मजदूर, किसान और श्रमजीवी वर्ग के लिए बाबासाहेब डॉ.अम्बेडकर का महत्वपूर्ण योगदान।
1 मई का दिन भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिए बेहद खास होता है, क्योंकि इस दिन को हर साल अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। ये दिन दुनिया के मजदूरों और श्रमिकों को समर्पित है।
मेहनत उसकी लाठी है
मजबूती उसकी काठी है
विकास की वो नींव है
उसका जीवन सीख है।
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के इतिहास की बात करें, तो इस आंदोलन की शुरुआत अमेरिका में एक मई 1886 को हुई थी। दरअसल, यहां पहले एक दिन में 15 घटे तक मजदूरों से काम लिया जाता था, जिसके खिलाफ एक मई 1886 को आवाज बुलंद हुई और अमेरिका की सड़कों पर लोग निकले। इस दौरान पुलिस ने कुछ मजदूरों पर गोली चलवा दी, जिसमें से 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए और वहीं, कई मजदूरों की जान चली गई।
यह अमेरिका में औद्योगीकरण का भी दौर था, जहां मजदूरों का उद्योगपतियों द्वारा बेहद बेतहाशा काम करा कर एक तरह से उनका शोषण किया जाता था। 1 मई की इस मजदूर क्रांति के बाद से ना सिर्फ मजदूरों को उनके हक और सम्मान मिला बल्कि दिन भर में अधिकतर 8 घंटे ही कार्य करने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। इस विजय के बाद से हर साल 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाने के पीछे मजदूरों की उपलब्धियों का सम्मान करना, उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाना व बुलंद करना, मजदूर संगठन को मजबूत करना और उनके योगदान की चर्चा करना आदि कई उद्देश्य हैं।
आज पूरा देश बाबासाहेब को उनके द्वारा किये गए कार्य और योगदान के लिए याद करता है। लेकिन उनका एक महत्वपूर्ण कार्य मजदूर, किसान और श्रमजीवी वर्ग को संगठित करने और उनके आंदोलन का नेतृत्व करने का भी था।
बहुत कम लोग इस तथ्य से परिचित हैं, की महानायक मजदूर एवं किसान नेता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की थी। उसके टिकट पर वे निर्वाचित हुए थे। और 7 नवंबर 1938 को एक लाख से ज्यादा मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व भी बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने किया था। यह हड़ताल बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने मजदूरों के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए बुलाई थी।
सितंबर 1938 में मुंबई विधानमंडल में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने औद्योगिक विवाद विधेयक प्रस्तुत किया था। और इस विधेयक के तहत कांग्रेसी सरकार ने हड़ताल को आपराधिक कार्रवाई की श्रेणी में डालने का प्रस्ताव किया था।
बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने विधानमंडल में इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि ‘हड़ताल करना सिविल अपराध है, फौजदारी गुनाह नहीं। किसी भी आदमी से उसकी इच्छा के विरूद्ध काम लेना किसी भी दृष्टि से उसे दास बनाने से कम नहीं माना जा सकता है, श्रमिक को हड़ताल के लिए दंड देना उसे गुलाम बनाने जैसा है। ’उन्होंने कहा कि यह हड़ताल एक मौलिक स्वतंत्रता है जिस पर वह किसी भी सूरत में अंकुश नहीं लगने देंगे।
बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर मजदूर, किसान और श्रमजीवी वर्ग नेता थे। जिनके मजदूरों और किसानों के लिए किए गए कार्यों का समग्र मूल्यांकन अभी बाकी है।








