आज प्रखर बौद्ध विद्वान पंडित अयोति थास इनकी जयंती है। वे 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में एक लेखक, पत्रकार, समाज सुधारक, सिद्ध चिकित्सक, तमिल और बौद्ध विद्वान थे पंडित अयोति थास। जिन्होंने अपने सामाजिक कार्य के साथ प्रचुर मात्रा में लेखन किया। साथ ही कई पत्रिकाओं का प्रकाशन किया।बुद्ध विचारों के प्रचार और आचरण के लिए संगठन भी स्थापित किये।
भारत में ब्रिटिश काल में बौद्ध विचार के प्रचार के लिए संगठित प्रयासों की अगुवाई करने का श्रेय उन्हें जाता है। वे ब्राह्मणवाद, वैदिक कर्मकांड, छुआछूत के कड़े विरोधी रहे हैं। उन्होंने सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व, महिला अधिकार, स्वाभिमान, तर्कवाद आदि का पुरजोर समर्थन किया।
आइये जानते है उनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें। :-
पंडित अयोति थास के बारे में बताया जाए तो उनका जन्म 20 मई 1845 को तमिलनाडु में हुआ। उनका मूल नाम कथावर्यण था । अयोति थास जी ने तमिल साहित्य, दर्शन, सिद्धकला में विशेषज्ञता प्राप्त की थी।
वे कई भाषाओं के ज्ञाता थे, तमिल के आलावा उनकी अंग्रेजी, संस्कृत और पाली भाषाओं पर महारत थी।
वे अपने केवल साहित्यकार या विचारक नहीं थे बल्कि उन्होंने 1870 मे निलग्रीस के आदिवासियों को इकट्ठा कर उनका संगठन बनाया। 1876 मे उन्होने अद्बाडानंदा सभा का निर्माण किया। उन्होंने 1882 में द्रविड़ कड़गम का गठन किया।
इसके साथ-साथ उन्होंने एक पत्रिका ‘द्रविड़ पांडियन’ शुरू किया। उन्होंने 1891 में द्रविड़ महाजन सभा का निर्माण किया और लोगों से अपील की वे जनगणना में अपने आपको जातिविहीन द्रविड़ के रूप में रजिस्टर करें।
आपको बता दें कि दक्षिण भारत में बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार में अयोति थास की अहम भूमिका रही है। वे अपने साथियों के साथ सर ओलकोट से मिले थे। सर ओलकोट की मदद से अयोति थास ने श्रीलंका का दौरा किया और भिक्खु सुमंगला नायके से दीक्षा ली।
वहां से लौट आने के बाद उन्होंने चेन्नई मे “साक्य बुद्धिस्ट सोसाइटी” की निर्मिति की और उसकी कई जगह शाखाएं स्थापित की। जहां प्रत्येक रविवार को नियमित बौद्ध कार्यक्रम होते थे।
अयोति थास जी को अपना बौद्ध जीवन जीते हुए तथा बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार करते हुए बहुत ही संघर्ष करना पड़ा क्योंकि उनके सामने ब्राह्मणवाद रूढ़िवाद खड़ा था। लेकिन उन्होने उसका कड़ा मुकाबला किया।
सर अयोति थास ने बुद्धा धम्म के प्रचार हेतु तमिल भाषा में ‘बुद्धा रू प्रकाश’ यह पत्रिका शुरू की। रात और दिन की कोई परवाह न करते हुए उन्होंने तमिल धार्मिक साहित्य का गहन अध्ययन किया और बुध्द धम्म के तमिल इतिहास को खोज निकाला। इसके साथ थी उन्होंने तमिलनाडु की परिया जाति के पतन के कारणों का भी शोध किया। उन्होने 1902 में तमिल समाचार पत्र की शुरवात भी की थी जिसका नाम था ओरु पैसा थमिज़न अर्थात एक पैसा तमिल
तमिलों का भविष्य बौद्ध परंपराओं के आधुनिक पुनराविष्कार में ही है ऐसा वे कहते थे। उनका कहना था कि बुद्ध धम्म और समाज की स्थापना बौद्ध विहार, बौद्ध अस्पताल, बौद्ध कॉलेज, बौद्ध युवा पुरुषों के एसोसिएशन, बुद्ध के जन्मदिन का त्यौहार एवं समारोह और बौद्ध दान निधि की स्थापना यह सब नए समाज की स्थापना के लिए आवश्यक है।
अयोति थास उन पहले गैर-ब्राह्मण में से थे जिन्होने ब्राह्मणवादी व्यवस्था का गहन अभ्यास किया। उन्होंने पाया कि यह व्यवस्था गैरबराबरी और अज्ञान का प्रचार करती है। उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था की कड़ी आलोचना की।
आधुनिक समाज और राजनीति में ब्राह्मण की भूमिका, एक समस्याग्रस्त राष्ट्रवाद में ब्राह्मण की भूमिका, इन सब पर उन्होंने विश्लेषण किया। ब्राह्मणों द्वारा बड़े पैमाने पर किए जा रहे अन्याय, सामाजिक और अनुष्ठान भेदभाव के विभिन्न कार्यों की ओर उन्होंने लोगों का ध्यान खिंचा।
आपको बता दें कि पंडित आयोथि थास उनके साहित्य, भाषा विज्ञान और ऐतिहासिक कार्य से तमिल बुद्ध विचार के प्रवर्तक माने जाते हैं। यह बड़े दुःख कि बात है कि तमिल विद्वानों की दुनिया ने जानबूझकर तमिल जीवन और विचार में उनके योगदान की अनदेखी की।
पंडित आयोथि थास के ज्ञान, विचार, और कार्य को इसलिए ढकने की कोशिशें हुयी क्योंकि क्योंकि वे गैरब्राह्मण और अछूत जाति परिया में जन्मे थे.
इस महान व्यक्तित्व का 5 मई 1914 को परिनिर्वाण हुआ।
लेखक, पत्रकार, समाज सुधारक, सिद्ध चिकित्सक, तमिल और बौद्ध विद्वान पंडित अयोति थास जी को उनके जयंती अवसर पर MNT न्यूज़ नेटवर्क की और से विनम्र अभिवादन।
🙏जय भीम जय मूलनिवासी जय भारत जय संविधान🙏







