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अवैध या उचित प्रक्रिया के बिना बुलडोजर चलाने की चलन बीते कुछ सालों में काफी अधिक देखने को मिली हैं। खासकर भाजपा शासित राज्यों में ऐसे मामले अधिक हुए है। हाल ही में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने उज्जैन नगर निगम अधिकारियों को फटकार लगाया हैं।
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इस देश में मूलनिवासियों खास कर धर्म परिवर्तित अल्पसंख्यकों के घरों को उचित प्रक्रिया के बिना तोड़ा जा रहा हैं।
इस तरह के मामले पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ी हैं। जिससे देश विदेश में केंद्र की भाजपा सरकार और भाजपा शासित विभिन्न राज्यों की काफी आलोचना भी हुई हैं।
आलोचकों का कहना है कि, ये विध्वंस विशेष रूप से क्रूर हैं क्योंकि वे बच्चों सहित निर्दोष परिवार के सदस्यों को बेघर कर देते हैं।
पिछले कुछ सालों से भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित कई राज्यों में यह एक पैटर्न बन गया है। जिसमे बिना नोटिस दिए या बहुत कम समय में नोटिस देकर लोगो को बेघर कर उनके घर ध्वस्त किए जा रहे हैं।
ऐसे मामलो में अधिकतर पीड़ित धर्म परिवर्तित अल्पसंख्यक ही होते हैं। जिनमे अधिकतर निम्न जातियों के मुसलमान शामिल है।
भाजपा शासित राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और असम जैसे राज्यों में, बुलडोज़रों द्वारा घरों को तेजी से ध्वस्त करना अब आम बात हो गई है।
अधिकारियों द्वारा अकसर इसका कारण अवैध निर्माण बताया जाता हैं, लेकिन कानूनी विशेषज्ञ इस पर लगातार सवाल उठाते हैं।
हाल ही में घरों को अवैध रूप से ढहाए जाने से संबंधित एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए उज्जैन नगर निगम अधिकारियों को फटकार लगाया हैं।
अदालत ने उज्जैन नगर निगम अधिकारियों के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी निर्देश देते हुए याचिकाकर्ता को मुआवजे के रूप में एक लाख रुपये देने को कहा हैं।
बताते चले की इस मामले में नगर निगम ने तर्क दिया कि उसकी कार्रवाई उचित थी, क्योंकि मकान नंबर चार सौ छियासाठ और चार सौ सड़सठ का निर्माण नगर निगम अधिनियम का उल्लंघन करके किया गया था, क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने पहले से निर्माण की अनुमति नहीं ली थी।
नगर निगम ने आरोप लगाया कि मकान नंबर चार सौ छियासठ के मालिक परवेज खान थे और दूसरा मकान उमा के नाम से पंजीकृत था। हालांकि, अदालत ने पाया कि परवेज खान नाम का कोई भी व्यक्ति अस्तित्व में नहीं है।
नगर निगम के इस आरोप को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि, ‘परवेज खान के नाम पर ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है, जिससे पता चले कि उसने ही संपत्ति खरीदी है।’
अदालत ने कहा कि, इस तथाकथित मौखिक जानकारी के आधार पर पंचनामा बनाया गया और घर तोड़े जाने की कठोर कार्रवाई की गई है।
अदालत ने सुनवाई करते हुए कहा कि, किसी को भी उचित अनुमति के बिना घर बनाने का अधिकार नहीं है, लेकिन निर्माण को ढहाए जाने को अंतिम उपाय माना जाना चाहिए। इसके अलावा ऐसी कार्रवाई घर के मालिक को नियमितीकरण प्राप्त करके स्थिति को सुधारने का उचित मौका प्रदान करने के बाद ही की जानी चाहिए।
किसी के घर या दुकान को मनमाने ढंग से तोड़ना सामूहिक दंड का बहुत ही घटिय और तानाशाही रूप है।
वर्तमान भारत में यह स्थिति दर्शाती है कि कानून व्यवस्था का शासन लगभग टूट गया है।








