बिहार सरकार ने एससी/ एसटी स्कालरशिप फंड को अन्य विभाग में किया डाइवर्ट

किसी भी राज्य और देश का बजट महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि इसमें न केवल टैक्स की बात होती है बल्कि इसमें समाज के हित में कहां और कितना खर्च हुआ है या किया जानेवाला है इसकी बातें भी लिखी होती है।

आमतौर कई सामाजिक और राजनैतिक संगठन इस पर ध्यान नहीं देतें तो हम आम लोगों की बात अलग ही है। इसका फायदा उठाते हुए सत्ता पक्ष हमेशा ओबीसी, एससी एसटी और माइनॉरिटी के विकास का धन खर्च न करते हुए उसे दूसरी तरफ डाइवर्ट करती है और हमें भनक तक नहीं होती।

यह सब कुछ बताने के पिछे कारण है कि बिहार सरकार ने एससी एसटी विद्यार्थियों की स्कॉलरशिप का फंड रोड, सरकारी बिल्डिंग आदि बनाने में खर्च किया है।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक अर्थात कैग की ऑडिट रिपोर्ट में यह बात सामने आयी है। वर्ष 2018-2019 की कैग की रिपोर्ट अनुसार राज्य बिहार सरकार ने एससी/एसटी विद्यार्थियों की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप के कई करोड़ रुपये विभिन्न प्रोजेक्ट में खर्च किये हैं। इसके लिए सरकार ने बहुत ही हास्यास्पद कारण बताया है।

आपको बता दें कि पिछड़े वर्ग के फंड को कहीं और खर्च करने का यह गंभीर मामला है। खबर यह है कि पिछले छह सालों में अधिकतर एससी/एसटी छात्रों को यह स्कॉलरशिप नहीं मिली है। एक अख़बार ने यह छापा है कि पिछले तीन वर्षों में छात्रवृत्ति नहीं देने के पीछे “पोर्टल की तकनीकी समस्या” का कारण बताया गया था।

आपको यह भी बता दें कि सरकार हमेशा यह रोना रोते रही है कि विद्यार्थियों को स्कॉलरशिप नहीं देने के पीछे फंड की भी कमी रहती है।

हालांकि इसके फंड को किसी और जगह खर्च करने का ये गंभीर मामला सामने आया है. गौर करने योग्य बात यह है कि बिहार सरकार लंबे समय से इस छात्रवृत्ति को न देने की वजह फंड की कमी बता रही थी.

इंडियन एक्सप्रेस की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार सरकार ने पिछले तीन सालों में एससी/एसटी स्कॉलरशिप न देने के पीछे की वजह ‘पोर्टल में तकनीकी समस्या’ होना बताया था.

आपको बता दें कि वर्ष 2018-19 की कैग रिपोर्ट बताती है कि, बिहार राज्य सरकार ने स्कॉलरशिप के लिए निर्धारित राशि में से 2,076.99 करोड़ रुपये बिजली विभाग को दिया और उसे 460.84 करोड़ रुपये का कर्ज भी दिया।

कैग ने यह भी पाया कि 3,081 करोड़ रुपये बड़े रोड प्रोजेक्ट बनाने में खर्च किए गए। इसके अलावा तटबंध और बाढ़ नियंत्रण प्रोजेक्ट जैसे कामों में 1,202.23 करोड़ रुपये, मेडिकल कॉलेज के लिए 1,222.94 करोड़ रुपये और 776.06 करोड़ रुपये कृषि विभाग कार्यालय और अन्य भवन बनाने में खर्च किए गए हैं।

कैग ने इस बात को लेकर गहरी चिंता जताई है और नीति आयोग को निर्देश दिया है कि वे ये सुनिश्चित करें कि एससी/एसटी के विकास के लिए चलाई जा रही योजनाओं का पैसा कहीं और न खर्च किया जाए।

कैग ने बिहार सरकार को इसको लेकर स्पष्टीकरण मांगा था। कैग को भेजे अपने जवाब में राज्य वित्त विभाग ने यह स्वीकार किया है कि एससी/एसटी मद में आवंटित धनराशि को कहीं और खर्च करने पर पूर्णत: प्रतिबंध है।

साथियों यह घटना कोई पहली बार नहीं हुयी है और अकेले बिहार में ही नहीं होती है। कई राज्य सरकारें ओबीसी, एससी एसटी और माइनॉरिटी के फंड को बजट में तो दिखाती है लेकिन बाद में उसे खर्च न करते हुए उसे कहीं अन्य डाइवर्ट कर देती हैं। कई बार इस फंड को वापस भी किया जाता है। इसलिए सामाजिक संस्थाओं, सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ताओं को इन बातों पर ध्यान रखना चाहिए।

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