25 वर्ष का समय हुआ है, महिला आरक्षण का कानून अभी तक नहीं बन पाया है। 1996 में इसके बिल को संसद के पटल पर रखा गया था। लेकिन अभी भी कानून नहीं बना है। यह बिल क्यों नहीं पास हुआ? बीजेपी ने भी खुद अपने चुनावी मेनिफेस्टो में महिला आरक्षण की बात की थी, तो फिर भी बीजेपी ने इसे पारित करके कानून क्यों नहीं बनाया?
आपको बता दें कि बीजेपी ने कई कानून विरोधी पक्ष के विरोध और हंगामे के बाद भी लोकसभा और राज्यसभा में अपने बहुमत के जोरों पर पारित करवाएं, लेकिन महिला आरक्षण का बिल पारित नहीं किया।
जब कांग्रेस भी सत्ता में रही थी, तब भी कांग्रेस ने इसे पारित नहीं किया गया। क्या कारण रहा है कि महिला आरक्षण बिल पारित नहीं हुआ? इसका जवाब आप कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के एक पहल से पा सकते हैं। जिहां, प्रियंका गांधी वाड्रा से इसका जवाब आपको मिल सकता है।
पहले हम आपको बता दें कि प्रियंका गांधी से क्यों इसका जवाब मिल सकता है। हाल ही में पिछले सप्ताह प्रियंका गांधी वाड्रा ने लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस में यह घोषणा की कि उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस पार्टी से विधानसभा चुनाव में महिलाओं को 40 प्रतिशत टिकट दिया जाएगा। प्रियंका ने यह भी कहा कि मेरी बस चलती तो मैं 50 प्रतिशत कर देतीं।
उनके बयान को बहुत बड़ी बात के रूप में देखा गया है। लेकिन आपको हम बता दें कि यह बात अधूरी है। प्रियंका गांधी वाड्रा को इस पत्रकार परिषद में एक पत्रकार ने सवाल पूछा कि क्या महिलाओं को जाति के आधार पर टिकट दिया जाएगा? इसपर प्रियंका ने कहा की महिला की सक्षमता, मेरिट के आधार पर टिकट दिया जाएगा, वह कितना काम करती हैं, उस महिला को विधानसभा में कितना जानते हैं उसके आधार पर टिकट दिया जाएगा।
प्रियंका के इस बयान से तीन मतलब निकलकर सामने आ रहे है। पहला कि, वह ऊँची जातियों की महिलाओं को इसलिए टिकट नहीं देंगी क्योंकि वह ऊँची जाति की है। दूसरा, शोषित पीड़ित पिछड़ी महिलाओं को भागीदारी देंगी। तीसरा वह पिछड़ी व पसमांदा महिला को वह इसलिए टिकट नहीं देंगी क्योंकि वह पिछड़ी और पसमांदा है, महिला को महिला के रूप में देखकर टिकट देंगे।
ठीक इसी बात को लेकर पिछले 25 वर्षों से महिला आरक्षण बिल कानून नहीं बना है। संसद में यह बात बार-बार उठी है कि महिलाओं को केवल महिलाओं के नाम पर प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा सकता, उनमें जो जातिगत भेदभाव है उसे देखते हुए पिछड़े वर्ग की महिलाओं का हिस्सा सुनिश्चित होना चाहिए। इस बड़े कारण से ही महिला आरक्षण का बिल कानून नहीं बना है। क्योंकि जो इस बिल को जो पास कर सकते हैं वह इस बात से सहमत नहीं है कि पिछड़े वर्ग की महिलाओं को उनका हिस्सा दिया जाए।
अगर कांग्रेस इसी मत की होती तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने यह कहा होता कि 40 प्रतिशत में उनकी पार्टी पिछड़ों और पसमांदा वर्ग की महिलाओं को उनकी संवैधानिक हिस्सेदारी देगी। लेकिन प्रियंका ने यह नहीं कहा।
पिछड़े और पसमांदा वर्ग के कार्यकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं में बढती राजनैतिक जागृति को कांग्रेस उत्तर प्रदेश में इस्तेमाल करना चाहती हैं। महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या और भागीदारी को देखते हुए कांग्रेस का यह पैंतरा है।
साथियों, जाहिर है कि, अगर कांग्रेस राजनीति में पिछड़ों और पसमांदा वर्ग की महिलाओं को उनकी संवैधानिक हिस्सेदारी देने के पक्ष में होती तो इसे जाहिर करती, लेकिन उसके ऐसा नहीं किया है।
अब इसे आप समझ गए होंगे कि 25 वर्ष का समय हुआ है, महिला आरक्षण का कानून अभी तक क्यों नहीं बन पाया है। इसके लिए जीतनी जिम्मेदारी कांग्रेस है उतनी ही बीजेपी है। दोनों भी पिछड़े और पसमांदा वर्ग का इस्तेमाल, शासक जातियों के हित में कर रहे हैं।
कांग्रेस ने तो बड़ी चाल चली है। लेकिन क्या सपा, बसपा और अन्य पार्टियां अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी समझते हुए क्या महिलाओं को समान हिस्सेदारी देगी?
आपको बता दें कि सपा बसपा ने भले ही महिला आरक्षण में पिछड़े महिलाओं की बात की हो लेकिन पार्टी स्तर पर पिछड़े और पसमांदा महिलाओं को उनकी संख्या के अनुपात में हिस्सेदारी देने की बात नहीं की है। दूसरी ओर बसपा को जिस बामसेफ से तैयार कार्यकर्ताओं ने स्थापित किया था उसी बामसेफ से तैयार कार्यकर्ताओं ने अब बसपा को भटकते देख पीपल्स पार्टी ऑफ इण्डिया डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की है। इस पार्टी ने शुरू से ही मूलनिवासी महिलाओं को सभी स्तर पर 50 फीसदी आरक्षण की बात की है। चुनाव में भी यह पार्टी महिलाओं को 50 प्रतिशत सीटें दे रही है।







