किसानों और मजदूरों के साथ अब आर्थिक विषमता के शिकार छोटे व्यापारी और विक्रेता

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वर्ष 2020 में 11,716 उद्यमियों और 10,677 किसानों की ख़ुदकुशी के आंकड़े

अंबानी और अडानी में देश में सबसे अमीर कौन इस बात को लेकर होड़ लगी है। कोरोना से बचाव के लिए मुकेश अम्बानी के उद्योगपति के परिवार को रहने के लिए इंग्लैण्ड में 600 करोड़ रुपयों का 300 एकड़ जमीन पर बसा आलिशान घर खरीदा गया है। देश में लम्बी चौड़े सुपर एक्सप्रेस वे बनाये जा रहे हैं। प्रधानमन्त्री इस सुपर एक्सप्रेस वे पर सेना के विमानों को उतार कर रोड की टेस्टिंग कर रहे हैं। इससे आप सोच रहे होंगे कि देश बहुत तरक्की कर रहा है। लेकिन जरा रुकिए। अभी संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है। सरकार को अनेक सवाल पूछे जा रहे हैं उसमें कई गंभीर जानकारियां सामने आ रही है।

देश के प्रधानमन्त्री व्यापार को लेकर हमेशा बात करते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन जहां तक उद्योग और व्यापार की बात हैं आप इस बात को समझ लीजिये कि देश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। भले ही देश के प्रधानमन्त्री आपको रोज नए पेहराव में दिखाई देते होंगे, लेकिन इस देश का किसान मजदूर बड़ी मुश्किल में जी रहा है। इसके बाद नंबर आता है छोटे दुकानदारों और मझौले व्यापारियों का।

साथियों सरकारों की ख़राब आर्थिक व कृषि नीतियों के कारण न केवल किसान खुदखुशी करते आ रहे थें अब उद्यमियों की भी संख्या बढ़ रही है। एनसीआरबी के वर्ष 2020 आंकड़ों के के मुताबिक़ करीब 11,716 उद्यमियों ने ख़ुदकुशी की है। इसी काल में किसानों की खुदकुशियों की संख्या 10,677 रिकॉर्ड की गयी है। ख़ुदकुशी किये 11,716 उद्यमियों में 4356 व्यापारी और 4226 वेंडर्स है।

अखबारों में इसे कोरोना का लॉक डाउन इफ़ेक्ट कहा जा रहा है। लेकिन इसके पहले भी व्यापारी और विक्रेताओं ने ख़ुदकुशी की है। केवल व्यापारी और विक्रेताओं की बात करें तो 2019 में 7100 से अधिक खुदकुशियों की जानकारी इकट्ठा हुयी है।

साथियों, जिन व्यापारियों, विक्रेताओं, उद्यमियों ने ख़ुदकुशी की है उनमें से अधिकतर लोगों ने आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण ख़ुदकुशी की है। इस बात का मतलब यह नहीं है कि केवल उनकी ही आर्थिक स्थिति खराब थी। अगर आप थोड़ी भी नजर उठाकर देखेंगे तो इस देश में बड़ी भयानक आर्थिक विषमता है। छोटे-छोटे किसान-व्यापारी, विक्रेताओं के साथ अगर मजदूरों को जोड़ा जाए तो आप खुद ही सोच सकते हैं कि स्थिति ठीक नहीं है।

दूसरी तरफ, नजर उठाकर देखेंगे तो आप पाएंगे कि भारतीय समाज के करीब पांच सात फीसदी भर वर्ग के पास देश का धन इकठ्ठा हुआ है। कोरोना या आर्थिक चढ़ाव उतार से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि इस देश की आर्थिक नीतियों का अक्सर उन्हें ही फ़ायदा पहुंचते हुए दिखाई देता है। नोटबंदी के बारे में आपने खूब सूना होगा। लेकिन नोटबंदी के बाद भी यह वर्ग आराम से जिंदगी काट रहा था। अंमल यह है कि यह वर्ग अगर खर्च करता है तो ही इस देश में बाकी लोगों को काम मिलता है।

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