डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर की जयंती मनाने वालो से अपील।

बाबा साहब अम्बेडकर जी की जयंती मनाना बेहद अच्छी और खुशी की बात है लेकिन साथियों हमें मौजूदा दौर का भी विश्लेषण कर लेना चाहिए और इसे समंझ लेना चाहिए, कहीं जयंती मनाते-मनाते हम बाबा साहब अम्बेडकर जी के असली मिशन से दूर चले जाए ? क्योंकि समाज में अक्सर एक बात देखने को मिल रही है, ‘गले में माला और विचारों पे ताला”यह बेहद ही खतरनाक बात है।

मैं समाज में देख रहा हूं कि 14 अप्रैल और 6 दिसंबर के आसपास या संत गुरु रविदास जयंती या फिर गुरु कबीर जयंती या फिर अपनी अपनी जाति के महापुरुषों की जयंती मनाने के समय कुछ साथी बहुत ही ज्यादा सक्रीय रहते है और जयंती मनाने के बाद फिर पूरा साल सोते रहते है। अभी 14 अप्रैल नजदीक है,14 अप्रैल को बाबा साहब अम्बेडकर की जयंती है। इस जयंती में बहुत से लोग इतने मशगूल है कि उन्हें जयंती के अलावा अब कुछ भी दिखाई नहीं देता, और इन जयंतियों की सफलता के लिए सतापक्ष के चक्र भी लगा रहे है, इसके साथ साथ बड़े बड़े अधिकारियों की जी-हजूरी भी जारी है और यह जी-हजूरी उन नमकहरामी अधिकारियों की भी जारी है जिन्हें बाबा साहब अम्बेडकर जी की सच्ची बातों से बेहद नफरत है,जो सत्ता पक्ष की जी-हजूरी करने में ही अपनी शान-शौकत समझते है। ऐसे नौटंकीबाज अधिकारियों से मुझे भी सख्त नफरत है।

आइए अब महत्वपूर्ण बात कर ले महत्वपूर्ण बात यह है कि मौजूदा सरकार लैटरल एंट्री ,चोर दरवाजे के माध्यम से बड़े-बड़े पदों पर अपने नजदीक के लोगों को भर्ती कर रही है तथा बड़े पैमाने पर इस प्रकार की भर्तियां जारी है,जहां आम आदमी के लिए अवसर खत्म हो रहे है वहीं अनुसूचित जाति ,जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए भी प्रतिनिधित्व ,हिस्सेदारी ,भागेदारी के अवसर खत्म हो रहे है। इन अवसरों के खत्म होने से भारत के संविधान की भी अवहेलना हो रही है ,बल्कि भारत के संविधान और भारत के संविधान की उद्देशिका पर भी हमला जारी है और यह सब केंद्र और राज्यों की सरकारें बड़े पैमाने पर कर रही है ,क्या हमें यह सब करते देना चाहिए ? या फिर इस असवैधानिकता का विरोध करना चाहिए ? आखिर यह विरोध कौन करेगा ? यह लैटरल एंट्री जहां प्रोफ़ेसर स्तर पर जारी है वही आईएएस जैसे गरिमामय पद पर भी जारी है, वही असंख्य ऐसी ढेर सारी भर्तियों में भी जारी है ,जो जनता के सामने दिखाई नहीं देती अर्थात जनता को इसके बारे में मालूम ही नहीं है।

ऐसे में हमें क्या महज अंबेडकर जयंती मना कर संतुष्ट हो जाना चाहिए या फिर बाबा साहब अंबेडकर की सोच का भारत बनाना चाहिए ? बाबासाहेब आंबेडकर की सोच का भारत बनाने के लिए हमें त्याग और समर्पण करना होगा। क्या यह त्याग और समर्पण हम करेंगे ? यदि आपमें यह मादा है तो चले आइए 10 अप्रैल के दिन प्रत्येक जिला स्तर पर जहां पर संविधान कार्यान्वयन चेतना एवं मूलनिवासी बहुजन एकता रैलियों का आयोजन किया जा रहा है। इन रैलियों की सफलता से ही बाबासाहेब अंबेडकर की जयंती मनाने का असली मकसद पूरा होगा, क्योंकि बाबा साहब अम्बेडकर के संविधान द्वारा दिए गए हक अधिकार ,यदि हमारी आंखों के सामने खत्म हो गए तो फिर जयंती मनाने का कोई तात्पर्य नहीं रह जाता है।

इसलिए जयंती मनाने वाले सभी साथियों से मेरी अपील है कि पहले वह इन रैलियों का हिस्सा बने तथा इसके साथ साथ जयंतियों पर खर्च किया जाने वाला पैसा समाज के आंदोलन पर लगाएं, क्योंकि आज हमें बड़े आंदोलन की जरूरत हैं और बड़ा आंदोलन बिना पैसे के नहीं सकता।यह सही है कि आंदोलन चलाने के लिए त्याग और समर्पण करने वाले साथियों की भी जरूरत है इसके साथ साथ समझदार और बुद्धिजीवी साथियों की भी जरूरत है। इन सब के मिलने से ही हम सफलता की ओर बढ़ सकते हैं। साथियों मैं जयंती मनाने का विरोधी नहीं है लेकिन वर्तमान परिदृश्य में मुझे जयंती मनाना ठीक नहीं लग रहा बल्कि बाबा साहब के मूल लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आंदोलन चलाना बेहतर दिखाई देता है। इसलिए आज हमें आंदोलन की सफलता के लिए ज्यादा काम करना चाहिए।

मैं उन तमाम साथियों से हाथ जोड़कर अपील करता हूं कि जो अंबेडकर जयंती मना रहे है, या मनाना चाहते हैं ,वे साथी जरूर इस आंदोलन के लिए भी कुछ सहयोग करेंगे । मैं उम्मीद तो यह करता हूं कि इस वर्ष जयंती न मना कर ,इस बार आंदोलन के रूप में बाबा साहब अंबेडकर की जयंती मनाए,सविधान को पूर्ण रुप से लागू करवाने के लिए अपना आंदोलन चलाए और इस आंदोलन को मजबूत बनाए तथा मौजूदा सरकार पर सविधान को 100% लागू करने के लिए दबाव बनाएं तथा संविधान के 100% लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार को मजबूर करें।
मुझे उम्मीद है साथी इस बात पर जरूर अमल करेंगे।


धन्यवाद सहित सादर जय भीम।
सुरेश द्रविड़
राष्ट्रीय संगठन सचिव बामसेफ

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here