मूर्ति ‘थलाईवेत्ति मुनिअप्पन’ देवता की नहीं बल्कि ‘बुद्ध’ की है। – मद्रास हाईकोर्ट

यह मूर्ति थलाईवेत्ति मुनिअप्पन देवता की नहीं बल्कि बुद्ध की है। - मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक केस में पुरातत्व विभाग को निर्देश दिए कि तमिलनाडु के सालेम जिला स्थित एक मंदिर अपने नियंत्रण में लें क्योंकि वहां पूजी जानेवाली मूर्ति किसी देवता की नहीं बल्कि बुद्ध की है। जस्टिस आनंद वेंकटेश ने एक केस पर अपना यह निर्णय दिया।

आइए जानते हैं पूरी बात।

तमिलनाडु में एक जिला है सालेम। सालेम जिले में पड़ता है पेरियारी गांव। यहाँ के कोट्टई रोड पर एक मंदिर है। इस मंदिर में थलाईवेत्ति मुनिअप्पन नाम से मूर्ति की पूजा होती थी। मूर्ति को देखने से ही साफ पता चलता है कि यह मूर्ति बुद्ध की है। लेकिन हम सब जानते है कि बुद्ध की क्रांति के बाद ब्राह्मणवाद की प्रतिक्रांति हुयी और बुद्ध के चिन्हों को मिटाने की लाखों कोशिशें हुयी।

सालेम स्थित थलाईवेत्ति मुनिअप्पन देवता के नाम पर पूजा होने वाले मंदिर को लेकर वर्ष 2011 में सालेम के बुद्ध ट्रस्ट के ट्रस्टी आर सेवाकुमार ने एक केस दायर करते हुए कोर्ट को साक्ष्यों के आधार पर अपील किया था कि थलाईवेत्ति मुनिअप्पन इस नाम से पूजी जाने वाली मूर्ति किसी और की नहीं बल्कि बुद्ध की है और बुद्ध की ही यहां पूजा होती थी।

यह केस वर्ष 2011 से चली। पूरी तहकीकात हुयी। न्यायाधीश ने राज्य पुरातत्व विभाग के आयुक्त को मंदिर और प्रतिमा का अन्वेक्षण करने का निर्देश दिया था। आयुक्त ने मूर्ति का अभ्यास करने के बाद पाया कि इस मूर्ति में बुद्ध के महालक्षण है।

राज्य सरकार के प्रमुख सचिव ने अपनी रिपोर्ट से अदालत को अवगत कराया कि मूर्ति कमल के आसन पर “अर्धपद्मासन” के रूप में हैं। हाथ ध्यान मुद्रा में हैं। सर पर बुद्ध के लक्षणों में से घुंघराले बाल, उसनिस और लम्बे कान हैं। अपने कन्क्लुडिंग रिमार्क में प्रिंसिपल सेक्रेटरी ने कहा कि आर्कोलॉजिकल व ऐतिहासिक साक्ष्यों को सावधानी से परिक्षण करने के बाद यह पाया की मूर्ति में बुद्ध के महालक्षण हैं।

कोर्ट ने जब सरकार के संबंधित विभाग को पूछा, कि बताओं मंदिर की संपत्ति व प्रतिमा पर किसका नियंत्रण हो? सरकार के तरफ से आया कि सरकार का विभाग हिन्दू रिलीजियस एन्ड चेरिटेबल एंडोमेंट डिपार्टमेंट अर्थात एचआर एंड सीई विभाग इसका नियंत्रण देखें क्योंकि इसे मंदिर के रूप में माना जाता था और यहां पूजा होती थी।

हालंकि कोर्ट ने असहमति जताते हुए कहा कि पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट के अनुसार पुष्टि होती है की मूर्ति बुद्ध की है, इसलिए इसे (हिन्दू) मंदिर के रूप में जारी रखना उचित नहीं होगा।

कोर्ट ने पुरातत्व विभाग को मंदिर का नियंत्रण लेते हुए वहां बोर्ड लगाने के लिए कहा कि यह मूर्ति बुद्ध की है। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा है कि लोग इस स्थान पर आ सकते हैं लेकिन मूर्ति की पूजा या कोई समारोह नहीं किया जाएगा।

साथियों, इतिहास और पुरातत्व साक्ष यह बताते हैं कि इस देश में जगह जगह बुद्ध और श्रमण संघ के पदचिन्ह दिखाई देते हैं। इतिहासकार व पुरातत्ववेत्ता इस बात को बार-बार दोहराते हैं कि सम्राट अशोक ने देश में 84 हजार स्तूपों का निर्माण किया था।

जब मूर्तिकला का प्रारंभ हुआ तब देश व विदेश में बुद्ध की अनेकों मूर्तियां बनाई गयी। हजारों कलाकारों ने छीनी हथोड़ा लेकर पत्थरों में, या ईंटों से मूर्तियां तथा विहार बनाएं।
लेकिन एक समय ऐसा भी आया कि प्रतिक्रांति हुई और प्रतिक्रांति में बुद्ध, धम्म व संघ के चिन्हों को मिटाने कि पुरजोर कोशिशें हुई। आज अनेक बुद्ध मूर्तियों को या तो किसी देवता के नाम पर या फिर किसी देवी के नामपर पूजा जा रहा है ताकि बुद्ध की, बुद्ध के विचारों की पहचान मीट सकें।

इस देश में बुद्ध व महावीर के विचारों को मानते आ रहे थे उनकी प्रेरणा लेने के लिए प्रतिमा बनाकर पूजा करते थें। लेकिन धार्मिक व राजकीय प्रतिक्रांति होने से लोगों ने शिक्षा, संपत्ति व शस्त्र का अधिकार खोया और ब्राह्मणवाद के शरण में गए, अपना इतिहास भूल गए।

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