नक्सली के नाम पर मूलनिवासियों की हत्या?

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हाल ही में छतीसगढ़ के कांकेर ज़िले में पुलिस से हुए मुठभेड़ में तीन लोगों की मौत हुई हैं। पुलिस का दावा हैं की मुठभेड़ में मारे गए तीनों नक्सली थे। लेकिन परिजनों और स्थानीय लोगों का आरोप हैं की पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ कर इनकी हत्त्या की हैं क्योंकि मारे गए तीनों लोग नक्सली नहीं थे।

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बीते पच्चीस फरवरी, दो हजार चौबीस को छतीसगढ़ के कांकेर ज़िले के कोयलीबेड़ा थाना क्षेत्र में स्थित भोमरा-हुरतराई गांवों के बीच एक पहाड़ी पर पुलिस ने नक्सल विरोधी अभियान चलाया।

इस अभियान में तीन लोगो की जान गई। पुलिस का दावा हैं की मुठभेड़ में मारें गए तीनों नक्सली थे। लेकिन परिजनों का दावा हैं की पुलिस की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारे गए तीनों लोग नक्सली नहीं थे।

इस मामले में कुछ स्थानीय लोगों और मृतकों के परिजनों ने पुलिस पर फ़र्ज़ी मुठभेड़ का आरोप लगाया है।

लोगों का कहना हैं हम स्थानीय लोग जंगलो पर निर्भर करते हैं और अकसर जंगल पर जाते रहते हैं।

पुलिस वालों ने दावा किया हैं कि, बीते पच्चीस फरवरी, दो हजार चौबीस दिन रविवार की सुबह नक्सल विरोधी अभियान के दौरान सुरक्षाकर्मियों के साथ मुठभेड़ में कोयलीबेड़ा पुलिस थाना क्षेत्र के अंतर्गत भोमरा-हुरतराई गांवों के बीच एक जंगली पहाड़ी पर तीन नक्सली मारे गए।

लेकिन गाँव वालों ने इस दावे को खारिज करते हुए दावा किया कि,
पुलिस की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारे गए तीन लोग नक्सली नहीं थे, बल्कि स्थानीय निवासी थे।

घटना के अगले दिन यानी छब्बीस फरवरी, दो हजार चौबीस को स्थानीय लोग और मृतक के परिजन कोयलीबेड़ा थाने पहुंचे और पुलिस पर फर्जी मुठभेड़ करने का आरोप लगाया।

बताते चले की मृतकों की पहचान मरदा गांव के मूल निवासी रामेश्वर नेगी, सुरेश तेता और क्षेत्र के पैरवी गांव के अनिल कुमार हिडको के रूप में की गई है।

मुठभेड़ में मारे गए अनिल कुमार हिडको की पत्नी सुरजा ने दावा किया कि, उसका पति रस्सी लेने के लिए जंगल गया था और अपने साथ एक मशाल और एक कुल्हाड़ी भी ले गया था।

उन्होंने कहा कि, हम किसान हैं और केवल अपने खेत और घर पर काम करते हैं।

मृतक सुरेश तेता की पत्नी ने भी दावा किया कि पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ की थी और उनके पति नक्सली नहीं थे।

मीडिया वालों से बात करते हुए बदरगी ग्राम पंचायत, जिसके अंतर्गत मरदा गांव आता है। वहाँ के सरपंच मनोहर गावड़े ने भी दावा किया कि आदिवासी लकड़ी, पत्तियों और अन्य उपज के लिए जंगल पर निर्भर हैं।

उन्होंने कहा कि, तेंदूपत्ता संग्रहण का मौसम शुरू होने वाला है और इसी उद्देश्य से तीनों पेड़ों की छाल और तने और अन्य चीजों से तैयार रस्सियों को इकट्ठा करने के लिए जंगल में गए थे।

उन्होंने बताया कि वे तीनों दो दिनों के लिए जंगल गए थे और इसलिए वे खाना पकाने के लिए चावल और बर्तन ले जा रहे थे।

इन्होंने भी दावा किया कि वे नक्सली नहीं थे और फर्जी मुठभेड़ में मारे गए।

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