एमएनटी न्यूज नेटवर्क पर रोज रात्रि 8.30 बजे मूलनिवासी बहुजन समाज के ज्वलंत मुद्दों पर लाइव चर्चा का आयोजन किया जाता है। पिछले सप्ताह शुक्रवार 21 मई 2021 को “स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण : देशद्रोही नीति” इस विषय पर गंभीर चर्चा हुयी। यह देखा गया है कि बिगड़ती स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था के पीछे निजीकरण यह बड़ा कारण है। सरकारी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था की तरफ ध्यान नहीं दिए जाने के कारण वहां स्थिति गंभीर हो गयी है। कई जगह नाम के लिए अस्पताल है लेकिन जरुरी सुविधा, दवाई, डॉक्टर और नर्स नहीं है। इस कारण मजबूरी में लोगों को निजी अस्पतालों की ओर जाना पड़ता है। सरकारें जानबूझकर, अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी मुंह मोड़ रही है, इसके कारण निजी अस्पतालों की बाढ़ आयी है। लेकिन इस कोरोना महामारी में लोगों की मदद में सरकारी व्यवस्था ने सहारा दिया। सरकारों द्वारा सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को दरकिनार कर इसका निजीकरण करने पर जोर देना यह संविधानद्रोह और देशद्रोह है इस विचार को ध्यान में रखकर इस चर्चा को रखा गया था। चर्चा में मू सुनीता एन कुमार (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, पीपीआईडी), डॉ विजय कुमार त्रिशरण (सामाजिक चिंतक तथा लेखक, झारखंड) और डॉ. जन्मेजय कुमार (सर्जन एवं सामाजिक चिंतक) इन्होने अपने विचार रखे। इस लाइव चर्चा के कुछ हिस्सों का शब्दांकन। इस चर्चा के वीडियो को MNT News Network के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज पर देख सकते हैं।
मू सुनीता एन कुमार –
किसी भी राष्ट्र की या उस राष्ट्र के सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने नागरिकों की रक्षा करें। विशेष रूप से सैन्य आक्रमण और महामारी या अन्य आपदाओं में। सत्ता में बैठे लोगों की यह जिम्मेदारी है मौजूदा समय में जो कोरोना महामारी आई है उसको अपने देश से बाहर निकाले।
लोगों का स्वास्थ्य अगर बुरा रहता है तो भारत के जीडीपी पर भी इसका असर होगा। विकास की परिकल्पना में स्वास्थ्य एक मानक है। जैसे अगर किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो उसका विकास नहीं होगा। वैसे ही राष्ट्र अगर बीमार है तो उसका असर सभी क्षेत्रों पर होगा।
इसलिए सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह लोगों की सुरक्षा करें। रोजगार,स्वास्थ्य, पानी, स्वच्छता आदि बातों पर सरकार ने ध्यान देना चाहिए। किंतु अपने देश की सरकार ऐसा नहीं कर रही है।
सवाल यह है कि सरकार ऐसा क्यों नहीं करती ? एक तो राज नेता जिसको हमने चुनकर भेजा है वह संवेदनशील नहीं है। या तो वे भारत के जनता को अपना नहीं मानते। इसलिए उन्हें कोई दर्द नहीं होता। लोग कोरोना महामारी से मर रहे हैं। जिसके पास धन है वह स्वास्थ्य सेवा खरीद कर अपना स्वास्थ्य ठीक कर रहा है। सरकार अगर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाती तो उनका यह रवैया राष्ट्र विरोधी है, देश के साथ गद्दारी का है। यह देशद्रोह है ऐसा मैं समझती हूं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोक कल्याणकारी राज्य की अपेक्षा की गई है। जो लोग गरीब है वह स्वास्थ्य सुविधा खरीद नहीं सकते। उनके लिए मुफ्त में सेवा मिलनी चाहिए। हाल ही में एक सवाल सामने आया है कि भारत में 120 किलोमीटर के दायरे में एक स्वास्थ्य केंद्र है। व्यक्ति को अगर अपने घर से केंद्र तक जाना है तो उसे तीन चार घंटे लगेंगे। अगर वह अस्पताल में पहुंचा भी तो उसे सुविधा मिलने की कोई गारंटी नहीं है।
डॉ विजय कुमार त्रिशरण –
संविधान में राज्य नीति निर्देशक तत्व है। उसके आर्टिकल 47 में यह प्रावधान किया है कि राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य होगा कि वह राज्य की जनता स्वास्थ्य अच्छा रखें। उसके स्तर को उच्च स्तर तक बढ़ाने के लिए प्रयास करें। संविधान इस बात की गारंटी देता है कि जो राज्य की जनता को स्वास्थ्य मुहैया कराएगी।
स्वास्थ्य के संदर्भ में समय-समय पर अधिनियम लागू किये गए। 1986 में भारत सरकार ने 20 पॉइंट प्रोग्राम बनाया उसमें एक स्लोगन है “हेल्थ फॉर ऑल” इसका मतलब “सभी के लिए स्वास्थ्य”। समाज के अंतिम पंक्ति पर खड़े व्यक्ति को भी स्वास्थ्य सेवा दी जाएगी। यह लक्ष्य 2000 तक पूरा करने का वादा किया गया था। किंतु 2020 तक यह वादा पूरा नहीं हुआ।
भारत में गांव देहातों में रहने वाले की संख्या 68.8 है। गांव में सेवा देनेवाले डॉक्टरों की उपलब्ध संख्या 26.4 प्रतिशत है। यानी 68.8 लोक संख्या के लिए 26.4% डॉक्टर उपलब्ध है। मतलब सारे डॉक्टर शहरों में है। शहरों की लोकसंख्या 31.80 प्रतिशत है। यानी शहरों की 31.80 है जहां डॉक्टरों की संख्या 73.60 प्रतिशत है। भारत गांवों का देश है। गांव की स्वास्थ्य की स्थिति बहुत ही खराब है। कई जगह अस्पताल की बिल्डिंग बनाई गई किंतु खंडहर बन गई है।
भारत में प्रति 1000 शिशु बच्चों में 38 बच्चों की मृत्यु होती है। अन्य देशों की तुलना में यह संख्या बहुत है। जिस देश में शिशु के मरने की संख्या कम है उस देश की स्वास्थ्य सेवा बेहतर है। भारत की तुलना में अन्य देशों में बच्चों की मरने के आंकड़े बहुत कम है। आम लोग कुपोषण का शिकार बन रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स की कमी है। दवा, पानी और मकान की भी कमी है।
निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं का बाजारीकरण हुआ है। पैसा कमाना उनका मुख्य उद्देश्य है। निजी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा बहुत महंगी होती है। गांव के लिए मुश्किल हो जाता है।अगर घर-खेती बेचकर भी वह वहां पहुंचता है तो फिर भी उसका शोषण होता है। तरह-तरह की टेस्ट की जाती है जो अनावश्यक होती है। निजी क्षेत्र का यह रवैया संविधान के तत्वों से एकदम विपरीत है, संविधान विरोधी है।
डॉ जन्मेजय कुमार –
कोरोना महामारी में सरकारी स्वास्थ्य सेवा बड़ी मात्रा में कार्यरत रही। बाकी निजी अस्पतालों अस्पताल ने ध्यान नहीं दिया। निजी स्वास्थ्य सेवा अब सेवा नहीं रही, वह बिजनेस बना हुआ है। कोरोना महामारी में देखने को मिला कि नीजि क्षेत्र की अस्पतालों ने इस वक्त अपने हाथ पीछे लिए और सरकारी तंत्र पर दबाव निर्माण हुआ। प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर तक की सेवा में इस महामारी के समय सरकारी स्वास्थ्य सेवा तंत्र कार्यरत रहा है। इसलिए हमने सरकारी सेवाओं को और बढ़ावा देना चाहिए। जो गरीब लोग हैं वह सभी लोग स्वास्थ्य सेवा का लाभ ले सके। सरकार की तरफ से निजी क्षेत्र पर निगरानी रखने की आवश्यकता है। प्रत्येक जरूरतमंद और वंचित, गरीब व्यक्ति को सेवा मिले। गरीब लोगों को स्वास्थ्य सेवा मिले ऐसा कानून बनना चाहिए।
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इस चर्चा के वीडियो को MNT News Network के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज पर देख सकते हैं।








