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तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक मौतें।
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किसी भी व्यक्ति को सीवर या सेप्टिक टैंक में भेजना पूरी तरह से प्रतिबंधित हैं। लेकिन फिर भी लोगो को सीवर में भेजा जाता हैं औऱ हर साल कई लोग अपनी जान गवां बैठते हैं। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़ो के मुताबिक, साल 2018 से 2022 तक सीवर और सेफ्टिक टैंक की सफाई के दौरान 308 लोगो की मौत हुई हैं।
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आज आप किसी सीवर या सेफ्टिक टैंक की सफाई करने वालो से उनकी जाति पूछेंगे तो उनमें से सब के सब आपको एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग से आने वाली जातियों से मिलेंगे।
आज भले ही देश में संविधान लागू हो। लेकिन आज भी कई काम जाति के आधार पर ही देश में किया जा रहा हैं। जैसे नाई आपको बाल काटते, धोबी कपड़े धोते, मोची जूता-चप्पल सीते दिख जाएंगे। इसी तरह हाथ से मैला ढोने वाले भी आपको मूलनिवासी बहुजन समाज के लोग ही मिलेंगे। जबकि मैला ढोने की प्रथा पर साल 1993 को ही प्रतिबंध लगाया गया था।
लेकिन आज भी यह प्रथा जारी हैं। और इससे मौते भी लगभग हर साल होती रहती हैं। आंकड़ो के मुताबिक 2018 से 2022 तक देश में कुल 308 मौतें हुई हैं। जिसमे तमिलनाडु में सबसे अधिक 52, इसके बाद उत्तर प्रदेश में 46, हरियाणा में 40, महाराष्ट्र में 38, दिल्ली में 33, गुजरात में 23 और कर्नाटक में 23 लोगों की मौत सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई है। जबकि इसे रोकने के किये कई बार कानून बनाये गए हैं।
सबसे पहके साल 1993 में मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद 2013 में कानून बनाकर इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में भेजना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। अगर किसी विषम परिस्थिति में सफाईकर्मी को सीवर के अंदर भेजा जाता है तो इसके लिए 27 तरह के नियमों का पालन करना होता है। हालांकि इन नियमों के लगातार उल्लंघन के चलते आए दिन सीवर सफाई के दौरान श्रमिकों की जान जाती रही है।
अगर इसमें मुआवजे की बात करें तो सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अगर किसी व्यक्ति की मौत सीवरेज कार्य में होती हैं तो मृतक के परिवार की पहचान कर 10 लाख रुपये की मुआवजा दिया जाना चाहिए। लेकिन वह भी इनके परिवारों को नहीं मिल पाता हैं।








