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भारत पर बढ़ते कर्ज को लेकर विपक्ष के साथ साथ देश के नागरिक भी केंद्र की भाजपा सरकार को घेरते नज़र आ रही हैं। आरोप हैं की भारत पर कर्ज पिछले नौ साल में तीन गुना बढ़ा हैं। लेकिन सवाल आता है की आखिर सरकार कर्ज लेती क्यों है? और कर्ज का पैसा सरकार खर्च कहा करती हैं?
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विपक्ष ने आरोप लगाया है की साल दो हजार चौदह के बाद से अब तक भारत पर कर्ज तीन गुना बढ़ा हैं। आरोप के मुताबिक दो हजार चौदह में भारत पर कुल कर्ज पचपन लाख करोड़ रुपए था, लेकिन वर्तमान में भारत पर कुल कर्ज एक सौ पचपन लाख करोड़ तक पहुंच गया हैं।
लेकिन क्या इस दावे पर यकीन किया जा सकता हैं? या फिर ये दावा महज एक आरोप हैं। लेकिन कर्ज़ को लेकर भारत सरकार ने केंद्रीय बजट की आधिकारिक वेबसाइट पर स्थिति स्पष्ट की है।
वेबसाइट पर दिए आंकड़ों के मुताबिक इकतीस मार्च, दो हजार चौदह तक भारत सरकार पर करीब छप्पन लाख करोड़ (55.87 लाख करोड़) रुपए की देनदारियां थीं। जिसमे से करीब चौवन लाख करोड़ (54.04 लाख करोड़ ) रुपए आंतरिक ऋण और एक दशमलव बिरासी लाख करोड़ (1.82 लाख करोड़ ) रुपए विदेशी या बाहरी ऋण दिखाया गया हैं।
लेकिन साल दो हजार तेईस के फरवरी में जारी किए गए बजट में वित्तीय वर्ष दो हजार बाइस – तेईस के अंत तक क़र्ज़ की धनराशि का अनुमान एक सौ बावन लाख करोड़ (152.61 लाख करोड़) रुपए से अधिक लगाया गया था।
अब यह तो साफ है की कर्ज दो हजार चौदह की तुलना में करीब तीन गुना बढ़ा हैं। बीबीसी के रिपोर्ट के मुताबिक, हर पाँच साल में सरकार पर कर्ज़ में लगभग सत्तर फ़ीसदी की बढ़त देखी गई है।
लेकिन अब सवाल आता हैं की सरकार कर्ज लेती क्यों हैं? और कर्ज लिए गए पैसें कहा खर्च करती हैं।
बीबीसी हिंदी ने जब इस मामले में आर्थिक विशेषज्ञों से बात की तो उन्होंने बताया की, मोदी सरकार के पास कर्ज़ लेने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। उन्होंने कहा की, सरकार कहती है कि हम मुफ़्त गेहूँ-चावल दे रहे हैं, मुफ़्त सिलेंडर दे रहे हैं, किसान सम्मान निधि दे रहे हैं तो इन सब चीज़ों में कर्ज़ की धनराशि ख़र्च की जा रही है। इसके अलावा नई संसद बनाने में भी सरकारी कर्जे़ का इस्तेमाल हो रहा है।
बताते चले की देश में लिए जाने वाले टैक्स में कई गुना वृद्धि हुई हैं। पिछले कुछ सालों से जीएसटी के रूप में लोगो से कई गुना अधिक टैक्स लिया जा रहा हैं। जिससे सरकारी खजाने में अरबों रुपए पहुंचते हैं।









