पसंद करूँगा, भाजपा के साथ राजनीति नहीं करूँगा।” कुछ माह बाद जब उत्तरप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और भाजपा एक साथ हुए, तब नीतीश का मन भी डोलने लगा और 1996 का लोकसभा चुनाव उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन कर लड़ा अर्थात उन्हीं के शब्दों में कहें तो तो ज़हर खाकर राजनीति की। इस प्रकार कई मूलनिवासी नेता अफीम सुंघने के लिए तैयार हो गए।
भाजपा को मजबूत बनाने के लिए उपरोक्त चार घटनाएं बहुत महत्वपूर्ण है।
फिर धीरे धीरे सभी छोटी छोटी पार्टियां जो सेकुलर राजनीति कर रही थी अपने अपने सुप्रीमो के स्वार्थ में बीजेपी के साथ एलायंस करने लगीं और अफीम सूंघने लगीँ। गठबंधन करके भाजपा ने धीरे धीरे धर्म की अफीम इन पार्टियों के माध्यम से उनके समर्थकों को भी सुंघा दिया और इन समर्थकों को अपने से जोड़ दिया।
धीरे धीरे मजबूत हुई है बीजेपी और मजबूत करने में उन सभी मूलनिवासी नेताओं का हाथ है जो अपने स्वार्थ में कभी न कभी भाजपा के समर्थन से एमपी एमएलए बने या फिर मुख्यमंत्री या केंद्र में मंत्री बने और इसके लिए उन्होंने भाजपा से नापाक और सिद्धांतविहीन गठजोड़ किया जो उनके मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत था।
मूलनिवासियों की विभिन्न पार्टियों से एलायंस करने के बाद भाजपा जहां अपना संगठन मजबूत करने में लगी थी वही मूलनिवासी नेता संगठन की बजाय अपने और अपने परिवार को मजबूत करने में लगे लगे रहे और संगठन की कोई परवाह नहीं की। इसलिए आज भाजपा संगठन मजबूत है जबकि मूल निवासी नेताओं का परिवार मजबूत है।
और इस प्रकार भाजपा मुख्यधारा में स्थापित हो गई और किसी भी सेकुलर पार्टी को अब भाजपा से गठबंधन करने में कोई सैद्धांतिक परेशानी नजर नहीं आने लगी।
इतिहास से सबक ले सकते हैं। जो इतिहास से सबक नहीं सीखते इतिहास में सबक सिखा देता है।
– कलावती शंकर








बिल्कुल ज्ञानवर्धक और आंखों को खोलने वाला लेख है।आज मूलनिवासी समाज की बदहाली के पीछे हमारे खुद के समाज के दलाल और चमचे टाइप के नेता शामिल हैं