मानरेगा मजदूरों को 4060 करोड़ रुपये नहीं मिलें। मजदूरी रूकी।
संसदीय समिति की रिपोर्ट में मजदूरी को लेकर भी सूचनाएं।
इस वर्ष केंद्र सरकार ने मनरेगा के बजट में 25 प्रतिशत कटौती की।
देश में 968.98 लाख मनरेगा कार्ड धारक।
समय पर मजदूरी व काम नहीं मिलने से मजदूर संघर्ष करने पर मजबूर।
4060 करोड़ रुपये यह आंकड़ा अगर हम पढ़ें तो हमारे लिए यह बहुत बड़ी रकम मालूम होती है लेकिन केंद्र सरकार के लिए यह एक मामूली रकम है। क्योंकि केंद्र सरकार का इस वित्तीय वर्ष का बजट है 39,44,909 (उनतालीस लाख चवालीस हजार नौ सौ नौ) करोड़ रुपये। लेकिन मनरेगा मजदूरों की रुपये 4060 करोड़ रुपये अभी तक रुके रहने की जानकारी सामने आई है। अर्थात यह रकम केंद्र सरकार को इस देश के मनरेगा मजदूरों को देनी है। यह पहली बार नहीं है कि मनरेगा मजदूरों को वक्त पर मजदूरी नहीं मिल पा रही है।
इस देश के हर व्यक्ति को न्यूनतम मजदूरी सहित रोजगार देना यह सरकार का कर्तव्य है, ताकि वह अपनी और अपने परिवार का जीवनयापन कर सकें।
जरा आप सोचिए कि अगर आप ने काम किया और आपको समय पर वेतन नहीं मिला तो आप क्या अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं? अगर आप के पास आमदनी का कोई अन्य जरिया नहीं है तो आप को और परिवार को या तो भूखे रहना होगा या फिर कहीं से उधार लेकर परिवार का पेट भरना करना होगा। इसलिए आप सभी यह मानेंगे कि मजदूरों की मजदूरी रुकनी नहीं चाहिए।
लेकिन हाल ही की ग्रामीण विकास और पंचायत राज संबंधी के समिति की रिपोर्ट बता रही है कि मनरेगा योजना के तहत मजदूरों का 4060 करोड़ रुपये अभी भी रुका हुआ है। आपको बता दें की इस मनरेगा योजना के अठट पहले ही बजट के प्रावधानों में कटौती की गई है। उसमें इतनी बड़ी रकम रुक जाना मामूली बात नहीं है।
जिसका सीधा असर मजदूरों पर पड़ा है। कहीं जगह मजदूरों का यह आरोप है कि काम उपलब्ध होते हुए भी मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। वहीं जिन मजदूरों ने काम किया है, वे अब भुगतान के लिए पंचायत व जनपद कार्यालय का चक्कर काट रहे हैं फिर भी भुगतान नहीं मिल रहा है। ऐसे में कईं जगह मजदूर संघर्ष कर रहे हैं। सरकार के अनुसार मनरेगा के एक्टिव कार्ड धारकों की संख्या 968.98 (नौसौ अड़सठ दशमलों अठानवे लाख)। इनमें उन लोगों के नाम होते हैं जिन्होंने पिछले तीन आर्थिक वर्षों में या चालू आर्थिक वर्ष में किसी दिन काम किया हो। आपको बता दें की जॉब कार्ड धारकों में से सभी को काम मिलता है ऐसा नहीं है।
आपको बात दें कि इस योजना के इस वर्ष के बजट में 78000 (अठहत्तर हजार) करोड़ रुपयों की राशि को घटाकर 73000 (तिहत्तर हजार) करोड़ किए गए है। अर्थात 5000 करोड़ रुपयों की कटौती की गई है। यह लगभग 25 प्रतिशत की कटौती है। यह लगातार दूसरा वर्ष है जब भारी काम के मांग के बावजूद मनेरगा में बजट कटौती की गई है।
आपको बता यह भी बता दें कि मनरेगा का उद्देश्य देश के ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की आजीविका सुरक्षा बढ़ाने के लिए एक वित्तीय वर्ष में हर परिवार के लिए कम से कम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी प्रदान करना है।
लोकसभा के 21 और राज्य सभा के 9 सदस्यों की इस संसदीय समिति का यह भी मानना है कि इस योजना के तहत आज भी की राज्यों में मात्र 200 रुपये मजदूरी मिल रही है। जबकि जीवन यापन के लिए लगने वाली लागत कई गुना बढ़ गई है।
जाहीर है कि अगर सरकार केवल 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देती है तो फिर मात्र बीस हजार रुपये मजदूर के परिवार को मिलेंगे। यह स्थिति है तो जाहीर है कि मजदूरी में बढ़ौतरी होना अनिवार्य है। सरकार यह दावा कर सकती है की उसने इस वर्ष मजदूरी बढ़ाई है लेकिन आपको बता दें कि यह बढ़ौतरी कुछ ही रुपयों की है। छतीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्य को देखें तो वहां केवल 11 रुपयों की बढ़त की है। छतीसगढ़ में पहले मनरेगा मजदूरी 193 रुपये मिलती थी अब वह 11 रुपयों से बढ़ कर 204 रुपये हो गई है। अगर छत्तीसगढ़ राज्य का यह हाल है तो बाकी राज्यों की क्या स्थिति है आप समझ सकते हैं। जानकारी के लिए आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से बिहार में 210 रुपये, झारखंड में 210 रुपये और मध्य प्रदेश में 204 रुपये तय किए हैं।
यह जानकारी देना यह केवल हमारा मकसद नहीं है। हमारा यह भी मकसद यह भी है कि हम सभी के दिलों दिमागों में यह सवाल खड़ा करना है कि ऐसी स्थिति क्यों है? इस स्थिति के कारण और इसके क्या क्या परिणाम हो रहे है? और इस परिस्थिति को बदलना है तो क्या करना होगा?
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