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हम सभी राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले को एक महान समाज सुधारक के रूप में जानते हैं। हम ये भी जानते हैं की ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना कि। लेकिन फुले साहब को आखिर इस समाज की स्थापन करने की जरूरत क्यों पड़ी? और उन्होंने किस उद्देश्य के साथ इसकी स्थापना की आज हम इस लेख पर चर्चा करेंगे।
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हम सभी जानते हैं की राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले कितने बड़े क्रांतिकारी व्यक्ति थे। वे अपने आधुनिक सोच और किसी भी विषय में तर्क करने की क्षमता के कारण प्रसिद्ध थे।
ज्योतिबा फुले ने चौबीस सितंबर, अठारह सौ चौहत्तर को सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी। लेकिन सवाल आता हैं की वह कौन कौन सी घटनाएं थी जिन्होंने फुले साहब को सत्यशोधक समाज की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया।
तो बात तब की है जब ज्योतिबा फुले को उनकी जाति के वजह से उनके एक ब्राह्मण मित्र की शादी में अपमानित होना पड़ा था।
ऐसा कहा जाता है की ज्योतिबा फुले को उनकी जाति के वजह से शादी के मंडप से द्विजो ने धक्के मार कर बाहर निकाल दिया था, जिससे वह बहुत ही ज्यादा अपमानित महसूस करने लगे।
उन्होंने तुरंत ही घर आ कर अपने पिताजी गोविंदराव फुले से इसका कारण पूछा । तब पिताजी ने बताया कि सदियों से यही सामाजिक वयवस्था है और हमे उनकी बराबरी नहीं करनी चाहिए।
उनके पिताजी ने उन्हें समझाया की वे ऊॅची जाति के लोग हैं और हम लोग नीची जाति के लोग हैं अतः हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते ।
ज्योतिबा फूले ने अपने पिताजी से बहस की और कहा, “मै उन ब्राह्मणों से ज्यादा साफ़-सुथरा था, मेरे कपड़े अच्छे थे, ज्यादा पढ़ा-लिखा व होशियार हूँ फिर मैं उनसे नीच कैसे हो गया?
ज्योतिबा फुले की इन बातो से पिताजी नाराज़ होकर बोले, यें मुझे नहीं पता परन्तु यह सदियों से होता आ रहा है। हमारे सभी धर्मग्रंथों एवम शास्त्रो मे भी यही लिखा है और हमें भी यही मानना पड़ेगा क्योकि यही परम्परा व परम सत्य है।
अपने पिताजी के इन बातो से ज्योतिबा फुले ने सोचा की, धर्म तो जीवन का आधार है फिर भी धर्म को बताने वाली पुस्तको, धर्मग्रंथों और शास्त्रो में ऐसा क्यों लिखा है?
उन्होंने कहा की, अगर सभी जीवों को भगवान ने बनाया है तो मनुष्य-मनुष्य मे विभेद क्यों हैं? कोई ऊँची जाति, कोई नीची जाति का कैसे है? अगर ये हमारे धर्मग्रंथों में लिखा है और जिसके कारण समाज में इतनी विषमता व छूआछूत हैं तो यह परम् सत्य कैसे हुआ? यह तो असत्य हैं और यदि यह असत्य हैं तो मुझे सत्य की खोज करनी पड़ेगी और समाज को बताना भी पड़ेगा ।
अतः उन्होंने इस काम के लिए एक संगठन बनाया और उसका नाम ‘सत्यशोधक समाज’ रखा।
सत्यशोधक समाज का मुख्य उद्देश्य शुद्र-अतिशूद्रों को पुजारी, पुरोहित, सूदखोर आदि की सामाजिक-सांस्कृतिक से मुक्ति दिलाना ।
साथ ही धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यों में पुरोहितों की अनिवार्यता को खत्म करना, शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना, ताकि वे उन धर्मग्रंथों को स्वयं पढ़-समझ सकें, जिन्हें उनके शोषण के लिए ही रचा गया है।
साथ ही सामूहिक हितों की प्राप्ति के लिए देश के मूलनिवासी बहुजन समाज में एकजुटता का भाव पैदा करना, धार्मिक एवं जाति-आधारित उत्पीड़न से मुक्ति दिलाना, समाज के पढ़े-लिखे युवाओं के लिए प्रशासनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना आदि।







