सामाजिक क्रांति – महापुरुषों का योगदान तथा संगठनों की भूमिका

Revolution through Constitution : Painting by Bali Khaire, Artist

प्रत्येक मनुष्य का जीवन किसी ना किसी प्रेरणा से प्रेरित होता है। यही प्रेरणा है उसके जीवित रहने की वजह होती है। प्रत्येक मनुष्य किसी उद्देश्य पूर्ति के लिए प्रयत्नशील होता है। उद्देश्यों की पूर्ति यह उसके प्रयत्नों का परिणाम होता है। उद्देश्यों के स्वरूप मनुष्य की प्रवृत्ति के साथ बदलते रहते हैं। समाज में कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं जो उनके व्यक्तिगत तथा सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील होते हैं।

सामाजिक क्रांति यह व्यवस्था परिवर्तन से जुड़ी होती है। परिवर्तनों से जुड़ी होती है। भारत में प्रचलित समाज रचना यह प्राकृतिक नहीं है बल्कि देवी तथा पवित्र मानी गई है। यह समाज रचना दैवी तथा पवित्र होने के कारण विषमता (असमानता) उसकी विशेषता है। विषमता की यह विशेषता जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शिक्षा, संस्कृति आदि सभी क्षेत्रों में विषमता के बीज बोए हैं। यह विषमता वर्ण व्यवस्था तथा जाति व्यवस्था के माध्यम से समाज में प्रवेश कर गयी। समस्त हिंदू समाज दो भागों में बट गया। जिसमें उच्च वर्ण के लोग सभी सुख-सुविधाओं के साथ जीवन गुजर बसर कर रहे है। तो दूसरा वर्ग, जो अनेक असुविधाओं, अन्याय और अत्याचार से पीड़ित है। द्वेष,अन्याय, लाचारी, दरिद्रता, अस्पृश्यता यही उनके जीवन की प्रमुखता हो गयी। जबकि उच्च वर्णो के लोग सत्ता संपत्ति तथा प्रतिष्ठा का जीवन जी रहे थे। अहंकार, स्वार्थ भरा जीवन उनकी आदत बन गई थी। हिंदू समाज का यह तथाकथित दैवी तथा पवित्र स्वरूप समाज विरोधी था। क्योंकि इस समाज रचना ने उच्च वर्ण को ग़ैरक़ानूनन लाभ तथा कनिष्ठ वर्ग पर अन्याय पूर्ण जीवन लादा है। श्रेणीबद्ध असमानता इस तत्व पर उनके व्यवसायों का निर्धारण हुआ था।

श्रेणीबद्ध व्यवस्था यह चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का प्राण है। इस श्रेणी युक्त असमानता ने अनेक सामाजिक समस्याओं को जन्म दिया है। इन सामाजिक समस्याओं का स्वरूप अत्यंत विदारक था। किसी भी व्यक्ति से धर्म के नाम पर उसके मनुष्य होने के सारे अधिकार छीन लेना यह एक सामाजिक समस्या नहीं बल्कि यह सामाजिक अपराध था। बहुजन समाज इस अपराध का शिकार होते रहे। इस देवी तथा पवित्रता का चोला पहने इस समाज व्यवस्था का विरोध करना नामुमकिन था। क्योंकि बहुजन समाज भी धर्म का गुलाम बन गया था। इस मानसिक गुलामी ने विरोध की सभी संभावनाओं को परास्त कर दिया था। इसके साथ ही शक्तिशाली वर्ग समानता के लिए प्रयत्न करने वालों को बुरी तरह से प्रताड़ित करता था और उन्हें पूर्ण रूप से पूर्ण रूप से पुरजोर दबाने की कोशिश करता था। उच्च वर्ण के इन शक्तिशाली लोगों ने बहुजन समाज को किसी भी विरोध या संघर्ष से वंचित रखने के लिए समाज व्यवस्था में ऐसे कायदे कानूनों की निर्मिति की है जिससे इन बहुजनों को निहत्था बना दिया।

उन्हें शक्तिहीन बनाने के लिए शक्ति प्रदान करने वाले सभी तत्वों से दूर रखा। शिक्षा से वंचित कर उन्हें अज्ञानता की खाई में धकेल दिया। अज्ञानता के कारण उन्हें अपने प्राकृतिक हक और अधिकारों का एहसास ही नहीं हो पाया। उन्हें शस्त्रों से भी दूर रखा गया। शास्त्रों के बल पर वह कोई संघर्ष न कर सके इसका पूरा पूरा ध्यान उन्होंने रखा। संपत्ति यह भी मनुष्य को बल प्रदान करती है। इस व्यवस्था ने बहुजनों को संपत्ति के अधिकार से भी वंचित रखा। शिक्षा, शस्त्र तथा संपत्ति के अभाव में बहुजनों को शक्तिहीन बना दिया गया। उन्हें दुर्बल बना दिया गया। इस दुर्बलता के कारण ही बहुजन समाज इन उच्चवर्णीय अल्पसंख्यकों का गुलाम बना रहा।

आधुनिक काल में अंग्रेजों के कारण भारत में सभी के लिए जो शिक्षा का प्रसार हुआ उस वजह से राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले तथा डॉ बाबासाहेब आंबेडकर इन महान क्रांतिकारकों को जन्म दिया। इन क्रांतिकारियों ने समाज के इस विषमता आधारित स्वरूप को समझा। सामाजिक समस्याओं का अध्ययन किया। सामाजिक विषमता के प्रभाव को महसूस किया तथा उन्हें दूर करने का प्रयत्न किया। उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को दबे-कुचले, पिछड़ों के उत्थान के लिए समर्पित किया, तथा समाज के नवनिर्माण का कार्य किया। अछूतोंको पशु समान जीवन जीने के लिए बाध्य करने वाले ईश्वरीय, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आदि सभी अंगो का सूक्ष्म अध्ययन कर उसके खिलाफ क्रांतिकारी युद्ध छेड़ा। यही उनके जीवन का अंतिम उद्देश्य तथा लक्ष्य रहा है।

इन महापुरुषों के सामाजिक क्रांति की विशेषता यह रही है कि उन्होंने इस क्रांति में “मनुष्य” को केंद्र में रखा। मनुष्य के कल्याण के लिए आवश्यक स्वतंत्रता, समता, बंधुता तथा न्याय इन मूल्यों को प्राथमिकता दी। नव समाज की निर्मिती के लिए लोकतंत्र के मूल्यों का संवर्धन करना ही उनका एकमात्र लक्ष्य था। सामाजिक समता तथा लोकतंत्र से परिपूर्ण संसदीय प्रणाली के समाजवादी विचारधारा के आधार पर आधुनिक भारत का निर्माण कर सामाजिक बदलाव का लक्ष्य पूर्ण किया।

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने संवैधानिक भारत का निर्माण कर इस देश के प्रत्येक नागरिकों को हक और अधिकार बहाल किये। राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले तथा डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर ने अपने जीवन में सामाजिक क्रांति की। बुद्धिप्रमाणता, तर्कनिष्ठता, विवेकनिष्ठता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बल पर उन्होंने इस क्रांति को सफल बनाया है। समाज में फैली धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्र में सदियों से चली आ रही परंपरा को समाप्त करना ही सामाजिक क्रांति कहलाती है। सामाजिक बदलाव के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण यही सामाजिक क्रांति की सफलता का प्रमुख कारण है। लेकिन शोषित लोगों के अज्ञानता के कारण, प्रतिक्रांतिवादी शक्तियों द्वारा इस क्रांति के विरोध में हो रहे प्रयास इस क्रांति की सफलता के प्रभाव को कम कर रहे हैं।

ऐसी स्थिति में इस सामाजिक क्रांति को बरकरार रखना सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी होती है। यह सामाजिक संगठन समाज में व्याप्त नैतिक मूल्यों तथा कल्याणकारी मानवीय मूल्यों की रक्षा का दायित्व लेती है। किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मिलजुल कर काम करना संगठन का प्रमुख कार्य होता है। संगठन का निर्माण किसी विशिष्ट उद्देश्य पूर्ति के लिए होता है।

राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले तथा डॉ बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा किये कार्यों को आगे बढ़ाना तथा समाज स्वास्थ्य को बनाए रखने की जिम्मेदारी बहुजन समाज के द्वारा स्थापित संगठनों पर आती है। बहुजन समाज में भी इस जिम्मेदारी को भलीभांति जाना समझा और सामाजिक संगठनों का निर्माण हुआ है। इन संगठनों का मुख्य उद्देश्य समाज को उनके न्याय हक दिलाना तथा उनके हक अधिकारों की रक्षा करना होता है। सामाजिक संगठन यह समाज पर एक प्रभाव निर्माण कर शोषित और तथा वंचितों के सुरक्षा का जिम्मा लेते हैं। समाज के विकास तथा उनकी गतिविधियों पर ध्यान रखना उनका कार्य होता है। संगठन का मुख्य उद्देश्य वंचित-शोषित को शोषण से, अन्याय अत्याचार से मुक्ति दिलाना ही नहीं है बल्कि उनके लिए अन्न, वस्त्र तथा आवास की प्राप्ति सुनिश्चित हो, समता, स्वतंत्रता तथा स्वाभिमान युक्त जीवन जीने के लिए भयमुक्त वातावरण उपलब्ध करके देने के साथ-साथ जीवन के हर क्षेत्र में सहभागिता तथा न्याय पूर्ण व्यवहार की परिपूर्ति हो यह भी संगठन का लक्ष्य होना चाहिए। इसलिए संगठन के निर्माण से पहले उसके ध्येय-उद्देश्य, लक्ष्यों को निर्धारित करना होता है। किसी भी संगठन की सफलता किसी विशेष प्रसंग आने पर शक्ति का प्रदर्शन कर अपना प्रभाव समाज पर डालने तक सीमित न हो बल्कि वह संगठन अपनी शक्ति का उपयोग किस सकारात्मकता से करता है तथा विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता पर आधारित होता है।

संगठन का कार्य किसी एक घटना या प्रसंग तक सीमित न होकर वह संगठन समाज में किस तरह हर लोगों की सेवा के लिए सहकारिता के लिए तत्पर रहता है इस पर उस संगठन की सफलता सिद्ध की जा सकती है। इसके साथ ही संगठन लोगों के कल्याण के लिए, उनकी रक्षा के लिए विभिन्न क्षेत्र में कार्यरत होना चाहिए। वह समाज में पल-बढ़ रही विकृति को रोक सके। वह वंचित शोषितों को न्याय दिलाने के लिए राजनीतिक शक्ति को प्राप्त करने का प्रयास करें। आर्थिक शक्ति पर भी उसका प्रभाव हो, तथा उसे नियंत्रित कर आर्थिक शोषण से लोगों को बचाने के लिए आर्थिक व्यवस्था पर अपना प्रभाव कायम करने का प्रयास करें। लोगों के जीवन को सभी सुख-सुविधाओं से पूर्ण करने का प्रयास करें।

संगठन यहां ग्रामीण तथा शहरी दोनों स्तर पर प्रभावशाली होना आवश्यक है। क्योंकि दबे कुचले या बहुजन समाज की समस्याएं एक है ऐसा हम समझते हैं। लेकिन इन समस्याओं की वास्तविकता गांवों तथा शहरों में विभिन्न स्वरूप की है। ग्राम रचना में जातिवाद की समस्या तीव्र है। इसके साथ ही ग्राम रचना के कारण गांव में साहूकार जमीदार तथा धार्मिक परंपराओं का अधिक बोलबाला होने के कारण उनके शोषण और अत्याचार उनका स्वरूप अलग है। इसके साथ ही ग्रामीण लोगों की जीविका उनकी भी अनेक समस्या होती है। उनकी इन सभी समस्याओं से उन्हें मुक्त करना तथा उनकी उपजाऊ को उपलब्ध करा देना यह भी संगठन का प्रमुख कार्य होना चाहिए। दबे कुचले शोषित वंचित पर भारत के सभी राज्यों में हर दिन अन्याय अत्याचार होते हैं। उन्हें रोकने के लिए सभी शोषित वंचित एक हो एक ही संगठन की छत्रछाया में काम करें, इसकी आज अत्यंत आवश्यकता है।

आज संविधान के माध्यम से हम न्याय व्यवस्था पर विश्वास रखकर अपनी रक्षा की अपेक्षा करते हैं। लेकिन वास्तविकता क्या है सही में गरीबों वंचितों 100 सीटों के पक्ष में हो रहा है या नहीं इसका भी हमें विचार करना होगा। उसका आज देश में बहुत जनों के संगठनों की संख्या बढ़ रही है उन संगठनों के उद्देश्य भी एक ही है लेकिन यह संगठन कितने सफल हो पाए इसका भी पुनर्विचार हमें करना होगा।

आज संगठनों की संख्या अधिक है लेकिन क्रियाशील संगठनों की संख्या कितनी है? तात्पर्य यह है कि बहूजनों के कितने संगठन आज प्रभावशाली है? कितने संगठन ऐसे हैं जो समाज पर अपना धाक जमाए हुए हैं? हम संगठन के महत्व को भली-भांति जानते हैं और उसके निर्माण में भी हम पीछे नहीं लेकिन संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाना तथा उसकी एक छवि प्राप्त करना जिससे लोगों पर उस संगठन का प्रभाव हो ऐसे संगठन का सपना देखना ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

किसी भी प्रभावशाली संगठन की निर्मिति के लिए आवश्यकता होती है निष्ठावान कार्यकर्ताओं की। जो निस्वार्थ रूप से संगठन को चलाएं आगे बढ़ाएं। अनेक संगठन कार्यकर्ताओं की स्वार्थ के कारण असफल होते हैं। इसलिए हमें समाज को न्याय दिलाने के लिए, उन्हें गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए, उन्हें भयमुक्त तथा स्वाभिमान से जीवन जीने के लिए उनकी रक्षा करना ही सामाजिक दायित्व है इसे हर पल याद रखें। हमें व्यक्ति को बड़ा करना नहीं है हमें समाज को विकसित करना है। समाज के प्रगति और विकास के लिए हमें व्यक्तिवाद की आवश्यकता नहीं है बल्कि हमें समाजवाद की आवश्यकता है। संगठित जीवन ही हमें हमारी समस्याओं से मुक्ति दिला सकता है। क्योंकि महापुरुषों के अभाव में उनकी विचारधारा पर निर्मित संगठन ही मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं।

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डॉ सरोज डांगे (शामकुवर)
लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता।
आप राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्व विद्यालय के
डॉ आंबेडकर विचाधारा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है।

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